स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३० स्पन्दकारिका तुर्याभ्यासप्रकर्षेण तुर्यातीतात्मकं पदम् । संप्राप्तः साधकः साक्षात्सर्वलोकान्तरात्मना ॥ शिवेन चिन्मयस्वच्छस्वच्छन्दानन्दशालिना । तुल्योविगलनाद्देहकलाया गहने शिवः ॥ जीवों में इच्छा-स्वातन्त्र्य है या नहीं ? यदि चिदात्मा परमात्मा या पराभट्टारिका स्पन्दात्मिका संवित् शक्ति या स्वातन्त्र्य शक्ति या विमर्श ही सभी का कारण है और सारी इच्छायें उसकी इच्छाशक्ति की दास हैं तो मितप्रमाता की क्या भूमिका है ? क्या पशुप्रमाता में इच्छा-स्वातन्त्र्य है या कि वह केवल परमेश्वरी 'इच्छाशक्ति' (विमर्श, स्वातन्त्र्यशक्ति) के आदेशानुसार ही उनकी प्रेरणा से इन्द्रियों को अपने-अपने कार्यों में नियोजित करती है ? पशुप्रमाता में इच्छा-स्वातन्त्र्य का प्रतिपादन (स्पन्द सूत्र ८)—कारिकाकार कहता है कि मितप्रमाता पुरुष केवल पारमेश्वरी इच्छा के अंकुश का प्रेरक मात्र बनकर ही नहीं रह जाता प्रत्युत् वह स्वात्म बल के स्पर्श होने की अवस्था में स्वयं पतिप्रमाता (शिव) के समतुल्य बन जाता है । १. उत्पलदेवाचार्य कहते हैं—'अयं पुरुषो जीवात्मा नेच्छानोदनस्य नेच्छा प्रेषणस्य करणचक्र चोदकस्यैव केवलं प्रेरकभावेन वर्तले ।।'—'स्पन्दप्रदीपिका' २. रामकण्ठाचार्य कहते हैं—१. 'ननु स्वव्यापारे करणवर्गं प्रवर्तयन् पुरुषः ईश्वर-भूमिकासादनात् तद्वत् स्वातन्त्र्यम् आप्नोति ।। इति तयोः ईश्वरपुरुषयोः अभेदं एव प्रतिपादितः स्यात्' कथं भेद निबन्धनम् ईश्वरसाम्यं पुरुषस्य प्रतिपादितं तस्यां दशायाम्? २. 'परमेश्वरो जगदिदं प्रवृत्ति-स्थिति-संहती: यथेष्टं लंभयितु स्वतन्त्रः । तत्रैव स्थित्वा पुरुषोऽपि अयं संसारी करणवर्गं स्वविषये प्रवृत्त्यादि लंभयितुं स्वतन्त्रः तेन तत्समो भवेत् ।। ३. 'यथा ईश्वरः सर्वव्यापिकाभ्यां ज्ञान-क्रियाख्याभ्यां शक्तिभ्यां विश्वं प्रवृत्त्यादि प्रापयन् सर्वं जानाति च करोति च' तथा पुरुषः तलस्पर्शादेव अज्ञातज्ञत्व-कर्तृत्व-सामर्थ्यो मायावशात् नियतविषयाभ्यां ज्ञानक्रियाशक्तिभ्यां अन्तर्बहिरूपकरणर्गतया प्रसुताभ्यां स्वविषयं जानाति च करोति च, इति तत्साम्यम्—'स्पन्दकारिकाविवृति' ३. भट्टकल्लट कहते हैं—'न च इच्छा प्रेषणेन करणानि प्रेषयति, अपितु स्व- स्वरूपे स्थित्वा केवलं यादृशी तस्येच्छा प्रवर्तते तथाविधमेव सामर्थ्यम् किंतु तस्य सर्वत्र' —'स्पन्दसर्वस्व' । वृत्तिकार कहते हैं कि यही नहीं समझ लेना चाहिए कि मितप्रमाता (पशुप्रमाता) पारमेश्वरी इच्छांकुश के कारण इन्द्रियों की अपना कार्य निष्पादित करने मात्र की प्रेरणा देता है और उसका कोई भी इच्छा स्वातन्त्र्य या क्रिया-स्वातन्त्र्य नहीं है । इसके विपरीत सत्ता तो यह है कि पशुप्रमाता अपने स्वरूप में अवस्थित रहकर अपनी इच्छा के अनुरूप बाह्याभ्यन्तर कार्यों का निष्पादन करता है । इन दशाओं में मितप्रमाता (पशु) की किंचन इन्द्रियों को विषयोन्मुख करने की ही सामर्थ्य नहीं होती प्रत्युत् उसे (पशु-प्रमाता को) प्रत्येक क्षेत्र में स्वातन्त्र्यपूर्ण कार्य करने की पूर्ण क्षमता भी अधिगत रहती है ।