स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 22, कुल 519 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिचय एवं पृष्ठभूमि २१ १. 'स्पन्द सूत्र' और शिवसूत्र— 'स्पन्दसूत्र' के प्रथम निष्यन्द— 'स्वरूप स्पन्द' की २५ कारिकाओं में मुख्यतः 'स्पन्द' या आत्म तत्त्व के स्वरूप पर ही प्रकाश डाला गया है । 'शिवसूत्र' में प्रथम सूत्र चैतन्यस्वरूप आत्मा से सम्बद्ध है और सूत्र है— 'चैतन्यमात्मा' ।। सोमानन्दनाथ की 'शिवदृष्टि' (शिवसूत्र की व्याख्या माना जाने वाला ग्रन्थ) का प्रथम श्लोक (मंगलाचरण के श्लोक को छोड़कर भी शिवसूत्र की भाँति आत्मपरक ही है—) 'शिवदृष्टि' का (मंगलाचरण को छोड़कर) प्रथम श्लोक— 'आत्मैव सर्वभावेषु स्फुरन्निर्वृतचिद्विभुः । अनिरुद्धेच्छाप्रसरः प्रसरद्दृक्क्रियः शिवः ।। (१।२) है । सोमानन्दपाद कहते हैं कि समस्त भावों (सत्ताओं) में आत्मा ही स्फुरित हो रही है । उसका प्रसार अनिरुद्ध है । वह चिद्रूप है । शिव चिद्रूप, विभु, अरुद्ध, इच्छाप्रसर, स्फुरणशील, दृक् एवं क्रियावान् है । 'स्पन्दसूत्र' का द्वितीय सूत्र भी इन्हीं बिन्दुओं का प्रतिपादक है । कहीं सोमानन्दनाथ ने इसी स्पन्द सूत्र की व्याख्या के रूप में तो 'आत्मैव सर्वभावेषु ... शिवः ।।' नहीं लिखा है? इस सूत्र में भी यही बिन्दु प्रतिपादित हैं— आत्मा— 'यत्र स्थितमिदं सर्वं कार्यं'— अर्थात् जिस स्पन्दात्मक विमर्श भूमिका (आत्मा) या शक्ति में यह समस्त कार्यरूप जगत् अभेदरूप में अवस्थित है । अर्थात् जगत् 'कार्य' है और उसका कर्ता आत्मा या शिव है न कि वेदान्तियों का निष्क्रिय ब्रह्म । इसी आत्मा से समस्त कार्यजगत् निर्गत होता है— 'यस्माच्च निर्गतम्' । उस सत्ता के स्वरूप को कोई आवरण ढक नहीं सकता अतः उसके स्वतन्त्र प्रसार में कहीं कोई निरोध (रुकावट) नहीं है— 'तस्यानावृतरूपत्वात्' 'न निरोधोऽस्ति कुत्रचित् ।।' बन्धन— 'शिवसूत्र' में दूसरा सूत्र बंधन के स्वरूप पर प्रकाश डालता है और 'स्पन्दसूत्र' में भी आत्मा के स्वरूप पर विचार करने के अनन्तर अगले सूत्रों में भी 'बंधन' के स्वरूप पर प्रकाश डाला गया है । २. शैव दर्शन एवं उसकी साम्प्रदायिक परम्परा— शिव के पञ्चमुख—(१) ६४ तन्त्र, (२) शैवागम । कलियुगारंभ— शास्त्रों के उपदेशों + शास्त्रों + परम्पराओं का ह्रास तथा कैलासपर्वत पर भ्रमण करते समय शंकर के द्वारा श्रीकण्ठ बनकर दुर्वासा को त्रिकमत-प्रचार का आदेश । शैव सम्प्रदाय = शैवमत ──────────────────────────────────────────────────────────────────────── नकुलीश वीरशैव शैव रसेश्वर कापालिक कालामुख नाथ दसनामी त्रिक दर्शन पाशुपत (लिंगायत) सिद्धान्त सन्यासी │ ┌────────────┴────────────┐ क्रम प्रत्यभिज्ञा स्पन्द (काश्मीरीय (स्वप्नोपदेश) अद्वैतवादी शैव प्रत्यभिज्ञा)