भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 178

प्रथमः निष्यन्दः ७७ उत्पलदेवाचार्य ने 'प्रत्यभिज्ञाकारिका' (३२) में 'अवभास' की दृष्टि का प्रतिपादन किया है— 'वर्तमानावभासानां, भावानांमवभासनम् । अन्तःस्थितवतामेव, घटते बहियत्मना ॥'१ अर्थात् 'प्रत्यक्षेऽपि यावदर्थानां भेदेनावभासः प्रमात्रन्तर्लीनानामेव सतां युक्तः ।२ अन्तःस्थित सत्ता का बहिःप्रकाशन ही आभासन है यथा कच्छप का अपने अंगों को अपने भीतर सिकोड़कर पुनः उन्हें बाहर निकालना ।। चिदात्मा भी इसी प्रकार स्वलीन सत्ता का बहिःप्रकाशन किया करता है— आभासवाद—चिदात्मैव हि देवोऽन्तः स्थितमिच्छावशाद् बहिः । योगीव निरुपादानमर्थजातं प्रकाशयेत् ।। ३८ ।।३ अर्थात्—चित्तत्त्वमेवेश्वरत्वात्स्वात्मरूपतयोपपन्नाभासरूपमनन्तशक्तित्त्वादिच्छावशा- न्मृदादिकारणं विनैव बाह्यत्वेन घटपटादिकमर्थराशिं प्रकाशयेत् ॥४ 'अवभास' का स्वभाव क्या है? 'स्वभावमवभासस्य विमर्शं विदुरन्यथा ।।' 'विमर्श' ही प्रकाश की मुख्य आत्मा है और अवभासों का स्वभाव भी—'प्रकाशस्य मुख्य आत्मा प्रत्यवमर्शः' (स्वभावमवभासस्य विमर्श')५ परमात्मा व्यावहारिक जगत् के व्यवहारानुसार ही स्वेच्छापूर्वक आन्तर अर्थजातों को बाहर प्रकाशित किया करता है— 'तदेवं व्यवहारेऽपि प्रभुर्देहादिमाविशन् । भान्तमेवान्तरर्थौघमिच्छया भासयेद्बहिः ।।' (५८)६ प्रतिबिम्बवाद—'जगत्' शिव से पृथक् बाहर कुछ भी नहीं है। दर्पण से अलग प्रतिबिम्ब की कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं होती अतः दर्पण से पृथक उसका स्वतन्त्र देश भी नहीं होता । प्रतिबिम्ब कोई कठिन वस्तु नहीं अन्यथा उसका दर्पण से पृथक् देश होता है। प्रतिबिम्ब में घनता न होने से इसका कोई पूर्ववर्ती रूप भी नहीं होता । काल पूर्वापरभावसत्ताक होने से प्रतिबिम्ब में काल भी नहीं है। घनता न होने से उसमें परिमाण भी नहीं है। उसी एक ही दर्पण में अनेक प्रतिबिम्बों के एक साथ पड़ने पर भी उनमें परस्पर संश्लेष नहीं होता । अन्य पदार्थों का भी एक साथ ही प्रतिबिम्बत होने के कारण अन्योन्य संग न होना भी सही नहीं है। इसे अवस्तु भी नहीं कह सकते । आभास- मात्रसार होने के कारण उसमें निजी स्वतन्त्रता भिन्न सत्ता की विद्यमानता देखना भी उपपन्न नहीं है 'दर्पणविधि' पर ध्यान दें— 'न देशो नो रूपं न च समययोगो न परिमा । न चान्योन्यासंगो न च तदपहानिर्न घनता ।। न चावस्तुत्वं स्यान्न च किमपि सारं निजमिति । ध्रुवं मोहः शाम्येदिह निरदिशद्दर्पणविधिः ॥'७ साधारण रूप से जो प्रतिबिम्ब क्रिया होता है उसमें बिम्ब पृथक् होता है—वह १-६. प्रत्यभिज्ञाकारिका—उत्पलदेवाचार्यः । ७. अभिनवगुप्तपाद—तंत्रालोक (ई०प्र०वि०वि०) ।

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