स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 204, कुल 519 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः निष्यन्दः १०३ 'चित्तमालयविज्ञानं मनो यन्मन्यनात्मकम् । गृह्णाति विषयान् येन विज्ञानं हि तदुच्यते ॥ (लंकावतार गाथा १०२) चित्त को छोड़कर कोई भी पदार्थ सत् नहीं है । 'तथता' 'शून्यता' 'निर्वाण' 'धर्मधातु' आदि सब उसी के पर्याय हैं । सभी उसी के नाम हैं । चित्त (आलय विज्ञान) ही 'तथता' है— 'दृश्यते न विद्यते बाह्यं चित्तं चित्रं हि दृश्यते । देहभोगप्रतिष्ठानं चित्तमात्रं वदाम्यहम् ॥' चित्त के दो रूप हैं—१. ग्राह्य विषय २. ग्राहक (विषयी)— चित्तमात्रं न दृश्योऽस्ति द्विधा चित्तं हि दृश्यते । ग्राह्यग्राहकभावेन शाश्वतोच्छेदवर्जितम् ।। (लंकावतार सूत्र ३।६५) ग्राहक, ग्राह्य एवं ग्रहण तीन हैं किन्तु ये तीनों विज्ञान या चित्त के परिणमन होने के कारण यथार्थ न होकर मात्र काल्पनिक हैं । वास्तविक एवं पारमार्थिक तत्त्व तो मात्र बुद्धि है—'बुद्धिस्वरूपमेकं हि वस्त्वस्तिपरमार्थतः । प्रतिभानस्य नानात्वान्न चैकत्वं विहन्यते ।' (सर्वस० सं०) विज्ञान एक है भिन्न-भिन्न नहीं । विज्ञान के भेद हैं—१. चक्षुर्विज्ञान, २. श्रोत्रविज्ञान, ३. घ्राण विज्ञान, ४. जिह्वा विज्ञान, ५. काय विज्ञान, ६. मनोविज्ञान, ७. क्लिष्ट मनोविज्ञान, ८. आलय विज्ञान । आलय विज्ञान ही आत्मा है और इसका प्रवाह सतत चलता रहता है । यह समष्टि चैतन्य है और एकाकार, एकरस, परिवर्तनशील (किन्तु आत्मा तो परिवर्तनशील नहीं हैं) एवं सर्व प्राणिगत है । इसका विजृंभण ही है विश्व ॥ १५) लोकायतिकों का जीवन-दर्शन— 'यावज्जीवेत् सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत् । भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ?' १६) पुनर्जन्म एवं कर्म फल का भोग—'पुनरागमनं कुतः?' ॥ मीमांसा का सोपाधि आत्मवाद—कुमारिलभट्ट—'आत्मा' ज्ञान का कर्ता एवं ज्ञान का विषय दोनों है—ज्ञान का कर्ता एवं ज्ञान का कर्म दोनों है । प्रत्येक वस्तुज्ञान में आत्मा का ज्ञान नहीं होता । डेकार्टें (युरोपीय दार्शनिक) ने कहा था ---- ('मैं सोचता हूँ अत, मैं हूँ') किन्तु कुमारिल मानते हैं समस्त मननात्मक ज्ञानों में आत्म-संवित्ति नहीं है । न्याय-वैशेषिक—आत्मा में क्रिया नहीं है । (प्रभाकर का भी यही मत है ।) भाट्ट मीमांसक—आत्मा में क्रिया है । कर्म के दो प्रकार हैं—१. स्पन्द २. परिणाम । 'स्पन्द' (स्थान परिवर्तन) आत्मा में नहीं होता किन्तु परिणाम (रूप परिवर्तन) होता है । परिणामी वस्तु भी नित्य है (कुमारिलभट्ट) ॥ आत्मा परिणामी है तथापि