भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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परिचय एवं पृष्ठभूमि १९ एवं चमत्कार भी है—अभिनवगुप्तपादाचार्य 'परात्रिंशिका विवृति' में इसी शक्ति को नमस्कार करते हैं— नरशक्तिशिवात्मकं त्रिकं, हृदये या विनिधाय भासयेत् । प्रणमामि परमानुत्तरां निजभासां प्रतिभाचमत्कृतिम् ॥१ 'तन्त्रालोक' (५ आह्निकः श्लोक ५७) में अभिनवगुप्त कहते है— उन्मना और 'स्पन्द'—'समना' भूमि को अतिक्रान्त करके 'उन्मना' का परिवेश प्राप्त होता है । 'समना' तक अनन्तपाश हैं । भैरवीय चिद्रूप में प्रवेश के लिए 'समना' को अतिक्रान्त करना अपरिहार्य है । उन्मना के अन्तिम छोर पर ऊर्ध्वकुण्डलिनी के अधिष्ठान में यहाँ 'विसर्ग' की सुषमा का साम्राज्य उल्लसित है । उसमें शाश्वत 'स्पन्द' का उच्छलन होता रहता है । प्राणना, व्यापार एवं 'स्पन्द'— 'तन्त्रालोक' (आ० ५ । श्लोक १८) की व्याख्या में आचार्य जयरथ ने 'विवेक' में कहा है कि—आन्तरउद्योगरूपा, जीवनात्मिका मुख्य वृत्ति 'प्राणना' है । आह्निक ६ के १२वें श्लोक में प्राणना व्यापार के निम्न पर्याय बताए गए हैं— 'आन्तर स्पन्द' 'स्फुरत्ता' 'विश्रान्ति' 'जीव' 'हृत' और मति । इयं सा प्राणना शक्तिरान्तरोद्योगदोहदा । स्पन्दः स्फुरत्ता, विश्रान्ति जीवो हृत्प्रतिभामतिः ॥ 'विमर्श' 'संवित् शक्ति' और 'स्पन्द'— परबोधमय देवाधिदेव की सर्वज्ञ, सर्वज्ञानशालिनी पराशक्ति को 'विमर्श' कहते हैं । संवित् शक्ति में समस्त परामर्श उल्लसित हैं । उसे ही 'विमर्श', 'स्पन्द', 'हृदय', विसर्ग आदि कहते हैं— 'इह खलु इदमेव संविदः संवित्त्वं यत् पराम्रष्टृत्वं नाम यस्य विमर्शः, 'स्पन्दो' 'हृदय' विसर्ग, इत्यादयः सहस्रशो व्यपदेशाः । (विवेक) तस्य देवातिदेवस्य परबोधस्वरूपिणः । विमर्शः परमाशक्तिः सर्वज्ञा सर्वशालिनी ॥ ७७ (तन्त्रालोक आ० ५) इसी विमर्श का अपर पर्याय 'स्पन्द' है । 'विमर्श' संवित-'स्पन्द' ही है—संवित्स्पन्दस्त्रिशक्त्यात्मा संकोचविकासवान् ॥ (तन्त्रालोक आ० ५।७९) इदमात्मक विमर्श एवं स्पन्द—'विशेष स्पन्द'—इदमात्मक विमर्श ही विशेष नामक 'स्पन्द' है इसे ही 'औन्मुख्य' भी कहते हैं— 'ततः स्वातन्त्र्यनिर्मेये विचित्रार्थक्रियाकृति । विमर्शनं विशेषाख्यः 'स्पन्द' औन्मुख्य संज्ञितः ॥ (तन्त्रालोक ५।८१) १. मालिनीवार्तिक (अभिनवगुप्त) ।

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