स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९८ स्पन्दकारिका सुखादि के द्वारा सदैव छायी रहती है तथा जो कि अपनी चेतना के द्वारा ही सत्ता में बनी रहती है।' 'मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ, मैं आसक्त हूँ'—ये एवं इसीप्रकार के अन्य ज्ञान केवल एक सत्ता में रहते हैं जिसमें कि आनन्दादिक अवस्थायें अनुस्यूत रहती हैं।१ वहीं मैं, जो कि 'सुखी हूँ, दुःखी हूँ,' का अनुभव करता है, वही 'सुखानुशय (सुख के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध) के कारण रागी एवं दुःखानुशय के कारण द्वेषवश द्वेषी हो जाता है। उसके ये सभी प्रत्यय (ज्ञान) एक ही नित्य आत्मतत्त्व में पाये जाते हैं। एवं ये प्रत्यय एक नित्य एवं साक्षी रूप में स्थित आत्मतत्त्व में विश्राम ग्रहण करते हैं। अन्यथा अवबोधों के अन्तर्सम्बन्धों एवं उनके प्रभावों पर आधृत अन्य विचार अपने आप नष्ट हो जायेंगे तथा विचार गतिशील नहीं हो सकते।२ 'च'—और इस श्लोक में 'च' शब्द तीन बार प्रयुक्त हुआ है। वह सम्बन्ध को विकसित करता है क्योंकि यह एक वस्तु के साथ दूसरे का संबन्ध द्योतित करता है। 'एक में' शब्द, 'उसमें' शब्द द्वारा, विशेषण के रूप में प्रयुक्त हुआ है। अर्थ यह है कि—जिसमें सुखादिक अवस्थायें अनुस्यूत हैं। ये ऐसे अन्तर्विद्ध हैं यथा माला में मणियों के दाने।३ 'ताः' = वे। वे क्षणवादी दार्शनिक जो कि ज्ञान की क्षणभंगुरता में विश्वास रखते हैं सब कुछ क्षणिक मानते हैं। वे यह नहीं समझ पाते कि क्षण-क्षण परिवर्तित होने वाली घटनाओं की परिवर्तन परम्परा या क्षणभंगुरता की दृश्यावलियों को तो केवल वही देख सकता है जो कि इन सभी परिवर्तनों एवं क्षणक्षण की घटनाओं से अप्रभावित रहकर स्थायी सत्ता रखकर इनकी क्षण-क्षण में होने वाली विनाश लीलाओं को देख सके। यदि ऐसी कोई स्थायी एवं अक्षणात्मक सत्ता मान ली जाती है तो 'क्षणिकवाद सिद्धान्त' अपने आप खण्डित हो जाता है।४ 'ज्ञान' स्मृति से उत्पन्न होते हैं। 'स्मृति' भूतकालिक घटना का पुनर्जागरण है। यदि प्रत्येक वस्तु क्षण-क्षण में परिवर्तित हो जाती है तो 'स्मृति' संभव ही नहीं हो सकती क्योंकि तब तक स्मरण करने वाला संवेत्ता परिवर्तित हो जायेगा। अतः क्षण भर के पूर्व का संवेत्ता एक क्षण के बाद तो रह नहीं जायेगा (प्रत्युत एक क्षण के बाद एक नया संवेत्ता उत्पन्न हो जाएगा) अतः उसे भूतकाल की ये स्मृतियाँ कैसे हो सकती हैं? आचार्य क्षेमराज एक प्रश्न यह भी उठाते हैं कि मूलभूत यथार्थतत्त्व वह तो हो नहीं सकता जिसमें कि सुखादिक अवस्थायें अनुस्यूत रहती हैं अतः वह सुखादि से अनुस्यूत चेतना आत्मा भी नहीं हो सकती क्योंकि आत्मा का स्वरूप लक्षण चैतन्य है—'चैतन्यमात्मा' ।५ जब यह आत्मा अपनी निजी अशुद्धियों के द्वारा उपहित हो जाता है उस स्थिति में अपने यथार्थ स्वरूप को आच्छादित कर लेता है और ऐसी स्थिति में ही सुखदुखादि अवस्थाओं का अनुभव करता है। सुखदुखादि का अनुभविता 'पुर्यष्टक' है न १. स्पन्दनिर्णय। २-४. क्षेमराजाचार्य—स्पन्दनिर्णय। ५. शिवसूत्र।