भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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प्रथमः निष्यन्दः १११ एवं हि सुख दुःखाभ्यां हीनमस्ति पदं विभोः ॥' 'तत्त्वस्तुति' में कहा गया है—'जैसे आकाश में बिना अन्य भाव सम्बन्ध के सूर्य का उदय होता है इसी प्रकार वेद्य के बिना ही अपनी सत्ता का प्रकाश होता है— 'समुदेति यथा भावैर्विना भानुर्नभस्तले । वेद्यं विनैव भगवन् भवान् केन स्वतोदयः ॥' विशेषण के बिना सामान्य या व्यक्ति के बिना जाति का पृथक् निर्देश नहीं किया जा सकता किन्तु यह तो नहीं कहा जा सकता कि सामान्य जाति है ही नहीं । स्वसंवेदन —संवेद्य, संविन्मयी स्थिति, नित्य शुद्ध निजस्वरूप है । उसमें सुख दुःख की कोई विशेषता नहीं है—१ यथोद्धृतविशेषस्य सामान्यस्य निजा स्थितिः । पृथङ् न शक्या निर्देष्टुं न च तन्नास्ति तावता ॥ एवं नित्या निजा शुद्धा सुखदुःखाविशेषिता । स्वसंवेदनसंवेद्या तव संविन्मयी स्थिति ॥' और तो और नागार्जुन ने भी कहा है—'सब आलम्बन, धर्म, सभी तत्त्व एवं सभी क्लेशाशयों से सम्पूर्णतः शून्य है वह तत्त्व । किन्तु परमार्थतः शून्य नहीं है— 'सर्वालम्बनधर्मैश्च सर्वतत्वैरशेषतः । सर्वक्लेशाशयैः शून्यं न शून्यं परमार्थतः ॥' 'आलोकमाला' में तो और विलक्षण ढंग से इसे प्रतिपादित करते हुआ कहा गया है कि—वह तमोवृत्ति के विरुद्ध है, अतः तमोवृत्ति कभी अवकाश नहीं देती । वह वस्तुतः सामान्य जनों के लिए कोई अविज्ञेय अवस्था है—उसे हम 'शून्यता' कहते हैं । लोक रूढि में जो नास्तिकता का बोधक—'शून्यता' शब्द है वह हमारे शून्य शब्द का अर्थ नहीं है—२ 'विरुद्धत्वात्तमोवृत्तेर्नावकाशं ददाति या । सावस्था काऽप्यविज्ञेया मादृशा शून्यतोच्यते ॥ न पुनर्लोकरूढ्यैव नास्तिक्यार्थानुपातिनी । इस श्लोक के पूर्व स्वस्वभाव को शिव के रूप में प्रतिपादित करके इस श्लोक में उसके लक्षणों का अनुवाद (निरूपित विषय की व्याख्या या प्रमाण को प्रमाण के रूप में उसका पुनर्कथन या समर्थन) करते हुए परमार्थ सत्ता का प्रतिपादन करने हेतु ग्रन्थकार निम्न कारिका कहता है—'न दुःखं ... परमार्थतः ॥' 'यस्तु वेदकः स एक एव परमार्थ सन् इत्यर्थः' जो वेदक है वही मात्र सत् है ।' 'तत्' = वह । वक्ष्यमाण एवं स्वस्वभावशब्दवाच्य विशिष्ट वस्तु अर्थात् परमार्थ सत्ता । 'परमार्थतः' = तत्त्वतः ॥ अर्थात् जिसके अतिरिक्त सभी पदार्थ असत्यसद्भाव हों, मिथ्या या असत्य हों । वह क्या है ? जहाँ न दुःख है और न सुख है, न ग्राह्य है न ग्राहक है और न तो मूढभाव ही है वही परमार्थ है । १-२. उत्पलदेव—स्पन्दप्रदीपिका ।

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