भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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उसी प्रकार द्रष्टा स्वप्नावस्था में भी अपने स्वभाव में स्थित रहकर हृदय में स्थित अभीष्ट पदार्थों को देखता है। क्योंकि आत्मसंवित् इच्छा का अतिक्रमण नहीं करती—'प्रणयस्या नतिक्रमात्' (स्पन्द का० ३४)। यथेच्छाभ्यर्थितो = अभ्यर्थना (याचना) शब्दों के माध्यम से व्यक्त की जाती है। किन्तु यह अभ्यर्थनाभिव्यक्ति शब्दवृत्ति के माध्यम से नहीं प्रत्युत (शब्दानभिव्यक्त) मात्र हृदय में इच्छा के माध्यम से व्यक्त होने पर भी उसे अभ्यर्थना मान लिया जाता है अर्थात् भले योगी किसी पदार्थ को न माँगे किन्तु यदि वह उसकी इच्छा मात्र कर ले तो भी धाता उसे उसकी अभ्यर्थना (याचना) मानकर उसे पूरा कर देता है— 'सोमसूर्योदयं कृत्वा' (१) वाक्य के सोम-सूर्य को भट्टकल्लट ने चक्षु क्यों कहा? कारण यह है कि—'चक्षोः सूर्योऽजायत्' आँखों से सूर्य की उत्पत्ति हुई है अतः 'सूर्य' चक्षु के प्रतीक के रूप में प्रयुक्त मान लिया गया। (२) अगली कारिका में 'नित्यं स्फुटतरं मध्ये' शब्द का प्रयोग किया गया है। 'मध्य' सुषुम्णा नाड़ी को कहते हैं। योगी के प्राण एवं अपान इसमें प्रवेश करते ही निरुद्ध हो जाते हैं—इड़ा पिंगला का प्रवाह रुक जाता है—सुषुम्णा में प्राण प्रवाह होने लगता है और ऊर्ध्वपथ से जाते जाते यह प्राणापान निरुद्ध हो जाता है। इन्हीं दृष्टियों से रामकण्ठाचार्य ने (स्पन्द का०वि०) में—'चक्षुषोरुदयं कृत्वा— इति उपलक्षणमात्रमेतत् मन्तव्यम्' कहा है और इसकी व्याख्या इस प्रकार की है— 'सोमसूर्ययोः चक्षुषोः उदयम् अभिप्रेतार्थावधारणामात्रावधानरूपस्वरूपप्रथनं विधाय —इति उपमानवाक्यम्'। स्पन्दप्रदीपिकार उत्पलाचार्य ने 'सोमसूर्य' को प्राणापान का द्योतक माना है— 'सोमसूर्ययोरपानप्राणयोश्चक्षुषोश्च उदयं कृत्वा—चक्षुरादिष्ववधानेन इत्यर्थः ॥' निष्कर्षभट्टकल्लट के 'अनेकार्थसन्निधाने—नटमल प्रेक्षादिषु' की व्याख्या को ध्यान में रखकर स्पन्दप्रदीपिकाकार भी कहते हैं—'अनेकार्थसन्निधानेपि गणिका नट- मल्लप्रेक्षाकादिषु मध्याद्यदेव वस्त्वभिमतं तदेव यथा पश्यति—स्वरूपानुप्रवेशात्।' 'जाग्रत्येव निजभावाप्त्या स्वातन्त्र्यं तथा स्वप्नेऽप्यस्तीति वक्तुमाह ... यथेच्छा- भ्यर्थितो ... प्रकाशयेत् ॥ (स्पन्द प्र०) 'स्वबलावष्टम्भात्' हृदिस्थितान् अभिमतानर्थान् पदार्थान् सम्पादयति प्रकाशयति ॥ 'स्वप्नेऽप्यभीष्टानेवार्थान् ॥ मध्ये हृदि स्वस्वभावे स्थितः सन् स्फुटतरं कृत्वा सदैव प्रकाशयति दर्शयति कुतः? प्रणस्येच्छाभ्यर्थनाया अनतिक्रमात् अत्यागात् ॥' प्राणी प्रथमतः इच्छा करता है फिर कहता है (प्रार्थना करता है—अभीष्टप्राप्त्यर्थ वाणी द्वारा उसे व्यक्त करता है) अतः 'इच्छावस्था संसारिणः परकारणाभेदरूपा। परमेश्वर एव स्वतन्त्रों यथेष्टमिदमखिलं प्रकाशयति—इति परमार्थ तदीयमायाशक्ति- जनितदेहादि व्यवच्छेदाः संसारिणो न प्रपद्यन्ते ॥ (रामकण्ठाचार्य)। मध्ये (रामकण्ठ की दृष्टि में) = हृदय में। मध्ये = हृदि स्वस्वभावे (उत्पल) ॥ मध्ये—हृदयं (भट्टकल्लट) ॥