स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 200, कुल 519 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः निष्यन्दः ९९ कि स्वस्वरूपावस्थित पूर्णचेतन संवित् तत्त्व । इस स्थिति में भी उसके लिए सुखदुखादि का स्थायी या नित्यात्मक अवरोध नहीं है क्योंकि वह उनसे मुक्त भी हो सकता है । कारिकाकार ने 'मैं कृश हूँ' 'मैं पृथुल हूँ'—इत्यादि न कहकर 'मैं सुखी हूँ—मैं दुःखी हूँ'—इत्यादि का प्रयोग क्यों किया? इसलिए किया क्योंकि ग्रन्थकार यह प्रस्तुत करना चाहता है कि—'शिव के साथ मेरी निजी आत्मा स्वरूप से अभिन्न है'—यह अनुभव प्रत्येक व्यक्ति करता है । यह अनुभव पुर्यष्टक की स्थिति में भी होता है । किन्तु ये अनुभव ज्ञानी एवं आनन्दमय शङ्कर के यथार्थ स्वरूप में कहीं भी स्थान नहीं पाते । शङ्कर ही यथार्थ सत्य है । यथार्थ तत्त्व सुखदुःखादि से उपहित नहीं है । साधक पुर्यष्टकत्व से मुक्ति की साधना का लक्ष्य रखकर आगे बढ़ता है । 'मैं सुखी हूँ' 'मैं दुःखी हूँ'—आदि के प्रत्यय शरीर, इन्द्रिय, मन एवं जागतिक वासनाओं से ऊपर उठने पर नष्ट हो जाते हैं अन्तर्पथ की यात्रा के समय भी ऐसा ही होता है । 'सम्यक् पुर्यष्टक शमनाय एवं आस्थेय इति ॥'१ आचार्य क्षेमराज कहते हैं कि रहस्यगुरुप्रवर, अनुभवागमज्ञ, कारिकाकार ने युक्तियों, तर्कों एवं उपपत्तियों द्वारा समस्त वादों की अनुपपन्नता का अनुवदन करते हुए स्पन्दतत्त्व का ही प्रतिपादन किया है । 'स्पन्दतत्त्वमेवास्तीति प्रतिजानाति ।'२ इसीलिए वे अगले श्लोक में कहते हैं कि जहाँ सुख, दुःख, ज्ञाता एवं ज्ञेय नहीं है एवं जहाँ क्षणभंगुरता (अनित्यता) की भी अवस्था नहीं है वही पारमार्थिक तत्त्व है— 'न दुःखं न सुखं यत्र न ग्राह्यं ग्राहकं न च । न चास्ति मूढ़भावोऽपि तदस्ति परमार्थतः ॥ (का०५) निष्कर्ष—रामकण्ठ कहते हैं कि 'मैं सुखी या दुःखी हूँ आदि जो संवेदानायें हैं वे अन्यत्र स्थित हैं अतः यह स्पन्द तत्त्व अपने एकात्मक अविचल स्वस्वंभाव से कभी प्रत्यावर्तित या निवर्तित नहीं होता ॥३ 'आदि' = देहादिक आलम्बन ॥ ये संवेदनायें उपलब्धा स्पन्द से पृथक् तो हैं किन्तु इन भिन्न-भिन्न समस्त अवस्थाओं में एक ही संवित् तत्त्व अनुस्यूत है । १. एक ही संवित् तत्त्व उपलब्ध (अनुभवकर्ता) के रूप में अहं प्रतीति के साथ विद्यमान है ।४ २. वही माया शक्ति जनित तथाविध स्वभाव परामर्शाभाव के कारण सुखादिक अनित्य वस्तुओं का वेदक बनकर 'मैं सुखी हूँ' 'मैं दुःखी हूँ'—इस प्रकार की अनुभूतियों से संक्रान्त होकर बुद्ध्याद्यवस्था सामानाधिकरण्य प्राप्त किए हुए स्थित है । ये समस्त संवेदनायें सुख, दुःख मोह आदि अवस्थाओं में स्थित हैं । इस संवेत्ता के दो रूप हैं— १. एकः सुखाद्यात्मा वेद्यरूपः । (घरादि की भाँति) २. द्वितीय है—अहमाकार संवेदन द्वारा अपर वेदक के रूप में । १-२. स्पन्दनिर्णय । ३-४. स्पन्दकारिकाविवृति ।