स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ स्पन्दकारिका २. स्पन्दसूत्रकार का 'शंकर'—'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगतः प्रलयोदयौ तं शक्ति चक्रविभवप्रभवं शंकरं... ... ...' है। यह 'अस्मद्रूपसमाविष्ट' नहीं है । 'अस्मद्रूपसमाविष्ट' शब्दावली 'प्रत्यभिज्ञोपरान्त योगी के ज्ञानात्मक अनुभव की दशा है अतः यहाँ उपाय (साधनोपाय) भी व्यर्थ हैं अतः इस 'शिवदृष्टि' में साधना- प्राधान्य न भी हो तो उचित ही है और ज्ञानमार्ग (अहं सः एव) के लिए उपासना आवश्यक भी नहीं है—'प्रत्यभिज्ञा' ही साधना है और 'प्रत्यभिज्ञा' ही 'साध्य' है । स्पन्दसूत्रकार 'नमः' नहीं कहते 'स्तुमः' कहते हैं । सोमानन्द 'शिव' को नमस्कार करते हैं किन्तु स्पन्दसूत्रकार 'शंकर' की स्तुति करते हैं । 'स्तुति' 'स्तुत्य' 'स्तोत्र' 'स्तुतिकर्ता' के भाव ज्ञानमार्ग में संभव नहीं अर्थात् 'प्रत्यभिज्ञा' (तत् त्वं असि) में संभव नहीं । यह केवल भक्ति—उपासना—प्रेममार्ग में ही संभव है । 'प्रत्यभिज्ञा' ज्ञानमार्गीय अद्वैत है और 'स्तुति'-द्वैतात्मक भक्ति है । 'स्पन्द' नामकरण क्यों? इसलिए कि यह सिसृक्षात्मकता का सूक्ष्म संकल्प है—संकल्पात्मक गतिमयता है—निस्पन्द परमशिव में यत्किंचिच्चलन रूप अहं विमर्श है—अहं प्रत्यवमर्श रूप एक विमर्शात्मक चलता है । [३] स्पन्द 'स्पदि किंचिच्चलने' धातु से निष्पन्न होने के कारण 'स्पन्द' शब्द अल्प- चलनात्मक अर्थ में प्रयुक्त होता है ।१ स्पन्द शब्द विकारों के अर्थ में भी प्रयुक्त हुआ है—'तेन षोडश स्पन्दाः विकारा' । 'षोडशस्पन्दसन्दोहे' (योगिनी हृदय के इस श्लोक) की व्याख्या करते हुए भास्करराय ने 'स्पन्द' को विकार के जो अर्थ में प्रयुक्त किया है । समस्त द्वैत स्पन्द है—गौड़पादाचार्य कहते हैं कि विषय एवं इन्द्रियों के सहित यह संपूर्ण द्वैत चित्त का स्फुरण मात्र है— 'चित्त स्पन्दितमेवेदं ग्राह्यग्राहकमद्वयम्' ।२ 'सर्वं ग्राह्यग्राहकवच्चित्तस्पन्दितमेव' ।३ 'षट्त्रिंशत् तत्त्वसंदोह' में कहा गया है कि—विश्वोन्मीलन की आद्या इच्छाशक्ति ही शिव तत्त्व है और इसी को 'स्पन्द' कहते हैं । आचार्य क्षेमराज 'शिवसूत्रविमर्शिनी' में कहते हैं कि 'स्पन्दतत्त्व' शंकरात्मक एवं चैतन्यात्मक, सर्वदा स्वप्रकाश एवं परमार्थ सत् है—शंकरात्मक स्पन्दतत्त्वरूपं चैतन्यं सर्वदा स्वप्रकाशं परमार्थसत् अस्ति ।'४ यह शिव की एक अनुत्तरा शक्ति है और प्रतिभा १. भास्कर राय—'सेतुबंध' (चक्रसंकेत में श्लोक २१ की व्याख्या) । २. माण्डूक्यकारिका—'अलातशान्तिप्रकरण' । ३. शांकर भाष्यः माण्डूक्यकारिका । ४. शिवसूत्रविमर्शिनी ।