स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० स्पन्दकारिका 'शिवसूत्र' का प्रथम सूत्र है—'चैतन्यमात्मा' । ब्रह्मसूत्रकार की जिज्ञासा ब्रह्म की है—'अथातो ब्रह्म जिज्ञासा' किन्तु शिवसूत्रकार की जिज्ञासा ब्रह्म की नहीं चैतन्यस्वरूप आत्मा की है । 'शिवसूत्र' के प्रथम व्याख्याकार तो वसुगुप्त हैं और दूसरे व्याख्याकार सोमानन्दपाद हैं । 'शिवसूत्र' की व्याख्यायें—(अनन्यपूर्व प्राथमिक व्याख्यायें) । १) ग्रन्थकार—वसुगुप्त ग्रन्थ—'स्पन्दसूत्र' । २) ग्रन्थकार—सोमानन्द ग्रन्थ—'शिवदृष्टि' । ऐसा माना जाता है कि शिवसूत्रों का उद्धार करके वसुगुप्त ने इसको अपने शिष्यों को पढ़ाया । उन्होंने इसकी व्याख्या की । उनकी यह शिवसूत्रीय व्याख्या ही 'स्पन्दसूत्र' है । वसुगुप्ताचार्य के शिष्य सोमानन्द ने जो 'शिवदृष्टि' नामक ग्रन्थ लिखा उसे भी शिवसूत्रों की ही व्याख्या माना जाता है । 'शिवदृष्टि' शब्द में 'शिव' शब्द क्या शिवसूत्रों की ओर इंगित नहीं करता ? 'शिवदृष्टि' का अर्थ—'शिवसूत्रों की दार्शनिक दृष्टि' लिया जा सकता है । यदि इसका अर्थ 'शिव की दृष्टि' भी लिया जाय तो चूँकि शिव की दृष्टि एवं शिवसूत्र तो अभिन्न ही हैं क्योंकि शिवसूत्र शिव-प्रणीत ही तो हैं अतः शिवदृष्टि उन शिव की दृष्टि ही तो है । ३) ग्रन्थकार—भट्टकल्लट, ग्रन्थ—'स्पन्दसर्वस्व' । कतिपय ध्यातव्य बिन्दु— 'स्पन्दकारिका' की भाँति स्पन्दशास्त्र पर अन्य स्वतन्त्र ग्रन्थ क्यों नहीं लिखे गए? 'स्पन्दसर्वस्व' (भट्टकल्लट) 'स्पन्दनिर्णय' (क्षेमराज) 'स्पन्दसन्दोह' (क्षेमराज) 'स्पन्द- प्रदीपिका' (उत्पल वैष्णव) 'स्पन्दकारिकाविवृति' (रामकण्ठाचार्य)—केवल 'स्पन्दसूत्र' की टीकायें या व्याख्यायें हैं किन्तु स्पन्दशास्त्र पर कोई अन्य स्वतन्त्र ग्रन्थ नहीं लिखा गया । सोमानन्दपाद प्रत्यभिज्ञादर्शन के संस्थापक हैं और उन्होंने स्पन्दसूत्रों को प्रमाण के रूप में 'शिवदृष्टि' में प्रस्तुत भी किया है किन्तु समस्त आचार्यों द्वारा स्पन्दसूत्रों को प्रमाण के रूप में उद्धृत किये जाने के बाद भी उनके द्वारा इस दर्शन पर स्वतन्त्र ग्रन्थ क्यों नहीं लिखा गया? वैसे क्षेमराज ने 'स्पन्दनिर्णय' में 'स्पन्दसूत्र' पर लिखी गई अनेक विवृत्तियों का भी उल्लेख किया है यथा भट्टलोल्लट की वृत्ति एवं अन्य टीकायें । इन विभिन्न टीकाकारों की दृष्टि में भी भेद रहा है । प्रत्येक टीकाकार ने किसी विशेष आध्यात्मिक दृष्टिकोण को अपनाकर ही सूत्रों की व्याख्या की है । भट्टकल्लट भी वसुगुप्त के शिष्य थे और सोमानन्दनाथ भी । भट्टकल्लट ने पर- तत्त्व की विमर्श प्रधानता के सिद्धान्त को आत्मीकृत करके स्पन्दसूत्र पर वृत्ति लिखकर 'स्पन्द सम्प्रदाय' का शिलान्यास किया । 'स्पन्दकारिका' के अतिरिक्त स्पन्दतत्त्व पर मौलिक ग्रन्थ क्यों नहीं लिखे गए ? यह अनुसंधेय बिन्दु है ? स्पन्द सूत्रों का प्रति- पाद्य विषय सतत् स्पन्दमयी पारमेश्वरी विमर्श शक्ति है किन्तु प्रत्यभिज्ञा दर्शन का प्रधान प्रतिपाद्य शिव है ।