भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 449

३४८ स्पन्दकारिका अथवा विभागबोधज्वलनेन विलाप्य वेद्यपीयूषम् । पीत्वा तृप्तोविचरन्त्रीरोगो योऽचिरात् सदैकाकी ॥ एतत्क्रममार्थसारं परधाराभूमिका च शक्तीनाम् । तदनुज्ञयाऽत्र कथितं सच्छिष्य विबोधनाय यथा ॥ कहा भी गया है—विभाग के हेतु ये प्रसिद्ध हैं—देश, काल, क्रिया और आकार। जिसमें ये नहीं हैं, उसमें विभाग का कोई कारण ही नहीं है— 'देशकालक्रियाकाराः प्रसिद्धा भागहेतवः । तेन सन्ति पुनर्यस्य विभागस्तस्य किंकृतः ॥' अन्यत्र भी कहा गया है—विषय सहित मन भस्म करना है। ज्ञानाग्नि अपनी दृष्टि से उसे भस्म करती है। उसके भस्म हो जाने पर अन्तर्मुखता और बहिर्मुखता दोनों समाधि हो जाती है— मनः सविषयं दाह्यं ज्ञानाग्निदर्शनैर्दहेत् । अन्तर्बहिर्मुखश्चैवं समाधिरुपपद्यते ॥ इसके अतिरिक्त भी विद्वानों द्वारा कहा गया है कि— विज्ञान की वाडवाग्नि प्रदीप्त होकर अपनी शक्ति से ज्ञेय विषय रूप समुद्रों को निरन्तर ग्रस्त रहती है। अन्य कोई उसको ग्रस्त करने में समर्थ नहीं है। जल न मिलने से पिपासा संवर्द्धित नहीं होती और बहुत सा जल मिल जाने पर तृप्ति या कृत- कृत्यता नहीं होती । यह ज्ञान ऐसा विलक्षण बड़वानल है विज्ञान वाडवो दीप्तः स्व शक्त्या ज्ञेयतोयधीन् । अजस्रं ग्रसते नान्यस्तद्ग्रासे शक्तिमान् भवेत् । नाऽप्राप्त्या पयसां तृष्णां प्राप्त्या वा भूयसामपि । यस्यास्ति कृतकृत्यत्वं कोऽप्यसौ वडवामुखम् ॥ 'यस्मात्सर्वमयो जीवः' में इस विषय का सयुक्तिक वर्णन किया जा चुका है। तत्त्व का स्वभाव विद्यात्मक ज्ञान स्वरूप है । अतः संपूर्ण ज्ञेय को उससे एक कर देना चाहिए। बस, इस ऐक्य के होते ही दूसरी कलात्मक विकल्परूप शक्तियाँ फिर किसी प्रकार की पीड़ा-बाधा नहीं पहुँचा सकतीं-अर्थात् स्वरूप से प्रच्युत नहीं कर सकतीं । कहा भी गया है— आकाश एक और व्यापक है । दीवार आदि के संयोग से उसमें बाह्य-आभ्यन्तर का भेद प्रतीत होता है । इसी प्रकार पशुपति तत्त्वज्ञ ग्राह्य और ग्राहक को एक ही रूप देखता है । आपके समाधि स्वरूप में विक्षेप्य और विक्षेपक, व्याक्षिप्त और व्याक्षेप्य का कोई भेद नहीं है— एकं व्याप्ति व्योमकुड्यादियोगात्तस्मिन् बाह्याभ्यन्तरत्वं समाधिः । पश्यत्येकं ग्राहक ग्राह्यरूपं व्याक्षिप्ताक्षेप्यतस्त्वत्समाधिः ॥१ १. उत्पलदेव—'स्पन्दप्रदीपिका' ।