भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 189, कुल 519 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 189

८८ स्पन्दकारिका मनोमात्रपथेऽप्यक्षविषयत्वेन विभ्रमात् । स्पष्टावभासा भावानां सृष्टिः स्वप्नपदं मतम् ॥ ५२ ॥ सर्वाक्षगोचरत्वेन या तु बाह्यतरा स्थिरा । सृष्टिः साधारणी सर्व प्रमातॄणां स जागरः ॥ ५३ ॥ इति विस्तरतः प्रोक्ते लोकयोग्यनुसारतः । जगरादित्रयेऽमुष्मिन्नवधानेन जाग्रतः ॥ ५४ ॥ ४. तुर्या— शक्तिचक्रानुसंधानाद्विश्वसंहारकारणात् । तुर्याभोगमयां भेदरख्यातिरख्यातिहारिणी ॥ ५५ ॥ ५. तुर्यातीत—स्फुरत्यविरतं यस्य स तद्वाराधिरोहतः । तुर्यातीतमयं योगी प्रोक्त चैतन्यमामृशन् ॥ वरदराज—'शिवसूत्रवार्तिकम्' सुषुप्ति—ज्ञानज्ञेयस्वरूपायाः शक्तेरनुदयो यदा । चिद्रूपस्याविवेकः स्यादसावेवाविमर्शतः ॥ सैव मायावृति जालपोषकत्वात्प्रकीर्तिता । अर्थस्मृतीस्वात्मसंस्थे चिद्रूपे सा सुषुप्तता ॥—शि०सू०वा० यस्तु अविवेको विवेचनाभावोऽख्यातिः, एतदेव मायारूपं सौषुप्तम् ॥ (शिवसूत्रविमर्शिनी) अर्थस्मृती स्वात्मसंस्थे चिद्रूपे सा सुषुप्तता ॥ (शि०सू०वा०) ग्राह्यग्राहकभेदासंचेतनरूपश्च समाधिः सौषुप्तम्, इत्यप्यनया वचो युक्त्या दर्शितम् ॥ (शि०सू०वा०) दृष्टि स्वभावस्य विभोरन्तर्नव तयोदयः । विकल्पानां स्मृतः स्वप्नस्तदबाह्यार्थनिरासतः ॥ (शि०सू०वा०) जाग्रत अवस्था—जिस अवस्था में पशुप्रमाता की इन्द्रियाँ सामान्य लोगों के विषयों को ग्रहण करने हेतु स्पन्दायमान हो उसे जाग्रत् अवस्था कहते हैं । इस अवस्था के प्रमेय प्रमाता की कल्पना या स्वप्नाश्रित संस्कारों से न उत्पन्न होकर जागतिक स्तर पर एक व्यावहारिक सत्य के रूप में स्थित रहते हैं और एक ही साथ अनेक प्रमाता उनको इन्द्रियगोचर कर सकते हैं । अन्तःकरण एवं ज्ञानेन्द्रियों की वृत्तियों से उत्पन्न सुख, दुःख, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध, ईर्ष्या, प्रेम, राग, विराग के ज्ञान की इसी व्यावहारिक सत्य की अवस्था को जाग्रत् अवस्था कहते हैं । स्वप्नावस्था—जाग्रतावस्था के बाधित होने पर एवं बाह्य जगत् से ऐन्द्रिय सम्बन्धों के टूट जाने पर जो अन्तर्मुखी काल्पनिक अवस्था उत्पन्न होती है और जिसमें प्रमाता, प्रमेय, प्रमा, द्रष्टा-दृश्य-दर्शन केवल मन की वृत्तियाँ होती हैं और जो जागने पर बाधित हो जाती है वही संकपविकल्पात्मिकावस्था स्वप्नावस्था है । यह अन्य प्रमाताओं को अज्ञात एवं अननुभूत रहती है, रजोगुण प्रधान है, स्वल्पस्थायी है और जाग्रतावस्था में अस्पन्दित है ।