स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 177, कुल 519 में से
संदर्भ में पढ़ें७६ स्पन्दकारिका 'वस्तुतस्तु जगतो ब्रह्मपरिणामकत्वं स्वीकुर्वतां तांत्रिकाणां मते जगतः सत्यत्वमेव मृद्घटयोरिव ब्रह्मजगतोरत्यन्ताभेदेन ब्रह्मणः सत्यत्वेन जगतोऽपि सत्यत्वावश्यंभावात् भेदतमात्रस्य मिथ्यात्वस्वीकारेणाद्वैतश्रुतीनामखिलानां निर्वाहः । भेदस्य मिथ्यात्वादेव भेदघटिताधाराधेय भावसंबन्धोऽपि मिथ्यैव ।'१ २. 'वाचारंभणं विकारः' (छा०उ० ६.१.४) तथा 'ब्रह्मसूत्र'— 'आत्मकृतेः परिणामात्' (ब्र०सू० १,४,२६) की व्याख्या करते हुए भास्करराय ने 'वरिवस्यारहस्यम्' में श्रुति एवं व्यास दोनों को परिणामवादी सिद्ध किया है । आचार्य रामानुज, निम्बार्काचार्य, बल्लभाचार्य, भास्कराचार्य, श्रीपति, श्रीकण्ठ आदि सभी आचार्यों ने 'परिणामवाद' का ही प्रतिपादन किया है । 'वामकेश्वरतन्त्र' भी 'परिणामवाद' का प्रतिपादक है— १. 'तस्यां परिणतायां तु न कश्चित्पर इष्यते' (वामकेश्वरीमतम्) २. तच्च दृश्यं तत्परिणाम एव, तस्यां परिणतायां ॥ ३. 'परिणामवाद एवाभिप्रेतः' (वरिवस्यारहस्यम् भास्कर) कहकर भास्कर ने तो इसको प्रतिपादित किया ही है । भास्करराय—तांत्रिक मत परिणामवादी है । आचार्य शङ्कर का विवर्तवाद एवं परिणामवाद दोनों में विश्वास—वेदान्ती शङ्कराचार्य तो 'विवर्तवादी' हैं किन्तु भक्त शङ्कराचार्य परिणामवादी हैं । आचार्य शङ्कर 'सौन्दर्यलहरी' में इसी 'परिणामवाद' का प्रतिपादन करते हैं— 'मनस्त्वं व्योमस्त्वं, मरुदसि मरुत्सारथिरसि । त्वमापस्त्वं भूमिस्त्वयि, परिणतायां नहि परम् ॥ त्वमेव स्वात्मानं परिणमयितुं विश्ववपुषा । चिदानन्दाकारं शिवयुवति भावेन विभृषे ॥'२ आभासवाद एवं प्रतिबिम्बवाद—शैव तांत्रिक दृष्टि आभासवाद की भी पोषक है । संकुचित रूप से जो किसी भी भाव, सत्ता या पदार्थ का प्रकाशन होता है उसका अभिधान है—'आभास' : 'आभासनं—आ ईषत् संकोचेन भासनं प्रकाशना ॥'३ आचार्य अभिनवगुप्तपादाचार्य ने प्रतिबिम्ब को 'आभास' संज्ञा दी है । 'भासन- सारतैव हि प्रतिबिम्बता ।' 'इह अवभासनसारमेव प्रतिबिम्बतत्त्वम्' । निष्कर्ष—'आभास' के दो पक्ष हैं— (क) विमर्शसमवेत 'प्रकाश' का संकुचित या अपूर्ण आत्मप्रकाशन (ख) विमर्शसमन्वित 'प्रकाश' रूपी मुकुर में अनतिरिक्त होते हुए भी अतिरिक्तवद् जड़चेतन निखिलविश्व का प्रतिबिम्बन ॥ १. सौभाग्यभास्कर (पृ० १५१) । २. सौन्दर्यलहरी । ३. ईश्वरप्रत्यभिज्ञा वि०वि० (२ वि० २) ।