भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 211

११० स्पन्दकारिका विचारशून्य प्रकाश के रूप में वेदान्त के ब्रह्म के सिद्धान्त का खण्डन करके ग्रन्थकार ने स्पन्दतत्त्व को ही उच्चतम एवं सर्वान्त्यपरा सत्ता स्वीकार किया है । सारांश—१ १. संवित्सन्तानवादियों का खण्डन २. प्रमातृतत्त्ववादियों का खण्डन ३. नानात्ववादियों का खण्डन ४. अभाववादियों का खण्डन ५. ब्रह्मवादियों का खण्डन ६. स्पन्दतत्त्ववाद का मण्डन स्पन्दतत्त्ववाद का प्रतिपादन— एक मात्र वही एक तत्त्व है जो कि अपनी स्फुरत्ता पर आधृत है । समस्त दुःख, सुख, ज्ञेय, ज्ञाता एवं उसका अभाव आदि शून्य बन जाता है क्योंकि समस्त विश्व इसका भोग समझा गया है । (पृ० ४०) 'स्फुरत्तासारे स्पन्दतत्त्वे स्फुरति दुःखसुखग्राह्यग्राहके' शाङ्कर मार्ग में तो दुःख भी सुख, विष भी अमृत, संसार भी अमृत बन जाते हैं— 'दुःखान्यपि सुखायन्ते विषमप्यमृतायते । मोक्षायते च संसारो यत्र मार्गः स शाङ्करः ॥' (उ०स्तो०) शाङ्कर मार्ग क्या है? परा शक्तिरूप प्रसर ही शाङ्कर मार्ग है—'शाङ्करो मार्गः शङ्करात्मस्वभाव-प्राप्ति हेतुः पराशक्तिरूप प्रसरः ॥' वह 'स्पन्दतत्त्व' परमार्थतः है क्योंकि वह नित्य है—'तत् स्पन्द तत्त्वं परमार्थत- तोऽस्ति नित्यत्वात्तस्य' । उसमें न आध्यात्मिक दुःखादिक है और न तो वैषयिक सुख । घटपटादि ग्राह्य भी नहीं हैं । मैं इन्हें ग्रहण करने वाले सविकल्पक ग्राहकरूप प्राकृत अहंकार हूँ—ऐसा भी नहीं है क्योंकि अहंकार तो अविद्या के बिना होता ही नहीं है । इससे अधिष्ठातारूप ग्राहक अहंकार का अभाव बताना अभीष्ट नहीं है क्योंकि उसको तो जानना ही है ।२ 'तत्त्वगर्भ' नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—परमार्थ में ग्राह्य एवं ग्राहक कुछ भी नहीं है । परमार्थ के ज्ञान के बिना अपनी छाया ही आभास के समान जान पड़ती है । तब वह स्पन्दतत्त्व क्या पाषाण के समान मूढ़ या शून्य है? नहीं-नहीं वह जड़ नहीं है, वह स्वप्रकाश एवं सर्वावभासक है । जिस प्रकार शीतकाल और उष्णकाल के मध्य न शीत है न ऊष्ण है वैसे ही सुख-दुःख के मध्य न सुख है न दुःख है परन्तु वह दोनों में है— परमार्थेन न ग्राह्यं ग्राहकं वा न किञ्चन । यस्मादृते तत् स्वाभासमस्वाभासमिवेक्ष्यते ॥ 'न चस्ति मूढभावोऽपि ॥' किसी मुनि ने कहा भी है—३ 'यथा शीतोष्णयोर्मध्ये काले नोष्णो न शीतलः ।

१. स्पन्दनिर्णय । २-३. उत्पलदेव—स्पन्दप्रदीपिका ।

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