भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 205

१०४ स्पन्दकारिका नित्य है। आत्मा में दो अंश है—१. चिदंश २. अचिदंश। चिदंश—आत्मा द्वारा प्रत्येक ज्ञान की अनुभूति क्षमता। अचिदंश—परिणमन, परिणाम। न्याय वैशेषिक—सुख, दुःख, इच्छा, प्रयत्न आदि आत्मा के विशेष गुण हैं—। भाट्टमत—सुख दुःख आदि आत्मा के अचिदंश के परिणाम है। 'वेदान्त' 'स्पन्द', 'प्रत्यभिज्ञा' एवं 'क्रम' = आत्मा चैतन्यस्वरूप है॥ कुमारिलभट्ट = आत्मा चैतन्यस्वरूप नहीं प्रत्युत् चैतन्य विशिष्ट है। आत्मा में चैतन्य आता कहाँ से है? शरीर-विषय-संयोग के द्वारा। आत्मा में 'चैतन्य समवादी धर्म के रूप में स्थित नहीं है—शरीर-विषय का संयोग होने पर आत्मा में चैतन्य का उदय होता है। स्वप्नावस्था में शरीर-विषय-संयोग नहीं अतः आत्मा में चैतन्य भी नहीं रहता। 'आत्मा' जड एवं बोधात्मक दोनों हैं। प्रभाकर—आत्मा में क्रियाशक्ति-क्रियावत्ता नहीं है। कुमारिल = प्रत्येक वस्तु ज्ञान में आत्मा का ज्ञान नहीं होता। आत्मा ज्ञान का कर्ता एवं कर्म दोनों है। 'प्रभाकर'—एक ही वस्तु एक साथ कर्ता एवं कर्म दोनों एक साथ कैसे हो सकती है? प्रत्येक वस्तु ज्ञान में उसी ज्ञान के द्वारा आत्मा का ज्ञान भी कर्ता के रूप में प्रकाशित होता है। 'मैं लिख रहा हूँ' वाक्य में क्रिया के कर्ता के रूप में आत्मा ही प्रकट हो रही है। कुमारिल—आत्मा ज्ञान का कर्ता एवं ज्ञान का विषय दोनों है। प्रभाकर = आत्मा को 'अहं' पद के ज्ञात (अहं प्रत्यय वेद्य) मानते हैं। प्रत्येक ज्ञान का कर्ता आत्मा है। कुमारिल = प्रभाकर का मत ठीक नहीं। आत्मा ज्ञान का कर्ता, ज्ञान का विषय दोनों है। 'आत्मानं विद्धि' में—आत्मा ज्ञान का कर्ता एवं विषय दोनों है अतः कुमारिल का ही मत यथार्थ है न कि प्रभाकर का। कुमारिल—आत्मा का ज्ञान कैसे प्राप्य? (क) प्रत्येक वस्तुज्ञान में तो आत्मा का ज्ञान नहीं होता (ख) आत्मसंवित्ति में ही आत्मा का ज्ञान होता है। 'मैं अपने को जानता हूँ, वाक्य में क्रिया का कर्म क्या है? 'अपने को'। 'जानता हूँ' क्या है? क्रिया। 'आत्मा को' पद संकेतित करता है कि आत्मा का ज्ञान प्राप्त हो रहा है अतः कर्ता एवं कर्म दोनों आत्मा में स्थित है। मीमांसक मानते हैं कि कोई भी ज्ञान क्यों न हो उसके साथ कोई न कोई विशेषता (उपाधि) संलग्न रहती है। 'रजत' के ज्ञान के साथ रजतत्त्व की उपाधि संलग्न है। 'अहं सुखी च दुःखी च रक्तश्चेत्यादि संविदः' (स्पन्द का०४) में सुखत्व-दुःखत्व की उपाधियों के द्वारा किसी आत्मा के अस्तित्व का अनुमान लगता है। मैं 'अहं सुखी च दुःखी च' के परामर्शों में दो अनुभव स्थित है—१. 'अहं' २. 'सुखी च दुखी च' सुख, दुःख की अनुभूति गुण रूप उपाधियाँ हैं। इनकी प्रतीति जिससे होती है वह है 'अहं'। 'अहं' = सुखदुःख उपाधि से विशिष्ट आत्मा।