भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 202

प्रथमः निष्यन्दः १०१ ‘नाम’ (बौद्ध दर्शन) ┌───────────┬───────────┬───────────┐ वेदना संज्ञा संस्कार विज्ञान (सविकल्प ज्ञान) (निर्विकल्प ज्ञान) ‘नाम’ + ‘रूप’ ──> ‘रूप’ ── ‘वेदना’ ── ‘संज्ञा’ ── ‘संस्कार’ ── ‘विज्ञान’ इन पाँच स्कंधों का समुदाय ही सन्तान रूप में प्रवाहित ज्ञानधारा है । ‘विज्ञान’ एवं ‘आलय विज्ञान’ — ‘ज्ञान सन्तान’ चेतन आत्मा का स्मरण आदि कार्यों को पूर्ण करता है । ज्ञानक्षण के दो प्रकार हैं—१. निर्विकल्प ज्ञान २. सविकल्प ज्ञान । निर्विकल्प ज्ञानक्षण = ‘स्वलक्षणाभास’¹ (किसी वस्तु का प्रथम दृष्ट्या साक्षात्कार होने पर उस वस्तु से सम्बद्ध प्राथमिक ज्ञान) जिसमें वस्तु का नामरूपात्मक विकल्प से शून्य ज्ञान निहित हो । इसमें व्यावहारिक व्यापार संभव नहीं है । ‘ज्ञानसन्तान’ किसे कहते हैं— प्रमाता के हृदय में भिन्न-भिन्न कालखण्डों में, भिन्नविषयक एवं भिन्नाकारों से सम्बद्ध ज्ञानक्षणों की अविरलधारा अजस्र रूप में प्रवाहित होती रहती है और वही है— ‘ज्ञानसन्तान’ । बौद्धों की दृष्टि में यही ज्ञान सन्तान चेतन आत्मा का स्वरूप है और यही स्मरण, संकल्प, इच्छा, पूर्वानुस्मरण आदि का आधार है । इससे भिन्न किसी अन्य नित्य आत्मा की कल्पना व्यर्थ है । नामरूपात्मक विकल्प अनन्त हैं अतः तत्सम्बद्ध सविकल्प ज्ञानक्षण भी अनन्त है । ‘मैं’ की अनुभूति ‘शरीर सन्तान’ एवं विज्ञान सन्तान (ज्ञान सन्तान) से ही हो जाती है फिर आत्मा के कल्पना की क्या आवश्यकता है— १. ज्ञान स्वलक्षणाभासात्मक होते हैं—‘स्वलक्षणाभासं ज्ञानमेकम्’ । ‘अहंप्रतीति’ इत्यादि ज्ञान के लिए किसी नित्य आत्मा की व्यर्थ कल्पना अनावश्यक है क्योंकि यह कार्य तो स्वयं ज्ञान सन्तान ही कर देता है—। ईश्वरप्रत्यभिज्ञा (१.२.२) में कहा गया है— ‘नित्यस्य कस्यचिद्द्रष्टुस्तस्या त्रानवभासतः । अहंप्रतीतिरप्येषा शरीराद्यवसायिनी ॥’² २. लोकायत की दृष्टि— चार्वाक, बृहस्पति प्रभृति नास्तिक दार्शनिकों ने अपने चिन्तन को इस प्रकार प्रस्तुत किया है— १. ‘शरीरात्मवाद’ २. ‘अपत्यात्मवाद’ ३. ‘इन्द्रियात्मकवाद’ ४. ‘प्राणात्मवाद’ ५. ‘मनसात्मवाद’ ६. ‘बुद्ध्यात्मवाद’ । लोकायतिक दर्शन के मूलभूत सिद्धान्त निम्न ────────────────────────────────────────────────────────── १. नीलप्रकाशः ‘स्वलक्षणाभासनम्’ । ‘स्वम्’ अन्यानुयायि स्वरूपसंकोचभाजि ‘लक्षणं’ देशकालाकाररूपं यस्य तस्य ‘आभासः प्रकाशनम् अन्तर्मुखं यस्मिन्— ‘ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी’ । २. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी ।