भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 180, कुल 519 में से

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पृष्ठ 180

प्रथमः निष्यन्दः ७९ का कथन है कि—यह सत्य है कि जाग्रत आदि अवस्थायें परिवर्तित होती रहती हैं किन्तु वे सभी आत्मसंवित् से अभिन्न ही हैं। अवस्थाओं के भिन्न-भिन्न होने पर भी 'स्पन्दतत्त्व' अपने निज उपलब्धिमात्र स्वभाव से च्युत नहीं होता क्योंकि वह उपलब्धा है। उपलब्धा तीनों अवस्थाओं में समान रूप से रहता है। भेद अवस्थाओं में होता है अवस्थाता में नहीं। विष-वृक्ष का अंकुर क्या छोटा क्या बड़ा विष में भेद नहीं होता— ‘अवस्थास्वेव भेदोऽयं नावस्थातुः कदाचन । यथा विषस्यांकुरादौ तच्छक्तेर्न तु भिन्नता ॥ इति ॥’१ जाग्रत् एवं स्वप्न में संवेदन प्रसिद्ध है। सुषुप्ति के उत्तरकाल में भी सुख-निद्रा का संवेदन होता है। संवेत्ता अक्षुण्ण है। जल की लहरियों के साथ प्रतिबिम्ब हिलता है' किन्तु चन्द्रमा के साथ उस क्रिया का स्पर्श नहीं होता— ‘वेल्लत्सु प्रतिबिम्बेषु जलस्पन्दानुवर्तिषु । यथेन्दोर्न क्रियावेशस्तथाऽत्र परमात्मनः ॥’२ अवस्थायें नाचती हैं, अपना रूप बदलती हैं, किन्तु परमात्मा से उनका संबन्ध नहीं है। अंग की कोई भी चेष्टा अंग से भिन्न नहीं प्रत्यूत् अभिन्न है उसी प्रकार कोई भी भेद परमात्मा की अंग-चेष्टा ही है। द्रष्टा इन्द्रियों से अर्थ-ग्रहण करता है तो ‘जाग्रत्’, और उनके बिना केवल मन से अर्थ-ग्रहण करता है तो ‘स्वप्न’ और जहाँ न अर्थ है न स्मरण वह है ‘सुषुप्ति’। किन्तु आत्मा शुद्ध बोधैकस्वरूप है—ज्यों का त्यों है। यही उसकी तुरीयता है—३ अक्षैर्योऽर्थग्रहो द्रष्टुस्तज्जाग्रदिति कथ्यते । यत्तैर्विनार्थस्मरणं मनसा स्वप्नसंज्ञितम् ॥ यत्रार्थस्मरणे नस्तत् सौषुप्तमुदाहृतम् । शुद्धबोधैकरूपो योऽवस्थाता सैव तुर्यता ॥४ किसी किसी का कथन है कि अवस्थाएँ तो विश्व के अन्तर्गत हैं किन्तु अवस्थाता नहीं। प्रत्यभिज्ञा आदि युक्ति से उसका खण्डन करने के लिए ही कारिकाकार ने अग्रिम कारिका कही है— अवस्था एवं विश्वान्तर्नावस्थातेति ये जगुः । प्रत्यभिज्ञादियुक्त्येयं तन्निरासाय कारिका ॥५ ‘जाग्रदादि’ = जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति (तुरीय, तुरीयातीत) अवस्थायें। यद्यपि ईश्वर तत्त्व किसी के द्वारा भी निरुद्ध नहीं किया जा सकता किन्तु जाग्रतादि अवस्थाओं में वह गुप्त रहता है और किसी के अनुभव में नहीं आता। ग्रन्थकार तर्क करता है कि प्रतिपक्षी मेरे कथन को स्वीकार नहीं करेगा क्योंकि ऊपर उठाई गई शंका अद्यावधि अनुत्तरित है। इसी तारतम्य में ग्रन्थकार आगे कहता है कि यद्यपि व्यक्तिगत विभिन्नताओं के प्रवाह में जो कि जाग्रत आदि अवस्थाओं से पृथक्

१-५. उत्पलाचार्य—स्पन्दप्रदीपिका।

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