स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः निष्यन्दः १०५ सारांश— १. प्रत्येक ज्ञान के साथ कोई न कोई वैशिष्ट्य रहता ही है । रजत का ज्ञान होता है क्योंकि उसके साथ रजतत्व का वैशिष्ट्य है । किसी भी विशेषता या उपाधि का सम्बन्ध हुए बिना कोई ज्ञान उत्पन्न ही नहीं हो सकता । ‘मैं सुखी हूँ’ वाक्य में सुखत्व उपाधि (विशेषता) है जिससे कि सुख का ज्ञान संभव हो पाता है । सुख ‘सुखत्व’ गुण है । गुण के बिना गुणी, धर्म के बिना धर्मी, विशेषण के बिना विशेष्य का अस्तित्व नहीं है । इस गुण, धर्म, विशेषण या वैशिष्ट्य का संवेदक ही ‘आत्मा’ है । ‘सुखादिक गुणों का अनुभव बिना किसी अनुभविता के संभव नहीं है अतः ‘सुखादि चेत्यमानं हि क्वतन्त्र नानुभूयते ।’ (ई०प्र०वि०) आत्मा के चिदंश के द्वारा आत्मा ज्ञान का अनुभव करता है । आत्मा अचिदंश के द्वारा सुखत्व आदि उपाधियों (विशेषताओं) को प्राप्त करता है । आत्मा सुख-दुख- हर्ष-ग्लानि-भय-इच्छा-ईर्ष्या द्रोह-मोह-असूया से तद्रूप या तत्स्वरूप नहीं है प्रत्युत् तद्विशिष्ट हैं । वह आत्मा सुख, दुःख, भय, प्रेम आदि के द्वारा परिणाम-भाव प्राप्त करती है । **कुमारिलभट्ट—**आत्मा स्वयं चेतन नहीं प्रत्युत् शरीर और विषय के साथ संयोग होने की अवस्था में ‘चैतन्यविशिष्ट’ बन जाती है । इसीलिए स्वप्नावस्था में विषयादिक का सम्बन्ध च्युत हो जाने पर, आत्मा में चैतन्य नहीं रहता । अतः आत्मा जड़ भी है और बोधात्मक भी है— १. ‘इदं सुखमिदं ज्ञानं दृश्यते न घटादिवत् । अहं सुखीति तु ज्ञप्तिरात्मनोऽपि प्रकाशिका ॥ २. ‘स आत्मा अहंप्रत्ययेनैव वेद्यः ॥ ३. चिदंशत्वेन दृष्टत्वं सोऽयमिति प्रत्यभिज्ञा । विषयत्वं च अचिदंशेन, ज्ञान सुखादिरूपेण ॥ परिणामित्वम् ।। (अद्वैत ब्रह्मसिद्धिः) ॥ बौद्ध दृष्टि की पर्यालोचना— ‘मैं’ की अनुभूति से (संवेदन द्वारा) अनुमान के विषयीभूत और सुख-दुःख आदि उपाधियों से विशिष्ट वस्तु ही ‘आत्मा’ है । १. बौद्धों का दर्शन प्रकृति के बुद्धितत्त्व (विज्ञान-चित्त) तक ही सीमित हो जाता है—उसके परे आगे बढ़ ही नहीं पाता । २. यदि ज्ञान जड़ है तो किसी संवेदन को प्रकाश में कैसे ला सकता है? ३. यदि ज्ञान चेतन है तो किसी चेतन सत्ता को मानना पड़ेगा । ४. अपने को एवं विषय को प्रकाशित करना तो केवल चेतन सत्ता के ही अधिकार मात्र में है जड़तत्त्व के अधिकार में नहीं किंतु बौद्ध ऐसी चेतन सत्ता (आत्मा) स्वीकार ही नहीं करते । ‘ज्ञान सन्तान एव सत्त्वम्’ इति सौगता बुद्धि वृत्तिषु एव पर्य- वसिताः ।।' (प्र०ह० सूत्र ८ की व्याख्या—क्षेमराज)—ज्ञान-सन्तान तो बुद्धि में पर्य- वसित है फिर बुद्ध्यातीत तत्त्व की प्राप्ति कैसे होगी? ज्ञान वेद्य तो बन सकते हैं किन्तु