स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८ स्पन्दकारिका वस्त्वन्तररूप है—किन्तु विमर्श शक्ति अपने स्वातन्त्र्य के ऐश्वर्य से पृथक् बिम्ब के बिना ही स्वस्वरूपभित्ति पर विश्वाकार में अपने को प्रतिबिम्बित करती है— ‘अन्तर्विभाति सकलं जगदात्मनीह, यद्वद्विचित्र रचना मुकुरान्तराले । बोधः पुनर्निजविमर्शनसारवृत्या, विश्वं परामृशति नो मुकुरस्तथा तु ॥’ ‘अवभासन’ है क्या? ‘अवभासनं विकल्पघनीभावेन स्फुरणम्’ ‘उल्लेखन’ क्या है? उल्लेखनं मनसि कल्पनम्’ (भास्करी) जगत् अवभासन एवं उल्लेखन है । आत्मा की सभी अवस्थाओं में अविचल एकरूपता जाग्रदादिविभेदेऽपि तदभिन्ने प्रसर्पति । निवर्तते निजात्रैव स्वभावादुपलब्धृतः ॥ ३ ॥ जाग्रत् आदि भेदात्मक अवस्थाओं के मध्य भी वह (अभिन्न रूप में रहने वाला संवित् तत्त्व) अभिन्न रूप में है । (अपनी स्वरूपावस्था में ही समान रूप से) (वेदक के रूप में) प्रसरण करता रहता है । (अतएव इन विभिन्न अवस्थाओं की विद्यमानता में भी वह वेदक संवित् तत्त्व) अपने स्वस्वरूप से कभी निवृत्त (च्युत) नहीं होता ॥ ३ ॥
- सरोजिनी * तन्त्रालोक में पाँच अवस्थाओं का उल्लेख किया गया है—‘जाग्रत स्वप्न सुषुप्तं च तुर्यं च तदतीतकम् । इति पञ्च पदान्याहुः ॥’ (तं० १०.२२८) शिवसूत्रकार कहते हैं कि ‘ज्ञान’ ही जागृतावस्था है—‘ज्ञानं जाग्रत्’ (१।८) वस्तु शून्य शाब्दिक ज्ञान ‘विकल्प’ है । ‘स्वप्नो विकल्पः ॥ (१।९) पञ्चकंचुकावृत अविवेकी ज्ञान ही ‘सुषुप्ति’ है ‘अविवेको माया सौषुप्तम्’ (१।१०) । निजात् स्वभावात् नैव निवर्तते—भट्टकल्लट (स्पन्दकारिकावृत्ति)— १. न तस्य स्वरूपम् आव्रियते यस्माद् उपलब्धरूपत्वं त्रिष्वपि पदेषु साधारणम् २. न तस्य स्वरूपान्यथाभावः ॥’ ‘निजात’ = अपने आत्मीय । उपाधि शून्य स्वस्वरूप । ‘स्वभाव’ = स्वरूप ‘न निवर्तते’ = अन्यथा स्वरूप ग्रहण नहीं करता है ॥ (रामकण्ठ) ॥ उसका स्वभाव कैसा है? ‘उपलब्धृतः’ = उपलब्धक, ज्ञाता । अनुभविता ॥ (रामकण्ठ) ॥ उत्पलदेव इस कारिका के प्रारंभ में प्रश्न उठाते हैं— ‘सर्ववृत्युपसंहारो निरोधो मास्तु तस्य तु । जाग्रदाद्यस्ववस्थासु कुतः स्यादनिरुद्धता ?’ (‘स्पन्दप्रदीपिका’) उत्पलाचार्य कहते हैं कि ‘भले ही उसका (ज्ञानस्वरूप आत्मा का) सर्ववृत्युप- संहाररूप निरोध न हो किन्तु जाग्रत्; स्वप्न, सुषुप्ति आदि अवस्थाओं में वह अनिरुद्ध कैसे रह सकता है? इसी प्रश्न के उत्तर में ग्रन्थकार ने तृतीय कारिका कही है । ग्रन्थकार