भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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प्रथमः निष्यन्दः १३१ सारांश यह कि प्रत्येक पशुप्रमाता अपनी स्वतन्त्र इच्छा द्वारा अपनी इन्द्रियों को उनके-उनके विषयों में संलग्न करने का अधिकार एवं शक्ति रखता है अन्यथा वह कर्मस्वातन्त्र्याभाव में कर्मफलों से भी मुक्त रहता । प्रमातृसप्तक अनाश्रित शिव सदाशिव ईश्वर शुद्धविद्या विज्ञानाकल प्रलयाकल सकल (शून्य प्रमाता) (बुद्धि (प्राण (देह प्रमाता) प्रमाता) प्रमाता) अनाश्रितः शून्यमाता बुद्धिमाता सदाशिवः । ईश्वरः प्राणमाता च विद्यादेहप्रमातृता !। 'शुद्धविद्या' से लेकर अनाश्रित शिवपर्यन्त 'शुद्धाध्वा' है । 'मन्त्र' 'मन्त्रेश्वर' 'मन्त्रमहेश्वर' 'शुद्धाध्वप्रमाता' हैं । शिव के दो रूप हैं 'अनाश्रित शिव' 'पञ्चकारण रूप शिव' (पञ्चकारण रूप शिवों में आश्रित न रहने (शिव । शक्ति । सदाशिव । ईश्वर या स्वशक्ति मात्र का आश्रय होने के शुद्धविद्या) (साश्रित) कारण 'अनाश्रित' कहलाते हैं ) उपर्युक्त समस्त प्रमाताओं एवं प्रमेयों में स्वरूपतः कोई भेद नहीं है । इन सभी पर प्रकाश डालने के बाद आठवीं कारिका का भाव सुस्पष्ट हो पायेगा । १. पतिप्रमाता—आचार्य उत्पलदेव 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञां (३.२.३) में कहते हैं— 'स्वांगरूपेषु भावेषु प्रमाता कथ्यते पतिः ।' अर्थात् प्रमाता जिस अवस्था में समस्त भावमण्डल को अपने शरीर का अभिन्न अंग जैसा मानता है—अर्थात् अहंविमर्शात्मक स्वभाव से अपने को अभिन्न मानता है । उसे ही 'पतिप्रमाता' कहते हैं । यही है 'पतिप्रमातृभाव' । इस प्रमाता का समस्त भाववर्ग पर स्वामित्व स्थापित रहने के कारण ही इसे 'पति' कहते हैं । 'पति' रक्षक को भी कहते हैं । यह भावमण्डल का सर्वोच्च रक्षक है अतः इसे 'पति' कहना उपयुक्त है । २. पशुप्रमाता—यह आत्मा जिस अवस्था में मायीय आवरण से आच्छादित रहने के कारण (विश्व के स्वांग होने पर भी) विश्व को अपना अंग नहीं प्रत्युत स्वातिरिक्त अन्य पदार्थ मानती है उसे ही 'पशुप्रमाता' कहते हैं—यही है पशु—'मायातो भेदिषु क्लेश कर्मादिकंलुषः पशुः ।।' (ई०प्र० ३.२.३) यह भाववर्ग का स्वामी नहीं उसका दास होता है । भावों के क्षोभ को ही बन्धन कहते हैं । 'पशु' इसी बन्धन का कैदी होता है और संसृति-चक्र में फँसकर अनन्त काल तक बन्धन में पड़ा रहता है ।