स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
प्रथमः निष्यन्दः १११ एवं हि सुख दुःखाभ्यां हीनमस्ति पदं विभोः ॥' 'तत्त्वस्तुति' में कहा गया है—'जैसे आकाश में बिना अन्य भाव सम्बन्ध के सूर्य का उदय होता है इसी प्रकार वेद्य के बिना ही अपनी सत्ता का प्रकाश होता है— 'समुदेति यथा भावैर्विना भानुर्नभस्तले । वेद्यं विनैव भगवन् भवान् केन स्वतोदयः ॥' विशेषण के बिना सामान्य या व्यक्ति के बिना जाति का पृथक् निर्देश नहीं किया जा सकता किन्तु यह तो नहीं कहा जा सकता कि सामान्य जाति है ही नहीं । स्वसंवेदन —संवेद्य, संविन्मयी स्थिति, नित्य शुद्ध निजस्वरूप है । उसमें सुख दुःख की कोई विशेषता नहीं है—१ यथोद्धृतविशेषस्य सामान्यस्य निजा स्थितिः । पृथङ् न शक्या निर्देष्टुं न च तन्नास्ति तावता ॥ एवं नित्या निजा शुद्धा सुखदुःखाविशेषिता । स्वसंवेदनसंवेद्या तव संविन्मयी स्थिति ॥' और तो और नागार्जुन ने भी कहा है—'सब आलम्बन, धर्म, सभी तत्त्व एवं सभी क्लेशाशयों से सम्पूर्णतः शून्य है वह तत्त्व । किन्तु परमार्थतः शून्य नहीं है— 'सर्वालम्बनधर्मैश्च सर्वतत्वैरशेषतः । सर्वक्लेशाशयैः शून्यं न शून्यं परमार्थतः ॥' 'आलोकमाला' में तो और विलक्षण ढंग से इसे प्रतिपादित करते हुआ कहा गया है कि—वह तमोवृत्ति के विरुद्ध है, अतः तमोवृत्ति कभी अवकाश नहीं देती । वह वस्तुतः सामान्य जनों के लिए कोई अविज्ञेय अवस्था है—उसे हम 'शून्यता' कहते हैं । लोक रूढि में जो नास्तिकता का बोधक—'शून्यता' शब्द है वह हमारे शून्य शब्द का अर्थ नहीं है—२ 'विरुद्धत्वात्तमोवृत्तेर्नावकाशं ददाति या । सावस्था काऽप्यविज्ञेया मादृशा शून्यतोच्यते ॥ न पुनर्लोकरूढ्यैव नास्तिक्यार्थानुपातिनी । इस श्लोक के पूर्व स्वस्वभाव को शिव के रूप में प्रतिपादित करके इस श्लोक में उसके लक्षणों का अनुवाद (निरूपित विषय की व्याख्या या प्रमाण को प्रमाण के रूप में उसका पुनर्कथन या समर्थन) करते हुए परमार्थ सत्ता का प्रतिपादन करने हेतु ग्रन्थकार निम्न कारिका कहता है—'न दुःखं ... परमार्थतः ॥' 'यस्तु वेदकः स एक एव परमार्थ सन् इत्यर्थः' जो वेदक है वही मात्र सत् है ।' 'तत्' = वह । वक्ष्यमाण एवं स्वस्वभावशब्दवाच्य विशिष्ट वस्तु अर्थात् परमार्थ सत्ता । 'परमार्थतः' = तत्त्वतः ॥ अर्थात् जिसके अतिरिक्त सभी पदार्थ असत्यसद्भाव हों, मिथ्या या असत्य हों । वह क्या है ? जहाँ न दुःख है और न सुख है, न ग्राह्य है न ग्राहक है और न तो मूढभाव ही है वही परमार्थ है । १-२. उत्पलदेव—स्पन्दप्रदीपिका ।
११२ स्पन्दकारिका यहाँ पर सुखादिरूपता का प्रतिषेध होने के कारण इसके वेद्यत्व का भी प्रतिषेध किया गया है। वेद्य के अनेक प्रकार है यथा १. बाह्य वेद्य २. आन्तर वेद्य ।। आभ्यन्तर वेद्य = अन्तःकरण द्वारा वेद्य होने के कारण आभ्यन्तर वेद्य कहलाते हैं । 'बाह्य वेद्य' = शब्दादिक पदार्थ 'वेद्य' पदार्थों को ही 'ग्राह्य' भी कहते हैं। ये श्रोत्र आदि बाह्य इन्द्रियों द्वारा गृहीत होते हैं और अन्तःकरण के द्वारा सुखादिक के रूप में अनुभूति के विषय बनते हैं। 'वेद्यते इति वेद्यः' ।। ग्राहक या वेदक भी मायीय प्रमाता है न कि तात्त्विक । बहु उपलब्धृमात्रस्वरूप है किन्तु वह तत्त्वतः नित्य है। इस प्रकार जहाँ पर देहादिक में अहंकार रखने वाला ग्राहक भी नहीं है ।१ कहीं-कहीं 'ग्राह कम्' पाठ भी है। 'ग्राहक' = इन्द्रियाँ (जहाँ इन्द्रियाँ भी नहीं है।) इस प्रकार जिस परम पद में—ग्राह्य-ग्राहक स्वरूप से व्यतिरिक्त ग्रहीतृमात्रस्वभाव पर तत्त्व है वही परमार्थ है ।२ 'न च मूढभावोऽपि' = जहाँ मूढ़भाव भी नहीं है । अर्थात् यदि यह कहा जाय कि यदि सुख-दुःख, ग्राह्य-ग्राहक आदि कोई सत्ता उस पद में नहीं है तो मूढावस्था तो होगी ही?—इसी के निराकरणार्थ ग्रन्थकार कहता है कि वहाँ मूढ़ावस्था भी विद्यमान नहीं है ।३ मूढ़भाव = 'मूढस्य भावो मूढत्वं' अर्थात् वेद्यवेदनसामर्थ्याभाव । मूढ़भाव भी इसलिए विद्यमान नहीं है क्योंकि यदि वहाँ मूढ़भाव विद्यमान होता तो व्यक्ति को अनुभव में आता कि 'मैं मूढ़ था'—और ऐसा प्रत्यवमर्श होने पर वेद्यता की सत्ता तो बनी ही नहीं रहती जो कि परमार्थ पद में है ही नहीं। यदि वेद्यता बनी रहती तो मूढ़ावस्था का किस प्रकार वेदकैकस्वभाववस्तुरूपत्व हो पाता ? यदि वहाँ पर मूढ़ भाव की भी सत्ता विद्यमान नहीं रहती है तब तो उसकी प्रतिपत्ति के गोचरीभूत समस्त वेद्यवस्तुरूपता के प्रतिषेध के कारण वहाँ अभाव की सत्ता विद्यमान मानी ही जानी चाहिए—इसी पूर्वपक्ष के प्रतिक्षेपार्थ ग्रन्थकार ने कहा कि—'तदस्ति परमार्थतः ।'४ वह सद्रस्तु ('तत्') परमार्थतः (तत्त्वतः) सत्ताशील है । क्योंकि वह नित्यरूप से अविलुप्त है और उपब्धृमात्रलक्षणस्वभाव है। चूँकि कल्पनामात्रलब्धात्मक सुखादिक पदार्थ क्षणभंगुर वेद्य पदार्थ हैं अतः वेदक मात्र स्वभाव वाले आत्मा से ये वेद्य पदार्थ भिन्न होते हुए भी उनकी ही कल्पना होने के कारण उनसे भिन्न भी नहीं है—जो जो वेद्य भूमिका में हैं वे सभी अनित्य होने के कारण असत् है—'यत् यत् वेद्यभूमिकायां वर्तते तत् सर्वं असत् अनित्यत्वात्' ।५ पारमार्थिक सत्ता क्या है?—कारिकाकार ने परमार्थ सत् को दुःख, सुख, ग्राह्यता । ग्राहकता, मूढ़भाव इत्यादि सभी से परे माना है— १-४. उत्पलदेव—स्पन्दप्रदीपिका । ५. रामकण्ठाचार्य—स्पन्दकारिकाविवृति।
प्रथमः निष्यन्दः ११३ 'न दुःखं न सुखं यत्र न ग्राह्यो न ग्राहको न च । न चास्ति मूढभावोऽपि तदस्ति परमार्थतः ।।' (५) स्पन्द तत्त्व का यथार्थ स्वरूप—१. यह सुख, दुःख, ग्राह्यता, ग्राहकता, मूढ़ता आदि सभी से असंयुक्त है। ये इनका स्पर्श भी नहीं कर सकते। २. यही तत्त्व परमार्थ सत् है क्योंकि वह नित्य है। ३. सुख, दुःख आदि मानसिक संकल्प हैं, क्षुण्य हैं, और आत्मा के यथार्थ स्वरूप से पृथक् हैं। ४. आत्मा सुख-दुःखादि अनुभूति से परे होने के कारण नित्य, अक्षर, विभु, स्पन्दात्मक एवं चेतन है। लेकिन सुख दुःखादि की अनुभूतियों से परे होने के कारण वह प्रस्तर नहीं है। ५. भट्टकल्लट—इन्हीं भावों को इन शब्दों में व्यक्त करते हुए कहते हैं कि 'तस्य चायं स्वभावो यत् सुखदुःखग्राह्यग्राहकमूढ़तादिभावैरस्पृष्टः । स एव च परमार्थतोऽस्ति नित्यत्वात् । सुखादयः पुनः संकल्पोत्थाः क्षणभंगुरा आत्मस्वरूपबाह्याः शब्दादिविषयतुल्याः । न च सुखादिस्वरूपो यदा नासौ तदा पाषाणप्रख्य एव ।।'१ 'न दुःखं न सुखं यत्र न ग्राह्यो न ग्राहको न च' कारिकाकार ने सुख, दुःख आदि चित्तवृत्तियों का उल्लेख किया है वे क्या है? स्पन्दात्मिका संवित् भट्टारिका जब विश्वरूप में प्रसृत होने हेतु उन्मुख होती है तब अपनी बहिर्मुखता के इस बाह्य स्तर पर सर्वप्रथम प्राण के रूप में परिणत होकर अन्तःकरण का रूप धारण करती है। त्रिगुणमय अन्तःकरण सुख, दुःख एवं मोह आदि अवस्थायें भी आत्मस्वरूप से पृथक् नहीं हैं क्योंकि ज्ञान रूपा परमेश्वरी से अतिरिक्त अन्य किसी भी वस्तु की सत्ता नहीं है तथा ज्ञान सत्ता का आश्रय लिए बिना किसी भी वस्तु की सत्ता संभव नहीं है— 'तत्तद्रूपतया ज्ञानं बहिरन्तः प्रकाशते । ज्ञानादृते नार्थसत्ता ज्ञानरूपं ततो जगत् ।।' 'नहि ज्ञानादृते भावाः केन चिद्विषयीकृताः । ज्ञानं तदात्मतां यातमेतस्मादवसीयते ।।' विशुद्ध चित् तत्त्व अखण्ड है, ज्ञानात्मक है, स्पन्दात्मक है, एकाकार है एवं सुख, दुःख, ग्राह्य, अग्राह्य उपाधियों से अतीत है। यह परमार्थ सत् है। प्रत्येक प्रमाता सुख, दुःख, नील, रक्त, अल्प, प्रचुर आदि वेद्य पदार्थों के रूप में स्वयं अवभासित हो रहा है। चित् तत्त्व का स्वरूप विश्वात्मक अहं विमर्श है। अहंविमर्श के दो प्रकार हैं—१. शुद्ध = आत्मरूप, २. अशुद्ध = प्रमेय रूप। क) शुद्ध अहं विमर्श—पति प्रमाता का है। शुद्ध अहं विमर्श में—समस्त १. भट्टकल्लट—'स्पन्दसर्वस्व' । स्पं० ८
११४ स्पन्दकारिका विरोधाभास, निःशेष द्वैत, समस्त द्वन्द्व जाल, सारे भेद, विशुद्धचिद्रूप एकाकारता में (संसार में विलीन अनन्त सरिताओं की भाँति) अवस्थित रहती है । ख) अशुद्ध अहं विमर्श—माया शक्ति के कारण संकुचित (मित) अहं प्रतीति । इसका सम्बन्ध पशुप्रमाता के साथ है । इस स्तर पर विशुद्ध चित्त तत्त्व अपनी रूपान्तरित माया शक्ति के द्वारा अपनी अभिन्न शक्ति—ज्ञान शक्ति, क्रिया शक्ति एवं माया शक्ति को संकोच भाव में तिरोहित करके गुणत्रय के समष्टिरूप अन्तःकरण के स्वरूप को धारण कर लेता है । यह चित्त ही विभिन्न उपाधियों, अवस्थाओं, शरीरों द्वन्द्वों एवं भेदों को धारण करके एकता से अनेकता को ग्रहण करके उन स्वकल्पित एवं स्वारोपित (अ- यथार्थ) स्वरूपों को आत्मसत्ता से अभिन्न मानकर अहं रूप में स्वीकार करता रहता है । 'इदं' को अहं मानकर चलता है । ज्ञानोदय के अनन्तर वह घट, पट, नील, सुख, दुखादि 'इदं' को अहं से पृथक् मानकर 'इदं' मानकर तथा अपनी सत्ता को 'अहं' मानकर तथा अपने को विशुद्ध आत्मस्वरूप से अभिन्न समझकर चलता है । 'न चास्ति मूढ़भावोऽस्ति'—मूढ़ता है क्या? 'मूढ़स्य भावो मूढ़त्व वेद्यवेदन सामर्थ्याभावः ।' (स्पन्दकारिका)। 'मूढ़ता' = (गंभीरसंवेदनहीनता) ॥ प्रश्न यह उठता है कि आत्मस्वरूप में सुख दुःखादि संवेदनाओं का नितान्त अभाव (संवेदनहीनता वेद्य पदार्थों की अनुभूति का नितान्त अभाव) है तो क्या उसमें मूढ़भाव है? क्या वह प्रस्तर के समान समस्त संवेदनाओं की शक्ति से हीन है? स्पन्द शास्त्र में ही इसका उत्तर दिया गया है—'यतः तस्यापि अवस्थान्तरे मूढोऽहमासम् इति प्रत्यवमर्शनमानत्वात् वेद्यत्वं स्थितमेव केवलं तत्कालमनुपलंभः ॥ (स्प० का०)' कोई व्यक्ति संज्ञाहीन हो या प्रगाढ़ सुषुप्ति में लीन हो लेकिन सामान्य जागृता- वस्था या संज्ञा में आने पर वह कहता है कि 'मैं गहरी निद्रा में या गंभीर संवेदनहीन अवस्था में अवस्थित था किन्तु पत्थर ऐसा कभी नहीं कहता । अतः मूढ़ता भी आत्मा का स्वभाव नहीं है । यदि आत्मा उस समय मूढ़ रही होती तो उसको उसका बाद में भान कैसे होता ? 'तदस्ति परमार्थतः'—वही पारमार्थिक सत्य है—वही परमार्थतः यथार्थ है । आत्मतत्त्व की परमार्थ सत्ता—सूत्रकार की दृष्टि में समस्त उपाधियों से शून्य, विशुद्ध आत्मस्वरूप पदार्थ ही परमार्थसत् है और उससे पृथक् समस्त कार्य प्रपञ्च सांवृत्तिक सत् है । पारमार्थिक सत् नहीं । जो वस्तु परमार्थतः सत है वह कभी असत् सिद्ध नहीं की जा सकती । यदि उसे असत् मान लिया जाय तो असत् से सत् की उत्पत्ति कैसे होगी? स्पन्द तत्त्व सत् है और उससे कार्यरूप सत् का विकास होता है । १. माध्यमिक शून्यवादियों ने शून्य को सत्य (परमार्थ सत्) कहा । २. विज्ञानावादियों ने विज्ञान को सत्य कहा । अभाववादी प्राचीन वेदान्तियों ने परम सत्य को अभावस्वरूप माना । गौड़पादाचार्य परमार्थ का स्वरूप इस प्रकार उल्लिखित करते हैं—
प्रथमः निःष्यन्दः ११५ 'अद्वैतं परमार्थो हि द्वैतं तद्भेद उच्यते ।' १ शङ्कराचार्य कहते हैं— 'अद्वैतं परमार्थो हि यस्मादद्वैतं नानात्वं तस्याद्वैतस्य भेद- स्तद्भेदस्तस्य कार्यम् ।' 'एकमेवा द्वितीयम् ।।' (छा० ३६।२।२) आचार्य गौड़पाद 'परमार्थ' का यह स्वरूप मानते हैं— न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः । न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ।।' (माण्डूक्यकारिका) शङ्कराचार्य कहते हैं— 'जब द्वैत असत् है और एकमात्र आत्मा ही परमार्थतः सत् है । यह समस्त लौकिक और वैदिक व्यवहार अविद्या का ही विषय है— 'यदा वितथं द्वैतमात्मैवैकः परमार्थतः संस्तदेदं निष्पन्नं भवति सर्वोऽयं लौकिको वैदिकश्च व्यवहारोऽ- विद्या विषय एवेति ।' १ गौड़पादाचार्य द्वैत को यथार्थ नहीं प्रत्युत् चित्त का 'स्पन्द' मात्र मानते हैं— 'चित्तस्पन्दितमेवेदं ग्राह्यग्राहकवद्द्वयम् । चित्तं निर्विषयं नित्यमसंगं तेन कीर्तितम् ।।' २ जो पदार्थ कल्पित व्यवहार के कारण होता है वह परमार्थतः नहीं होता— 'योऽस्ति कल्पित संवृत्या परमार्थेन नास्त्यसौ ॥ ३ शैवी स्वातन्त्र्य शक्ति के द्वारा आन्तर शक्तिचक्र के साथ अचेतन इन्द्रियों को भी चैतन्य प्रदान किये जाने का प्रतिपादन यतः करणवर्गोऽयं विमूढो मूढवत्स्वयम् । सहान्तरेण चक्रेण प्रवृत्ति-स्थिति-संहतीः ॥ ६ ॥ लभते तत्प्रयत्नेन परीक्ष्यं तत्त्वमादरात् । यतः स्वतन्त्रता तस्य सर्वत्रेयमकृत्रिमा ॥ ७ ॥ जिस स्पन्दात्मक शक्ति के द्वारा आन्तर शक्ति चक्र के साथ ही साथ चैतन्य शून्य इन्द्रिय-समूह को भी चेतन की भाँति सृजन, स्थिति एवं संहार का करने की शक्ति प्राप्त हो जाती है उस (स्पन्दात्मक स्वभाव) तत्त्व की परीक्षा श्रद्धा-विश्वास एवं सम्मान के साथ प्रयासपूर्वक करनी चाहिए। क्योंकि उस (स्पन्दतत्त्व) की (आत्मधर्मभूता) यह स्वतन्त्रता- सर्वत्र अकृत्रिम (सहज या स्वाभाविक) है ॥ ६-७ ॥
- सरोजिनी * पूर्व कारिका में स्पन्द तत्त्व की परमार्थता सिद्ध करके सूत्रकार इन दो सूत्रों में स्पन्दात्मक शैवी स्वातन्त्र्य शक्ति के द्वारा जड़ पदार्थों को भी चैतन्य प्रदान करने का विवेचन कर रहे हैं । यहाँ उपपत्तियों द्वारा परिघटित तत्त्व की प्रत्यभिज्ञा हेतु उपायों का साभिज्ञान १-३. शांकरभाष्य—माण्डूक्यकारिका ।
११६ स्पन्दकारिका निरूपण किया गया है—'मूढ़' = माया के वशीभूत होकर जडाभासीभूत अणु । मूढत्व = अचेतनत्व ॥ यतः = जिसके द्वारा । (यस्मात् स्पन्दतत्त्वात्) । करणवर्गो— इन्द्रियग्राम । इन्द्रियों का समूह । बाह्य इन्द्रियसमूह । अयं = यह । (यह इन्द्रिय समूह) । विमूढ = चैतन्य शून्य । विशेष रूप से चैतन्य विवर्जित । सहान्तरेण चक्रेण = देवियों की इन्द्रियों के साथ । (न कि आन्तरिक इन्द्रियाँ) इसका अर्थ पुर्यष्टक भी नहीं है । इसका अर्थ इन्द्रियाधिष्ठान भी नहीं है । चक्रेण = आन्तर वृत्त के साथ । प्रयत्न = उद्योगरूप उत्साह (उत्पल०) । संहृतीः = संहार । आदरः = श्रद्धाः 'अतः सततमुद्युक्तः' भी कहा गया है । परीक्ष्यं = परीक्षण का विषय बनाया जाना चाहिए । तत्त्व = स्पन्दात्मक संवित्स्वभाव, स्वस्वभाव, । स्वतन्त्रता = कर्तुं, अकर्तुं, अन्यथा कर्तुं की अघटन घटनापटीयसी शांभवी नित्य शक्ति जो शिव की स्वसमवेता शक्ति या आत्मधर्म है । अकृत्रिमा = सहज । स्वाभाविक । पूर्व प्रतिपादित सिद्धान्त श्रद्धा एवं उद्योगपूर्वक परीक्षित किया जाना चाहिये ॥ अर्थात्—वह तत्त्व अत्यन्त सावधानी एवं अत्यन्त प्रयासपूर्वक परीक्षित किया जाना चाहिए । इसके द्वारा करणग्राम अचेतन (विमूढ़) होते हुए भी आन्तर चक्रों के साथ चेतनवत् क्रिया करते हैं और वे सृष्टि-स्थिति-संहार के साथ प्रवृत्त होते हैं । पूर्व श्लोकों में प्रतिपादित स्पन्द सिद्धान्त एवं परमतत्त्व का परीक्षण श्रद्धा एवं अध्यवसाय पूर्वक इसलिए किया जाना चाहिए क्योंकि इसके द्वारा करणवर्ग (इन्द्रियग्राम) अचेतन होकर भी चेतनवत् क्रिया करता है और यह स्पन्द तत्त्व समस्त भेदों के संहार के रूपों वाला है । 'उद्यमो भैरवः' (शिवसूत्र) कहकर शिवसूत्रकार ने इसी तथ्य को संकेतित किया है । यह भैरव के भैरव रूप का उद्यम है । यह अकृत्रिमा, स्वस्वभावा स्वातन्त्र्य शक्ति में अभिव्यक्त है । शङ्कर की आत्मस्वरूपा यह संवित् जो कि स्वस्वभावा, अकृत्रिमा, सहजा, स्पन्दतत्त्वरूपा एवं स्वातन्त्र्यसम्पन्ना है जड़ एवं चेतन सभी में स्फुरित हो रही है । भगवान् स्वातन्त्र्य शक्ति समवेत हैं— 'स्वतन्त्रः परिपूर्णोऽयं भगवान्भैरवो विभुः । तत्रास्ति यन्न विमले भासयेत्स्वात्मदर्पणे ॥ (परात्रिंशिका वि० = अभिनवगुप्त) ॥ 'स्वातन्त्र्य' है क्या ? अभिनवगुप्त कहते हैं—'परमेश्वरस्य स्वात्मनि इच्छात्मिका स्वातन्त्र्यशक्तिः ।।' (परात्रिंशिका विवृति) ॥ इस श्लोक में 'अन्तरेण चक्रेण' का अर्थ विचारणीय है । १. इसका अर्थ है—आन्तरिक इन्द्रियाँ नहीं है क्योंकि इन्द्रियों का उल्लेख तो 'करणवर्ग' में हो चुका है । २. इसका अर्थ—'पुर्यष्टक' भी नहीं हो सकता क्योंकि आन्तरिक इन्द्रियों ऊपर करणवर्ग से सम्बद्ध दिखाई गई हैं । ३. इसका अर्थ—इन्द्रिय-विषय भी नहीं हो सकता क्योंकि वे योगहीन लोगों के
प्रथमः निष्यन्दः ११७ लिए केवल संस्कार या Impression मात्र हैं और वे चलने फिरने आदि क्रियाओं के प्रत्यक्ष संपादक के रूप में दृष्टिगत होते हैं।१ योगी जो कि इन्द्रियों के विषयों का साक्षात्कार कर चुके हैं वे उपदेश की अपेक्षा नहीं रखते क्योंकि वे स्वयं ही परतत्त्व का अवधानपूर्वक अनुशीलन कर चुके होते हैं। कुछ टीकाकारों का मत है कि 'करणवर्ग' को 'मूढः अमूढ़वत्' के साथ जोड़ देना चाहिए न कि— 'सहान्तरेण चक्रेण' (With sense of divinity)—यह कथन निराधार है क्योंकि यह इन्द्रिय वर्ग चेतना के भोग (आनन्द) से अभिन्न है।२ ग्रन्थकार का कथन है कि—यह अपना स्वरूप इन्द्रियों की अधिष्ठात्री देवियों एवं इन्द्रियों के वर्ग को स्पंदित होने आदि क्रियाओं को करने हेतु प्रेरित करता है। यह उनके चलाने, रहने एवं नष्ट होने का भी सूत्रधार है। उसकी कृपा से करणवर्ग, जड़ होते हुए भी, उन कार्यों को संपादित करता हुआ प्रतीत होता है। ये पवित्र इन्द्रियाधिष्ठातृ देवियाँ सृष्टि के कार्यों को संपादित करती हैं।३ यद्यपि रहस्यवादी दृष्टि के अनुसार जड़ इन्द्रियों का समूह वहाँ नहीं है किन्तु ज्ञान के शरीर से युक्त इन्द्रियाँधिष्ठातृ देवियाँ (Sense-devinities) ही वहाँ रहती हैं। इन्द्रियों के—अपने वैभव की रश्मियों के गोलक का निरीक्षण करते हुए एवं उनके चलने आदि क्रियाओं का अधिष्ठातृत्व करते हुए योगीगण अपने स्वरूप का परीक्षण कर सकते हैं। यह उनका स्वरूप शङ्कर से अभिन्न है। उपाय अत्यन्त सरल है—४ निज निजेषु पदेषु पतन्त्विमाः, करणवृत्तय उल्लसिता मम। क्षणमपीश मनागपि मैवभू, त्वदविभेदरसक्षति साहसम् ॥ (उ०स्तो० ८।७) हे देव! मेरी इन्द्रिय-क्रियायें अपनी पूर्ण क्रीड़ा में अपने-अपने विषयों की ओर दौड़ें किन्तु मैं एक क्षण के लिए भी ऐसे आवेश में न आ सकूँ कि आपके साथ ऐकात्म्य के आनन्द का त्याग हो सके ॥५ चार्वाक मत का खण्डन—ग्रन्थकार ने इसके द्वारा चार्वाक मत का भी खण्डन कर दिया जो कि चेतना को इन्द्रिय धर्म मानता है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की स्वानुभूति यह साक्ष्य देती है कि वास्तविक प्रत्यय चैतन्य (Real self) की शक्ति के कारण ही इन्द्रियाँ शक्तिमान बनती है।६ छठवें सातवें कारिका द्वारा इसका उपपादन किया जा रहा है कि वह तत्त्व जड़ नहीं है—'यतः करणवर्गोऽयं....सर्वत्रेयमकृत्रिमा ।'७ इसी स्पन्दतत्त्व से यह बाह्य करणवर्ग अर्थात् ज्ञानेन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय एवं अन्तःकरण चक्र के सार्थ मूढ़ चेतन होने पर भी विचेतन के समान स्वयं प्रवृत्ति, स्थिति एवं संहार की अवस्थाओं को प्राप्त करता है। आप देखते ही हैं कि चुम्बक के सान्निध्य से लोहा १-६. स्पन्दनिर्णय। ७. स्पन्दप्रदीपिका।
११८ स्पन्दकारिका क्रियाशील हो जाता है। वायु एवं अग्नि के संपर्क से लौहपिण्ड अग्निवत दाह-पाक के प्रकाशन में समर्थ हो जाता है— एषोपपत्तिहेतुस्तु दृष्टान्तो भ्रामको मणिः ॥ (—स्पन्द प्रदीपिका ।) पञ्चम कारिका में इस परमार्थ सत् आत्मा अर्थात् शिव में समस्त वस्तु संपादन की स्वतन्त्र शक्ति की सामर्थ्य का प्रतिपादन करने के उपरान्त अब उपादेयतमत्व का उपदेश देने हेतु कारिकाकार कारिका युगलक क्र० ६ एवं ७ कह रहे हैं। (रामकण्ठाचार्य) ॥ कारिका ७—‘तत् तत्त्वं’ = स्वस्वभावाख्य वस्तु परमार्थसत् रूप में अवस्थित है। ‘प्रयत्नेन’ = प्रकृष्ट यत्न के द्वारा अर्थात् संतत अविलुप्त उद्योग के द्वारा । ‘आदरात्’ = श्रद्धातिशय के कारण ‘परीक्ष्यं’ = समस्त अनुभवात्मक दशाओं में वक्ष्य- माणोपदेशानुसार क्रम से, वेद्य-वेदकलक्षण वाले दो तत्त्वों का विभाजन करके, वेदक के स्वरूप का परामर्श करने की क्रिया के द्वारा आत्मा के रूप में उसका स्फुटीकरण (परीक्षण) करना चाहिए । ‘यतः तस्य द्वयम्’—जिससे कि उसका यह । प्रस्तुत व्याख्यान । ‘स्वतन्त्रताः ‘स्वतन्त्रता । स्वेच्छामात्राधीनसकलकार्यकर्तृत्वरूपा ।’ ‘सर्वत्र’ = समस्त देहों में या दशा विशेष में अवस्थित ‘अकृत्रिमा’ = सहज ही । अर्थात् उपादान, सहकारी कारणा आदि की बिना कोई अपेक्षा किये हुए, क्योंकि संसारी प्राणियों को भी उस स्वातन्त्र्य शक्ति की महिमा के द्वारा ही सारे व्यवहारों की सम्पदा प्राप्त हुआ करती है और माया-व्यामोह के वशीभूत होने के कारण सत्यस्वभाव के परामर्शाभाव के कारण सारे संसारी प्राणी समस्त क्रियाओं में परतन्त्र की भाँति व्यवहार करते हैं । क्योंकि उन्हें समस्त अभीष्ट-प्रतिपादन के लिए व्यतिरिक्त कारणों (उपादान कारण, सहकारी कारण, निमित्त कारण आदि) की अपेक्षा रहती है । इसीलिए कहा गया है कि स्वाभाविक स्वातन्त्र्य प्राप्त करने के लिए उस तत्त्व की परीक्षा करनी चाहिए ॥ इसका तात्पर्य यह है कि— सुख-दुख-मोह-ग्राह्य-ग्राहक रूपों के प्रतिषेध के कारण उस अवस्तुभूत प्रमेय को नहीं जानना चाहिए—वह एतदर्थ अवगन्तव्य नहीं है—यही उपदेश दिया गया है । ‘इदम्’—यह ॥ ‘यह’ शब्द द्वारा निर्दिष्ट स्वतन्त्रता का प्रतिपादन करने हेतु ‘यतः’ शब्द से विशिष्ट विशेषण की अब व्याख्या की जा रही है । किस तत्त्व की परीक्षा की जानी चाहिए? कारिका ८—‘यतो’ = जिसके द्वारा (यस्मात्) । ‘अयं कारण वर्गः’ = यह इन्द्रिय-समूह । अर्थात् श्रोत्र, नासिका, रसना, पाद, पाणि आदि बाह्येन्द्रियाँ, मन आदि आभ्यन्तर १३ इन्द्रियों का समूह (‘त्रयोदशकरण समूहः’) । ‘प्रवृत्तिस्थितिसंहृतीः लभते’—‘प्रवृत्तिः’—कार्योन्मुखता ॥ जिघृक्षितार्थोन्मुखता से युक्त उन्मेषावस्था । (स्पन्दकारिकाविवृति—रामकण्ठाचार्य ।) । ‘स्थितिः’—गृहीतार्थ- विश्रान्त्यवस्था । ‘संहृतिः’ = कृतकृत्य होने के कारण बाह्यार्थपरित्याग में स्वव्यापार से उपरत प्रत्यस्तमयावस्था ॥ ‘लभते’ = प्राप्त करता है । (रामकण्ठाचार्य) ।
प्रथमः निष्यन्दः ११९ किस प्रकार का 'इन्द्रिय समूह' ? विमूढ़ । जड़ । किस प्रकार प्राप्त करता है? 'अमूढ़वत्' = चेतनवत् ॥ तात्पर्य यह है कि— जिसके संस्पर्शबल से प्राकृत एवं जड़ बाह्याभ्यन्तर इन्द्रिय- ग्राम प्रवृत्ति आदि चेतन व्यापार निष्पादित करने में समर्थ होते हों उस तत्त्व को आत्मतत्त्व के रूप में स्फुटीकृत करे । वह इन्द्रियों में चैतन्य संपादित करने की स्वातन्त्र्य शक्ति की भाँति समस्त विषयों को स्वातन्त्र्य प्राप्त कराने में समर्थ है । अतः उसकी परीक्षा भी की जानी चाहिए ।१ उसकी परीक्षा की जानी चाहिए जिसके द्वारा, अभ्यासदशा में ही स्वातन्त्र्य के अभिव्यज्यमान होने पर परशरीरावेशादि क्रीड़ा निष्पादित होती है । वह यह है कि— 'न च सुखादिरूपो यदा नासौ' एवं—'तस्मात्तत्त्वं यत्नेन परीक्षितव्यम्' ।२ यह वही स्वातन्त्र्य स्वरूपा शक्ति है जिसका बाह्यावभासन ही विश्व है, जो स्वात्म- संवित्ति है, अद्वैत है, एक है और शिव का विमर्शात्मक हृदय एवं सारे अस्तित्वों का 'सार' है— यस्यामन्तर्विश्वमेतद्विभाति, बाह्याभासं भासमानं विसृष्टौ । क्षोभे क्षीणेऽनुत्तरायां स्थितौ तां वन्दे देवीं स्वात्मसंवित्तिमेकाम् ॥३ इसे 'स्वातन्त्र्य शक्ति' इसलिए कहते हैं क्योंकि इसमें किसी भी क्रिया के संपाद- नार्थ परापेक्षा नहीं है—यथा योगी— योगिनामपि मृद्बीजे विनेवेच्छावशेन तत् । घटादि जायते तत्तत्स्थिरस्वार्थ क्रियाकरम् ॥४ जड़ादिक पदार्थों में यह शक्ति नहीं है यह कर्तृत्व एवं चैतन्य शक्ति भी उन्हें इसी स्वातन्त्र्य शक्ति से प्राप्त होती है— जडस्य तु न सा शक्तिः सत्ता यदसतः सतः । कर्तृकर्मत्वतत्वैव कार्यकारणता ततः ॥५ स्वातन्त्र्य की अन्य विलक्षणतायें निम्न हैं— १. आत्मानमत एवायं ज्ञेयीकुर्यात्पृथक् स्थितिः । ज्ञेयं न तु तदोन्मुख्यात् खण्डयेतास्य स्वतन्त्रता ॥ ४६ ॥ २. स्वातन्त्र्यामुक्तमात्मानं स्वातन्त्र्यादद्वयात्मनः । प्रभुरीशादिसंकल्पैर्निर्माय व्यवहारयेत् ॥ ४७ ॥ ३. चिदात्मैव हि देवोऽन्तः स्थितमिच्छावशाद्बहिः । योगीव निरूपादानमर्थजातं प्रकाशयेत् ॥ ४.३८ ॥६ (यह इच्छा ही 'स्वातन्त्र्यशक्ति' है ।) १-२. रामकण्ठाचार्य—स्पन्दकारिकाविवृति । ३. परात्रिंशिकाविवृति । ४-६. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाकारिका ।
१२० स्पन्दकारिका ४. परमेश्वरस्य हि यस्मादीश्वरतामयी शक्तिरैश्वर्यरूपं स्वातन्त्र्यमेव वाच्यवाचकात्मविश्वपदार्थमयं भावजातं भवति ॥¹ 'स्वातन्त्र्यमेव जगदात्मना प्रथते' ² — ५. तस्मात् संवित्त्वमेवैतत्स्वातन्त्र्यं यत्तदप्यलम् । विविच्यमानं बह्वीषु पर्यवस्यति शक्तिषु ।। (तं० १।६१) ६. एक एवास्य धर्मोऽसौ सर्वाक्षेपेण वर्तते । तेन स्वातन्त्र्यशक्त्यैव युक्त इत्याञ्जसो विधिः ।। (तं० १।६७) 'स एव शक्तिमान स्वतन्त्रोऽनुत्तरभट्टारकः स्वस्वातन्त्र्येणोद्भासितस्य विश्वस्य स्वात्मभित्तिसंलग्नतया धारणपोषणस्वभावत्वाद् भैरवो विश्वभरितस्वभावः ॥'³ अभिनवगुप्तपाद—'श्रीबोधपञ्चदशिका' में इसके विशेष निम्न धर्मों की ओर इंगित करते हैं— क) अतिदुर्घटकारित्वमस्यानुत्तरमेव यत् । एतदेव स्वतन्त्रत्वमैश्वर्यं बोधरूपता ॥ ७ ॥ ख) स्वातन्त्र्य अपरिज्ञेय परा शक्ति है— यदेतस्यापरिज्ञानं तत्स्वातन्त्र्यं हि वर्णितम् । स एव खलु संसारो मूढानां यो विभीषकः ॥ (११) स्वातन्त्र्यवाद— प्रकाशविमर्शात्मा संवित्स्वभावः परमशिवो भगवान् स्वातन्त्र्यादेव रुद्रादि स्थावरा- न्तप्रमातृरूपतया नीलसुखादिप्रमेयरूपतया च अनतिरिक्तायाप्यतिरिक्तमेव स्वरूपानाच्छादि- कया संविद्रूपानान्तरीयकस्वातन्त्र्यमहिम्ना प्रकाशते इत्ययं स्वातन्त्र्यवादः । 'शक्ति' तथा 'शक्तिचक्र' 'आन्तरचक्र'— क) विश्व का वमन—बहिः प्रकाशन करने के कारण या संसार रूप वाम (विपरीत) आचरण करने के कारण 'वामेश्वरी' का रूप ग्रहण करती हुई । ख) 'खेचरी', 'गोचरी' 'दिक्चरी' भूचरी रूप प्रमाता तथा अन्तःकरण, बाह्यकरण एवं वस्तुस्वभावरूप में स्फुरित होती है । ग) पशुभूमिका में शून्यपद ग्रहण करके पारमार्थिक 'चिद्गगनचरी' का स्वरूप छिपाकर, किंचित्कर्तृत्वादिरूप कलादिक शक्त्यात्मक 'खेचरी' चक्र के रूप में प्रकाशित होती है । घ) अभेदनिश्चयादिरूप पारमार्थिक स्वरूप को छिपाकर, भेदनिश्चय भेदाभिमान एवं भेदकल्पना से समन्वित अन्तःकरणों की देवी के रूप में—'गोचरीचक्र' बनकर प्रकाशित होती है । १-३. बोधपंचदशिका वि० (हरभट्ट) ।
प्रथमः निष्यन्दः १२१ ङ) अभेदप्रथात्मक पारमार्थिक रूप से जिसका आच्छादित हो चुका है एवं भेदालोचन आदि जिसमें प्रधान है ऐसी बाह्य करणों की देवीस्वरूपा 'दिक्चरीचक्र' के रूप में भी वही शक्ति उदित होती है । च) सर्वात्मरूप को छिपाकर, भेदाभासस्वभाव' प्रमेयरूप— 'भूचरीचक्र' के रूप में पशुहृदयों को मूढ़ बनाती हुई भी वही शोभित होती है । छ) वही पतिभूमिका मे सर्वकर्तृत्वदिशक्तिरूप 'चिद्गगनचरी', अभेदनिश्चयादि रूप 'गोचरी', अभेदालोचनाद्यात्मिका 'दिक्चरी' और निजांगस्वरूप अद्वैत प्रथासारभूत प्रमेया- त्मक 'भूचरी' के रूप में पति-हृदय को विकसित करती हुई भी वही स्फुरित होती है । वही अज्ञातस्वरूपा रहने पर बन्धनप्रदा एवं ज्ञात होने पर मुक्तिप्रदा है— 'पूर्णावच्छिन्नमात्रबर्हिष्करणभावगाः । वामेशाद्याः परिज्ञानाज्ञानात् स्युर्मुक्तिबन्धदाः ।।' (भट्टदामोदर) निज शक्तियों से जनित व्यामोहितता—ही संसारित्व है—एवं च निजशक्तिव्यामोहिततैव संसारित्वम्' जब यह शक्ति स्व शक्तिव्यामोहित नहीं होती तब तो शरीरी परमेश्वर परमेश्वर ही है अन्यथा पशु है— 'एवं संकुचितशक्तिः प्राणादिमानपि यदा स्वशक्तिव्यामोहितो न भवति तदा अयम् ... शरीरी परमेश्वरः । 'मनुष्यदेहमास्थाय छन्नास्ते परमेश्वराः ॥' 'शरीरमेव घटाद्यपि वा ये षट्त्रिंशत्तत्त्वमयं शिवरूपतां पश्यन्ति तेऽपि सिध्यन्ति ।' (जो लोग ३६ तत्त्वमय शरीर को या घटादि को भी शिवस्वरूप देखते हैं वे भी सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं ।') (प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' सूत्रः १३) ॥ १. 'खेचरी'— 'खे बोधगगने चरतीति' (प्र०ह०सू०१२) । जो ज्ञान के अनन्ता- न्तरिक्ष में विचरण करती है वही है 'खेचरी' । इन समस्त शक्तियों का अपने मूल रूप में जो स्वरूप होता है उसे 'चिद्गगनचरी' (चिदाकाश में सदा विचरण करने वाली शक्ति) कहते हैं । जब परमात्मा सर्वकर्तृत्वदिक पाँच शक्तियों को सीमित करके उन्हें 'कला' 'विद्या' 'राग' 'काल' 'नियति' (पञ्च कंचुकों में संकुचित) रूप में प्रस्तुत करता है और यह असंकुचित शक्तियाँ किंचित्कर्तृत्व, किंचित् ज्ञातृत्व आदि अवस्थाओं को धारण करके पशुभूमिका में अवतरित होती हैं तब इन्हीं शक्तियों की समष्टि को 'खेचरी' कहते हैं । इस स्थिति में पशुओं का ज्ञान क्षेत्र संकुचित करके यह खेचरी अपने 'चिद्गगनचरी' स्वरूप को छिपाकर शिव को पशुभूमिका पर लाकर पशुओं को 'शक्तिदरिद्री' बना देती है । किन्तु शक्तिवर्ग का यह बन्धनकारी रूप ही उसका सत्स्वरूप नहीं है । यही शक्ति चक्र सर्वकर्तृत्व, सर्वज्ञातृत्व, सर्वव्यापकत्व, अमित तृप्ति आदि अपनी पञ्चधा विभक्त अपनी अनन्त एवं असीम शक्तियों में स्पन्दित होकर 'चिद्गगनचरी' के रूप में 'पति- प्रमाता' ('शङ्कर') को सर्वशक्ति सम्पन्न एवं निर्बंध एवं पूर्ण स्वतन्त्र भी बनाती है ।
१२२ स्पन्दकारिका २. 'गोचरी'—शक्ति का यह स्वरूप वाणी के 'परा' 'पश्यन्ती' 'मध्यमा' 'वैखरी'—इन चार वाग्विस्तारों एवं अन्तःकरणों में विचरण करती हैं। यह एक ओर भेद व्याप्ति द्वारा पशुप्रमाता को लौकिक संकल्पविकल्पों के चक्रव्यूह में फँसा देती है और वहीं दूसरी ओर पतिप्रमाता (शिव) के हृदय में अभेदात्मक महाव्याप्ति के रूप में अविरत् स्फुरित होती रहती है। ३. 'दिक्त्वरी'—शक्ति का यह स्वरूप पाँच ज्ञानेन्द्रियों एवं पाँच कर्मेन्द्रियों के संचरण-अंतरिक्ष में प्रसरण करती हुई पशुप्रमाताओं की इन्द्रियों को संसारोन्मुख बनाती है और उनसे प्रमेयों को भेददृष्टि से ग्रहण कराकर भेदावभास उत्पन्न करती है और दूसरी ओर यही शक्ति वर्ग पति प्रमाता को अन्तर्मुखी एवं अतीन्द्रिय अवबोधों के द्वारा प्रत्येक वस्तु को 'अहं' के रूप में ग्रहण कराता है। ४. 'भूचरी'—शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गंध-पञ्च महाविषयों (पञ्च तन्मात्राओं = पञ्च सूक्ष्म महाभूतों) की प्रमेय-भूमिकाओं में व्याप्त रहने वाला यह शक्ति वर्ग एक ओर पशुप्रमाताओं को भिन्नाकारक घट पटादि अनन्त प्रमेयों के मकड़जाल में फँसा देता है और दूसरी ओर यही शक्ति वर्ग पति-प्रमाता (शिव) को उन्हीं अनन्त प्रमेयों को स्वांगरूप में अनुभव करा देता है। निःशेष 'शक्तिचक्र' एवं 'आन्तर चक्र' स्पन्दात्मिका संवित् तत्त्व के साथ अभिन्न है और अविराम स्पन्दात्मक एवं नित्य रूप से चेतन है। 'विमूढोऽमूढ़वत्'—यही नित्य चैतन्यस्वरूप शक्तिसमष्टि निःशेष इन्द्रिय समूह में एवं इन्द्रियेतर शरीर, प्राण एवं पुर्यष्टक आदि में चैतन्यावेश कराकर उनको चेतनवत् बना देता है और इसी चैतन्य भाव के कारण पशुप्रमाता भी इन करणों के द्वारा सृष्टि- संहारादिक व्यापारों का निष्पादन करता है। १. 'प्रवृत्ति'—'प्रवृत्ति' क्या है? शब्द, स्पर्श, 'प्रवृत्तिस्थितिसंहृतीः' = रूप, रस, गंध रूप अपने ग्राह्य विषयों के ग्रहण-काल में इन्द्रियों की विषयोन्मुखी (ग्राह्योन्मुखी) अवस्था को प्रवृत्ति या उन्मिषित अवस्था = सृष्टि दशा कहते हैं—'प्रवृत्तिः' जिघृक्षितार्थो-न्मुखतासमुन्मिदवस्था ॥' २. 'स्थिति'—स्थिति क्या है? स्थिति है गृहीत अर्थों की विश्रान्ति अवस्था— 'स्थितिः गृहीतार्थविश्रान्त्यवस्था'। स्वानुकूल ग्राह्य विषयों को ग्रहण करने के पश्चात् कतिपय कालखण्ड तक उन्हीं में लीन होकर विश्राम करने की अवस्था की संज्ञा है—'स्थितिदशा'। ३. 'संहृति' (संहार)—अपने कार्य-निष्पादन या उद्देश्यपूर्ति के अनन्तर कृत- कृत्य हो जाने से उन्हीं गृहीत ग्राह्य पदार्थों से पृथक् होकर, अपने व्यापारों से मुक्त होने की अवस्था को इन्द्रियों की संहारदशा कहा जाता है। यही इन्द्रियों की 'प्रत्यस्त- मायावस्था' भी है।—'संहतिः' कृतकृत्यत्वाद् बाह्यार्थपरित्यागे स्वव्यापारोपरमः 'प्रत्यस्त- मायावस्था'।
प्रथमः निष्यन्दः १२३ सारांश—समस्त शक्तिचक्र, बाह्य इन्द्रिय समूह, समस्त जड़ प्रमेय वर्ग आदि को अस्तित्व प्रदान करने वाला मात्र स्पन्द तत्त्व (अहं प्रत्यवमर्शात्मिका संवित् शक्ति) ही है। पूर्ववर्ती कारिकाओं में स्पन्द तत्त्व को पारमार्थिक सत्ता के रूप में स्थापित, प्रतिष्ठित एवं सिद्ध करने के अनन्तर अग्रवर्ती कारिकाओं (६,७) में कारिकाकार ने विश्व के प्रत्येक अणु-परमाणु में एक ही स्पन्दात्मिकी संवित् शक्ति के स्वातन्त्र्य-विस्तार का विवेचन किया है। यही परस्वतन्त्र पारमेश्वरी 'स्पन्दशक्ति' अपनी अप्रतिहत 'स्वातन्त्र्य शक्ति' के द्वारा जड़ प्रमेयों में भी व्याप्त है। कारिकासूत्रकार कहते हैं— जिस स्पन्दात्मक आत्मबल के स्पर्श मात्र से आन्तर शक्ति चक्र (खेचरी आदि शक्तिचक्र) के साथ ही साथ समस्त इन्द्रिय-समूह को अचेतन होने पर भी चेतन की भाँति सृष्टि, स्थिति एवं संहार करने की शक्ति प्राप्त होती है उस स्पन्दात्मस्वभाव तत्त्व का परीक्षण एवं आदर प्रयत्नपूर्वक करना चाहिए। क्योंकि उस स्पन्दात्मक आत्मतत्त्व की स्वतन्त्रता स्वाभाविक रूप से 'प्रत्येक अणु में व्याप्त है। (६।७) ॥ सरांश = १. स्पन्दात्मक आत्मबल खेचरी, गोचरी, दिक्करी भूचरी शक्ति समूह को एवं अचेतन इन्द्रियों को सृष्टि-स्थिति-संहार करने की शक्ति प्रदान करता है। २. स्पन्दात्मक आत्म तत्त्व का प्रयत्नपूर्वक सादर परीक्षण करना चाहिए। ३. ऐसे स्पन्दात्मक आत्म तत्त्व की अकृत्रिमा स्वतन्त्रता विश्व के प्रत्येक अणु में (प्रत्येक शरीर एवं प्रत्येक अवस्था में) संचरित हो रही है। ४. सहज स्वातन्त्र्य (स्वतन्त्र अहं प्रत्यवमर्श) ही प्रत्येक पदार्थ का वास्तविक स्वभाव बनकर अवस्थित है। अर्थात् प्रत्येक पदार्थ का स्वस्वभाव सहजस्वांत्र्य है। 'यतः' = चूँकि। जिसके द्वारा। 'करणवर्ग' = इन्द्रियों का समूह। 'विमूढ़' = अचेतन। अमूढ़ = चेतन। सहान्तरेण चक्रेण = आन्तर शक्ति चक्र के ही साथ। प्रवृत्ति-स्थिति-संहती: = सृष्टि-स्थिति-संहार। तत् = उस। स्पन्दात्मक स्वभाव। आत्मा तत्त्व = आत्मा। यतः = क्योंकि। इयम् = यह। अकृत्रिमा = स्वाभाविक। प्रश्न—यः 'अन्येषां चैतन्यापादने समर्थः कथं निःस्वभावः ?' जो जड़ पदार्थों को भी चैतन्य प्रदान करता है वह स्वयं स्वभावहीन—चैतन्यहीन कैसे हो सकता है ? यह कथमपि संभव नहीं है। भट्टकल्लट कहते हैं—यतः करणवर्गस्य अन्तश्चक्रसहितस्य विमूढस्याप्यमूढवत् उत्पत्तिस्थितिनिरोधाः, सोऽन्येषां चैतन्यापादने समर्थः कथं निःस्वभावः ? तस्मात् तत् तत्त्वं यत्नेन परीक्षितव्यं योगिना, यथास्य करणादिषु चैतन्य दाने स्वातन्त्र्यम्, तथा परपुरादिष्वपि संभाव्यते, स्वातन्त्र्यस्य स्वस्वभावभूतस्य सर्वत्राकृत्रिमस्याभ्यासात् यतो व्यक्तिः ॥ ६-७ ॥
१२४ स्पन्दकारिका (क) 'करणवर्ग'—करण साधन है । 'साधकतमं करणम्' । वह साधन जो किसी कार्य के निष्पादन में सर्वाधिक उपयोगी एवं आवश्यक साधन हो उसे 'करण' कहते हैं । करणों का समूह निम्नांकित है— १) अन्तःकरण—४ = १. मन २. बुद्धि ३. चित्त ४. अहंकार । १. मन २. बुद्धि ३. अहंकार । २) बाह्यकरण—क) पञ्च कर्मेन्द्रियाँ—१. पैर २. हाथ ३. जिह्वा ४. पायु और ५. उपस्थ । (ख) पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ—१. कर्ण २. त्वचा ३. नेत्र ४. रसना ५. नासिका । ये सारे करण अचेन (मूढ़) हैं । विशेष स्पन्दों के प्रवाह ही इनमें क्रिया निष्पादन की क्षमता प्रदान करते हैं अन्यथा स्वतः तो ये अचेतन होने के कारण निष्क्रिय हैं । मृत्यूपरान्त एवं विकारग्रस्त होने पर या चैतन्य का संपर्क टूट जाने पर ये कोई कार्य निष्पादित नहीं कर पाते । (ग) 'आन्तरचक्र'—प्रथम कारिका (प्रथम स्पन्द सूत्र) में भी चक्र का उल्लेख हुआ है—'तं शक्तिचक्रविभवप्रभवं शङ्करं स्तुमः ।' पारमेश्वरी शक्ति के विविध प्रवाह निम्नांकित हैं— १. मातृका (शब्द समूह) का रूप धारण करके अ से क्ष पर्यन्त आठ वर्गों की अधिष्ठात्रियाँ बनी हुई हैं जो निम्न है—क) 'माहेश्वरी' ख) 'ब्राह्मणी' ग) 'कौमारी' घ) 'वैष्णवी' ङ) 'ऐन्द्री' च) 'याम्या' छ) 'चामुण्डा' ज) 'योगीशी' । २. अन्तःकरणों एवं बहिष्करणों का स्वरूप धारण करके समस्त शारीरिक एवं मानसिक कार्यों का निष्पादन करते हैं जो निम्न है—क) खेचरी ख) भूचरी ग) दिक्चरी घ) गोचरी शक्ति । ३. प्राण, बुद्धि, अन्तःकरण, ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ, पञ्चमहाभूत । विरंचि से तृण पर्यन्त समस्त सत्ताएँ परमात्मा की अनन्त शक्तियों के अनन्त रूप ही तो हैं । इन्हीं अनन्त शक्तियों का अभिधान है—'शक्तिचक्र' । 'तदेव शक्तिभेदेन माहेश्वर्यादि चाष्टकम् । माहेश्वरी ब्राह्मणी चैव कौमारी वैष्णवी तथा ॥ ऐन्द्री याम्या च चामुण्डा योगीशी चेति ता मताः ॥' (मा०वि० ३.१३-१४) 'प्रत्यभिज्ञाहृदय' के बारहवें सूत्र में क्षेमराज ने भी इनका उल्लेख किया है— 'किञ्चितिरेव भगवती विश्व वमनात् संसारवामाचारत्वाच्च वामेश्वर्याख्या सती, खेचरी- गोचरी-दिक्चरी-भूचरी रूपै, अशेषैः प्रमातृ अन्तःकरण बहिष्करण भावस्वभावैः परिस्फुरन्ती— क) पशुभूमिकायां शून्यपदविश्रान्ता किञ्चित्कर्तृत्वाद्यात्मक कलादिशक्त्यात्मना खेचरी क्रमेण ।
प्रथमः निष्यन्दः १२५ ख) गोपित पारमार्थिक चिद्गगनचरीत्वस्वरूपेण चकास्ति । ग) भेदनिश्चयाभिमान विकल्पन प्रधानान्तःकरणदेवीरूपेण गोचरीक्रमेण गोपिता- भेदनिश्चयाद्यात्मकपारमार्थिकस्वरूपेण प्रकाशते ।। ('प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' क्षेमराज) आत्मबल प्राप्त होने पर 'पशु' भी 'पशुपति' बन जाता है— नहीच्छानोदनस्यायं प्रेरकत्वेन वर्तते । अपित्वात्मबलस्पर्शात्पुरुषस्तत्समो भवेत् ॥ ८ ॥ यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि (मितप्रमाता) पुरुष मात्र पारमेश्वरी आकांक्षा के अंकुश का प्रेरक बनकर ही नहीं रहता प्रत्युत् आत्मबल का संस्पर्श प्राप्त करने की दशा में (वह) पुरुष उसी (पति प्रमाता = परशिव) के समान हो जाया करता है ॥ ८ ॥
- सरोजिनी * 'नहि' = न खलु । 'नहि' = नहीं । 'नोदन' = (नुद्यते अनेन इति) प्रेषण । (नुद् + ल्युट्) । प्रेरणा । चलाने का, हाँकने का काम । (हाँकने का पैना) । प्रतोद । (अंकुश) । अयं = इस आन्तर पुरुष को । 'बल' = सामर्थ्य । 'अपितु' = प्रत्युत । बल्कि । 'हि' = ही, केवल (स्पन्द प्र०) । आत्म बल = अपनी शक्ति । आत्मा की शक्ति । 'इच्छानोदन' = इच्छा प्रेषण । इच्छा ही नोदन है—प्रतोद है । 'अयं' = लौकिक पुरुष । नोदन = प्रेरक (Pusher) लौकिक पुरुष इन्द्रियों को अपने विषयों में प्रवृत्त होने हेतु प्रवृत्त नहीं करता इन्द्रियों को अपने विषयों की ओर नहीं लगाता । स्पन्दनिर्णय (क्षेमराज) यह जीवात्मा (पुरुष) केवल इच्छा-प्रेषण या करण-समूह की प्रेरणा का स्वतन्त्र कर्ता ही नहीं है प्रत्युत् अपने निरावरण चिद्रूपत्व, ज्ञत्व, कर्तृत्व आदि शक्ति के स्पर्श से वही हो जाता है अर्थात् यह स्वयं सर्वज्ञ एवं सर्वकर्ता है । आत्मा में पूर्ण स्वातन्त्र्य निहित है । (स्प०प्र०) ।१ 'प्रेरकत्वेन वर्तते' = इन्द्रिय वर्ग के प्रति उत्प्रेरक होने से यह पुरुष संसारी प्रमाता बनता है । वर्तते = (अवतिष्ठते) स्थित है । यह आन्तर पुरुष अपनी इच्छा से जड़ करण वर्ग को अपने विषय में उत्प्रेरित नहीं करता प्रत्युत यह आत्मबल के स्पर्श से करता है । पर प्रमाता, सर्वकर्ता ईश्वर का जो यह स्वभाव है कि वह बिना करणों की अपेक्षा के ही समस्त वस्तुओं का संपादन कर डालता है उसके संपर्क से या स्पर्श से उसके समान ही बन जाता है ।२ तत्समो भवेत् = स्वस्वभाव में स्थित परमात्मा इस जगत् की सृष्टि स्थिति-संहृति तीनों करने में स्वतन्त्र है । इसी प्रकार यह संसारी पुरुष भी १-२. स्पन्दप्रदीपिका ।
१२६ स्पन्दकारिका स्वस्वभाव में स्थित होकर करणवर्ग को स्वविषयों में प्रवृत्त कराने में स्वतन्त्र है। अतः वह तत्सम है। यथा ईश्वर सर्व व्यापिका ज्ञान क्रिया आदि शक्तियों से विश्व को प्रवृत्त करके सभी कुछ जानता है एवं सभी कुछ करता है उसी प्रकार पुरुष उसकी शक्ति के संस्पर्श से ज्ञातृत्व-कर्तृत्व की सामर्थ्य प्राप्त करके (माया के कारण) निश्चित विषयों द्वारा और ज्ञान-क्रिया शक्तियों द्वारा अंतरवर्ती एवं बाह्यवर्ती करणों द्वारा प्रसृत स्वविषयों को जानता भी है और संपादित भी करता है। यही है दोनों में—पुरुष एवं परमात्मा में— साम्य ॥ इसीलिए कहा गया है—'न च इच्छाप्रेरणेन करणानि प्रेरयति।' संसारी पुरुष करणवर्ग को अपने-अपने व्यापार में प्रवर्तित करते हुए ईश्वरभूमिका प्राप्त करने के कारण परमात्मा की ही भाँति स्वातन्त्र्य प्राप्त कर लेता है। अतः संसारी पुरुष एवं ईश्वर में अभेद सिद्ध है। १ आचार्य उत्पल इस कारिका के प्रतिपाद्य विषय के विषय में कहते है— 'तदिच्छायास्तु सामर्थ्यं करणानां स्वतन्त्रता। सर्वत्रोक्तास्य या सा तु भक्तियुक्तिरतस्त्वियम् ॥' २ यह बात कैसे हो गई कि उस तत्त्व से चैतन्य सदृश शक्ति प्राप्त करके इन्द्रियाँ स्वयमेव प्रवृत्त्यादि शक्तियाँ प्राप्त कर लेती हैं? यही ग्राहक—कारणों को प्रेरित करता है। तत्त्व की प्रयत्नपूर्वक परीक्षा की जानी चाहिए यह कैसे ? क्योंकि अपनी इच्छा बाहर ही अनुधावन करती रहती है न कि तत्त्व-परीक्षा में। ऐसी आशंका होने पर ही ग्रन्थकार कहते हैं— 'नहीच्छानोदनस्यायं .... पुरुषस्तत्समो भवेत् ॥' ३ अर्थात् सांसारिक प्राणी इच्छा के संचालक के रूप में अर्थात् संचालक या निर्देशक की भाँति क्रिया नहीं किया करता प्रत्युत् वह अपनी आत्मशक्ति (Vitality of self) की प्रेरणा से उस (तत्त्व) के समान हो सकता है। ४ सांसारिक प्राणी इच्छाओं का अंकुश या संचालक बनकर कोई कार्य नहीं करता, वह इच्छाओं के अभिप्रेरण (नोदन) का सूत्रधार नहीं है अर्थात् वह इन्द्रियों को अपने विषयों की ओर प्रवृत्त करने में संचालक की भूमिका का निर्वहन नहीं करता प्रत्युत् वह उस स्पन्दशक्ति की किञ्चिन्मात्र प्रेरणा से उस तत्त्व के तुल्य हो सकता है जो कि चेतना से अभिन्न आत्मा की शक्ति को जन्म देता है। यहाँ तक कि जड़ भी चेतन हो सकते हैं जब कि वे अहंता के अमृत की एक बूँद से अभिषिक्त हो जायें। तत् से वह तत्त्व स्पन्दन करने में केवल इन्द्रियों को ही नहीं प्रत्युत् कृत्रिम प्रमाता (Perceiver) को भी सक्षम बनाता है और शंका की जाती है कि वह चेतना को प्रेरित करके इन्द्रियों का १. स्पन्दकारिका विवृति। २. स्पन्दप्रदीपिका। ३-४. स्पन्दनिर्णय।
प्रथमः निष्यन्दः १२७ संचालन भी करता है। इसी कारण वह सोचता है कि 'मैने इन्द्रियों को निर्देशित किया।' वह उस तत्त्व की प्रेरणा के बिना अपने अस्तित्व का त्याग करने हेतु बाध्य हो जाता है। अतः उस तत्त्व की परीक्षा अवश्य की जानी चाहिए। वह तत्त्व अपनी प्रकाश-रश्मियों के वर्ग से आविर्भूत अन्तःप्रवाही तरंगों (Inflow of currents) द्वारा इन्द्रियों एवं प्रमाता (Perceiver) को चेतना, सजीवता (Sentiency) में परिवर्तित कर देता है। इस प्रकार यह सब कुछ सोपपत्तिक (Logical) है। यदि इसका प्रत्यक्ष विरोध करते हुए आक्षेपक (Objector) अपने इस विचार पर दृढ़ है कि इन्द्रियाँ इच्छा रूपी अंकुश के स्वरूप वाली किसी अन्य इन्द्रिय से निर्देशित होती हैं तब तो वह इच्छा रूपी इन्द्रिय के स्वरूप का होने के कारण अपने संचालन के लिए अन्य इन्द्रिय की अपेक्षा करने लगेगा और फिर वह भी किसी दूसरे इन्द्रिय की अपेक्षा करने लगेगा तब तो अनन्त श्रेणी-परम्परा उत्पन्न हो जाएगी जो कि कभी समाप्त ही नहीं होगी।१ मनुष्य अपनी इच्छा को याथार्थ्य या परासत्ता के परीक्षणार्थ प्रस्तुत नहीं कर सकता क्योंकि परासत्ता अज्ञेय (Inconceiveble) है अतः अपनी इच्छा के द्वारा उसे नहीं समझा जा सकता। किन्तु जब वही प्रमाता अपनी इच्छाओं को शान्त कर लेता है, स्पन्द तत्त्व का संस्पर्श कर लेता है या अन्तर्मुखी आत्मा को छू लेता है, विषयों की सोत्कण्ठ शोध (Hot pursuit of the objects) द्वारा, इसे पूर्ण एवं अभीष्ट परितृप्ति (Satiation) हेतु अनुमति प्रदान करते हुए जब स्पन्दतत्त्व का स्पर्श करता है और चैतन्य द्वारा अपनी इन्द्रियों को समलंकृत करते हुए अग्रपद होता है तब वह 'उसके' सदृश हो जाता है।२ ऐसी स्थिति में वह इसके अन्तःप्रवाह (Inflow) के द्वारा उस तत्त्व के सदृश सर्वत्र स्वातन्त्र्य प्राप्ति कर लेगा। इसीलिए कहा गया है याथार्थ्य (Reality) की परीक्षा की जानी चाहिए।३ यहाँ पर 'स्पर्श' शब्द आत्म शक्ति के संदर्भ में प्रयुक्त किया गया है। १. चिद्रूप आत्मा का जो स्पन्दतत्त्वात्मक बल है उसके स्पर्श से स्वल्प मात्रक आवेश से भी साधक 'उसके' समान हो जाता है— 'आत्मनश्चिद्रूपस्य यद्बलं स्पन्दतत्त्वात्मकं तत्स्पर्शात् तत्कृतात् कियन्मात्रात् आवे- शात् तत्समो भवेत् ॥'४ २. अहन्ता के रस से अभिषिक्त अचेतन भी चेतन हो जाता है— 'अहन्तारसविप्रुड अभिषेकात् अचेतनोऽपि चेतनताम् आसादयति।' ३. सांसारिक पुरुष तत्त्वपरीक्षणार्थ इच्छाओं को प्रवर्तित करने में सक्षम नहीं है क्योंकि तत्त्व अविकल्प्य (inconceivable) है अतः वह अपनी इच्छा से तत्त्व को विषय बनाने में समक्ष नहीं है— 'नायं पुरुषः तत्त्वपरीक्षार्थं इच्छां प्रवर्तयितुं शक्नोति— १-४. स्पन्दनिर्णय।
१२८ स्पन्दकारिका न इच्छया तत्त्वं विषयीकर्तुं क्षमः, तस्य अविकल्प्यत्वात् ।' १ ४. विषयानुवर्तिनी इच्छाओं का शमन करके, स्पन्दतत्त्व का स्पर्श करके ही योगी साधक 'स्वातंत्र्य' प्राप्त कर सकता है तथा 'उसके' समान हो सकता है अन्यथा नहीं— २ 'विषयानुधावन्ती' इच्छां तदुपभोगपुरःसरं प्रशमय्य यदा तु अन्तर्मुखं आत्मबलं स्पन्दतत्त्वं स्वकरणानां च चेतनावहं स्पृशति तदा तत्समो भवेत् । तत्समावेशात् तद्वत् सर्वत्र स्वतन्त्रतां आसादयति एव यस्मात् एवं तस्मात् तत्त्वं परीक्ष्यम् ॥' ३ आचार्य उत्पलदेव कहते हैं यह जीवात्मा पुरुष केवल इच्छा-प्रेषण या करण- समूह की प्रेरणा का स्वतन्त्र कर्ता नहीं है प्रत्युत् अपने निरावरण चिद्रूपत्व ज्ञत्वं एवं कर्तृत्व आदि के बल के स्पर्श से वही हो जाता है अर्थात् यह स्वयं ही सर्वज्ञ एवं सर्वकर्ता है ।४ 'आत्मनो बलमात्मबलं निरावरण चिद्रूपं ज्ञत्वकर्तृत्वलक्षणम् । तत्स्पर्शात्- दवष्टाम्भात् तत्समो भवति । सर्वज्ञः सर्वकर्ता स्यादित्यर्थः ॥' ५ 'मितात्मा' एवं 'अमितात्मा' (अणु + परमेश्वर) दोनों में एकरूपता है क्योंकि— 'कर्तृत्व' 'स्वातन्त्र्य' 'चैतन्य' 'ईश्वरता' एवं 'अहंता' ये पर्यायवाची शब्द हैं और दोनों में स्थित है— 'ईश्वरता कर्तृत्वं स्वतन्त्रता चित्स्वरूपा चेति । एतेऽहन्तायाः किल पर्यायः सद्भििरुच्यते ॥' (विरूपाक्षपञ्चाशिका) पुरुषस्तत्समो भवेत्—'पशु' पशुपति (शिव) के समान बन जाता है । आचार्य क्षेमराज—'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' में कहते हैं— 'चितिः संकोचात्मा चेतनोऽपि संकुचित विश्वमयः ॥' (सू०४) अर्थात् 'जिस प्रकार संसार भगवान् का शरीर है उसी प्रकार संकुचित चिति शक्तिस्वरूप जीवात्मा भी संकुचित विश्वमय शरीर धारण करने वाला है ।' श्री परमशिव अपने स्वरूप से अभिन्न रूप में अवस्थित विश्व को 'सदाशिव' आदि के रूप में प्रकाशित करने की इच्छा करते हुए प्रथमतः चिदैक्य संकोचमय अनाश्रित शिव या शून्यातिशून्य रूप में प्रकाशात्मक तथा प्रकाशमानरूप से स्फुरित होते हैं । फिर घनीभूत चिद्रसमय निखिल तत्त्व, भुवन, भाव एवं भिन्न-भिन्न प्रमाताओं के रूप में अपने को विकसित करते हैं । यथा भगवान् विश्वरूप शरीर वाले हैं वैसे ही संकुचित चिद्रूप प्रमाता भी बटबीज के समान संकुचित समस्त विश्वरूप होता है वह पृथक् रूप से शरीरी भी है और अशरीरी भी तथा समष्टि रूप से समस्त शरीरों का शरीरी आत्मा है ।६ ग्राहक संकुचित विश्वमय ही है । ग्राहक जीव भी प्रकाश तत्त्व के साथ ऐकात्म्य प्राप्त होने से उक्त आगम की युक्ति से विश्वरूप शरीरधारी शिव से अभिन्न ही है । मायाशक्ति से स्वरूप के अभिव्यक्त न होने से संकुचित सदृश प्रतीत होता है । संकोच भी चिदैक्य रूप से विकसित होने के कारण चिन्मय के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । सभी जीव विश्वशरीरी शिवभट्टारक ही है—'इति सर्वो ग्राहको विश्वशरीरः शिवभट्टारक एव' (क्षेमराज-प्रत्यभिज्ञाहृदयम् ॥ १-३. स्पन्दनिर्णय । ४-५. स्पन्दप्रदीपिका । ६. क्षेमराज—प्र०हृ० (पृ० ११)
प्रथमः निष्यन्दः १२९ स्पन्दशास्त्र में कहा भी गया है—(श्री स्पन्दशास्त्रेषु—'यस्मात् सर्वमयो जीवः) कि जीव सर्वात्मक है और—'न सावस्था न यः शिवः ।' भी कहकर जीव को शिव ही बताया गया है ।—'शिवजीवयोरभेद एव उक्तः ।' एतत्परिज्ञान 'मुक्तिः' । एतत्त्वापरि- ज्ञानमेव च बन्धः ॥' जीवेश्वर का ऐक्यानुसंधान ही मुक्ति एवं इसका अज्ञान ही 'बन्धन' कहा गया है । जीव का जो संकुचित चित्त है वह भी पराभट्टारिका चिति शक्ति ही तो है— ‘चितिरेव चेतनपदादवरूढा चेत्यसङ्कोचिनी चित्तम् । (५) 'न चित्तं नाम अन्यत्किंचित् अपितु सैव भगवती तत् ॥ तथा हि सा स्वयं स्वरूपं गोपयित्वा यदा सङ्कोचं गृह्णाति तदा द्वयी गतिः । कदाचित् उल्लसितमपि सङ्कोचं गुणीकृत्य चित्प्राधान्येन स्फुरति कदाचित् सङ्कोच- प्रधानतया ।' जीव जो सतोगुण, रजोगुण एवं तमोगुण से आबद्ध है वह भी शिव की इच्छा, ज्ञान एवं क्रिया शक्तियों के ही रूप हैं—'स्वातन्त्र्यात्मा चितिशक्तिरेव ज्ञानक्रियामाया- शक्तिरूपा पशुदशाया सङ्कोचप्रकर्षात् सत्त्वरजस्तमः स्वभावचित्तात्मतया स्फुरति ।' इसीलिए कहा गया है कि— जो लोग संसार में परम तत्त्व का अनुसंधान करने वाले हैं उनके लिए जीवों के स्वरूप में वर्तमान शिव ज्योति का लोप नहीं होता— अतएव तु ये केचित् परमार्थानुसारिणः । तेषां तत्र स्वरूपस्य स्वज्योतिष्ट्वं न लुप्यते ॥ परमात्मा ही तो जीव है क्योंकि—'यदा चिदात्मा परमेश्वरः स्वातन्त्र्यात् अभेद- व्याप्तिं निमज्ज्य भेदव्याप्तिं अवलम्बते तदा तदीया इच्छादिशक्तयः असंकोचिता अपि सङ्कोचवत्यो भान्ति तदानीमेव च इयं मलावृतः संसारी भवति ।' शक्तिदरिद्रः संसारी उच्यते स्वशक्तिविकासे तु शिव एव ।' ‘तथापि तद्वत् पञ्चकृत्यानि करोति ॥' (प्र०हृ०१०) संसारी दशा में भी आत्मा की शिवत्व के अनुरूप क्या पहचान है? 'संसारी दशा में भी आत्मा शिव के सदृश पञ्चकृत्य करता है । शिवसूत्र में भी कहा गया है—'शिवतुल्यो जायते' (२५) 'स्पन्दसूत्र' में कहा गया है—'तत्समो भवेत्' (स्पन्दसूत्र ८) अर्थात् तुर्यपरिशीलनप्रकर्षात् प्राप्ततुर्यातीतपदः परिपूर्णस्वच्छ स्वच्छन्दचिदानन्दघनेन शिवेन भगवता तुल्यो; देहकलाया अविगलनात् तत्समो जायते ।' 'कालिकाक्रम' में भी कहा गया है— तस्मान्नित्यमसंदिग्धं बुद्ध्या योगं गुरोर्मुखात् । अविकल्पनभावेन भावयेत्तन्मयत्वतः । यावत्तत्समतां याति भगवान्भैरवोऽब्रवीत् ॥' 'शिवसूत्रवार्तिक' (वरदराज) में भी कहा गया है— स्पं० ९
१३० स्पन्दकारिका तुर्याभ्यासप्रकर्षेण तुर्यातीतात्मकं पदम् । संप्राप्तः साधकः साक्षात्सर्वलोकान्तरात्मना ॥ शिवेन चिन्मयस्वच्छस्वच्छन्दानन्दशालिना । तुल्योविगलनाद्देहकलाया गहने शिवः ॥ जीवों में इच्छा-स्वातन्त्र्य है या नहीं ? यदि चिदात्मा परमात्मा या पराभट्टारिका स्पन्दात्मिका संवित् शक्ति या स्वातन्त्र्य शक्ति या विमर्श ही सभी का कारण है और सारी इच्छायें उसकी इच्छाशक्ति की दास हैं तो मितप्रमाता की क्या भूमिका है ? क्या पशुप्रमाता में इच्छा-स्वातन्त्र्य है या कि वह केवल परमेश्वरी 'इच्छाशक्ति' (विमर्श, स्वातन्त्र्यशक्ति) के आदेशानुसार ही उनकी प्रेरणा से इन्द्रियों को अपने-अपने कार्यों में नियोजित करती है ? पशुप्रमाता में इच्छा-स्वातन्त्र्य का प्रतिपादन (स्पन्द सूत्र ८)—कारिकाकार कहता है कि मितप्रमाता पुरुष केवल पारमेश्वरी इच्छा के अंकुश का प्रेरक मात्र बनकर ही नहीं रह जाता प्रत्युत् वह स्वात्म बल के स्पर्श होने की अवस्था में स्वयं पतिप्रमाता (शिव) के समतुल्य बन जाता है । १. उत्पलदेवाचार्य कहते हैं—'अयं पुरुषो जीवात्मा नेच्छानोदनस्य नेच्छा प्रेषणस्य करणचक्र चोदकस्यैव केवलं प्रेरकभावेन वर्तले ।।'—'स्पन्दप्रदीपिका' २. रामकण्ठाचार्य कहते हैं—१. 'ननु स्वव्यापारे करणवर्गं प्रवर्तयन् पुरुषः ईश्वर-भूमिकासादनात् तद्वत् स्वातन्त्र्यम् आप्नोति ।। इति तयोः ईश्वरपुरुषयोः अभेदं एव प्रतिपादितः स्यात्' कथं भेद निबन्धनम् ईश्वरसाम्यं पुरुषस्य प्रतिपादितं तस्यां दशायाम्? २. 'परमेश्वरो जगदिदं प्रवृत्ति-स्थिति-संहती: यथेष्टं लंभयितु स्वतन्त्रः । तत्रैव स्थित्वा पुरुषोऽपि अयं संसारी करणवर्गं स्वविषये प्रवृत्त्यादि लंभयितुं स्वतन्त्रः तेन तत्समो भवेत् ।। ३. 'यथा ईश्वरः सर्वव्यापिकाभ्यां ज्ञान-क्रियाख्याभ्यां शक्तिभ्यां विश्वं प्रवृत्त्यादि प्रापयन् सर्वं जानाति च करोति च' तथा पुरुषः तलस्पर्शादेव अज्ञातज्ञत्व-कर्तृत्व-सामर्थ्यो मायावशात् नियतविषयाभ्यां ज्ञानक्रियाशक्तिभ्यां अन्तर्बहिरूपकरणर्गतया प्रसुताभ्यां स्वविषयं जानाति च करोति च, इति तत्साम्यम्—'स्पन्दकारिकाविवृति' ३. भट्टकल्लट कहते हैं—'न च इच्छा प्रेषणेन करणानि प्रेषयति, अपितु स्व- स्वरूपे स्थित्वा केवलं यादृशी तस्येच्छा प्रवर्तते तथाविधमेव सामर्थ्यम् किंतु तस्य सर्वत्र' —'स्पन्दसर्वस्व' । वृत्तिकार कहते हैं कि यही नहीं समझ लेना चाहिए कि मितप्रमाता (पशुप्रमाता) पारमेश्वरी इच्छांकुश के कारण इन्द्रियों की अपना कार्य निष्पादित करने मात्र की प्रेरणा देता है और उसका कोई भी इच्छा स्वातन्त्र्य या क्रिया-स्वातन्त्र्य नहीं है । इसके विपरीत सत्ता तो यह है कि पशुप्रमाता अपने स्वरूप में अवस्थित रहकर अपनी इच्छा के अनुरूप बाह्याभ्यन्तर कार्यों का निष्पादन करता है । इन दशाओं में मितप्रमाता (पशु) की किंचन इन्द्रियों को विषयोन्मुख करने की ही सामर्थ्य नहीं होती प्रत्युत् उसे (पशु-प्रमाता को) प्रत्येक क्षेत्र में स्वातन्त्र्यपूर्ण कार्य करने की पूर्ण क्षमता भी अधिगत रहती है ।