स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 233, कुल 519 में से
संदर्भ में पढ़ें१३२ स्पन्दकारिका 'संसारी' (पशु रूप ग्राहक) और 'पतिप्रमाता' स्वरूपतः अभिन्न होने के कारण समतुल्य हैं। इन दोनों की 'इच्छाशक्ति' 'क्रियाशक्ति' एवं 'ज्ञानशक्ति' भी यत्किञ्चित् समतुल्य हैं। दोनों की क्रियाओं में अन्तर है तो केवल यह कि पति भूमिका पर 'इच्छा' 'क्रिया' एव 'ज्ञान' तीनों निरपेक्ष, नित्य, स्वतन्त्र, देशकालातीत, आत्मस्वरूप, सर्व- व्यापी, अमित अनादि, अनन्त, सर्वात्मक तथा सर्वानुस्यूत है। किन्तु पशुभूमिक मितात्मा की इच्छा, ज्ञान एवं क्रिया देशकालावच्छिन्न, अनित्य, अस्वतन्त्रात्मक, सादि-सान्त, मितानुस्यूत एवं व्यष्टिगत होता है। चिद्रूपता पर पड़े आवरण के परिमाण एवं मात्रा के अनुसार ही इच्छा, ज्ञान एवं क्रिया पर आवरण पड़ता है। किसी के ऊपर यह आवरण झीना होता है तो किसी के ऊपर अत्यन्त मोटा। इसी अनुपात में प्रत्येक मितात्मा की इच्छा-ज्ञान-क्रिया में शक्ति, सामर्थ्य, चेतना और स्वातन्त्र्य का निवास होता है। समस्त विश्व-वैचित्र्य और अनन्त भाव राशि शिव की असीम एवं अनन्त शक्तियों का विश्वात्मक प्रसार मात्र है, उसके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं— 'एष चानन्तशक्तित्वादेवमाभासयत्यमून । भावानिच्छावशादेषा क्रिया निर्मातृतास्य सा ॥'१ जगत् परमात्मा का संकल्पावभासन मात्र है। 'स्वातन्त्र्यशक्ति' की ही यह विशिष्ट क्षमता है कि वह तात्त्विक दृष्टि एवं स्वरूप की दृष्टि से एक (अद्वैत) होते हुए भी अनेकाकार ग्राह्यों को अवभासित करती है। यही है उसका क्रियास्वरूप स्वातन्त्र्य। यह शक्ति मितात्मा ग्राहकों (पशुओं = अणुओं = जीवों) में नहीं है। 'ग्राहक' 'ग्राह्य' एवं 'ग्रहण'—इन तीनों में एक ही सत्ता भासमान है। 'पतिप्रमाता' 'पशुप्रमाता' एवं समस्त ग्राह्य वर्ग (प्रमेय समूह) (जड़ पदार्थ) एक ही मूल सत्ता के रूपान्तर हैं। संवित्तत्त्व (१) विभु होने के कारण सर्वव्यापक (२) नित्य होने के कारण आदि- अन्त-शून्य (३) विश्वाकार होने के कारण—चेतन और जड़ तथा विश्व वैचित्र्य एवं अनन्त आकार-प्रकारों को अवभासित करता है— 'विभुत्वात्सर्वगो नित्यभावादाद्यन्तवर्जितः। विश्वकृतित्वाच्चिदचित्तद्वैचित्र्यावभासकः ॥ ततोऽस्य बहुरूपत्वम् ... ... ... ... ॥'२ विश्वसिसृक्षु परमात्मा प्रथमतः अपने से अपृथक् विश्व को अपने से भिन्न वस्तु के रूप में प्रकाशित करता है और इसे ही 'आदिसर्ग' कहा गया है—'विश्वनिर्माणेच्छुर्हि परमेश्वरः प्रथमं स्वाव्यति रिक्तमेव विश्वं प्रकाशयेत् । अयमेव हि आदिसर्गः ॥' अनन्त शक्तियों से संयुक्त शिव जगत् का बाह्यावभासन करते समय संकल्पोन्मुखता के काल में उसका अवभासन अभिन्न अहंविमर्श के रूप में ही करता है। 'स्वातन्त्र्यशक्ति' रूपान्तरित होकर 'मायाशक्ति' का रूप ग्रहण करती है और स्वरूप पर आवरण डालकर (आत्म- स्वरूप को आच्छादित करके) स्वात्मचैतन्य के मुकुर में अनन्त ग्राह्यग्राहकों को अव- भासित करती है— १. ईश्वरप्रत्यभिज्ञा (२.४.२)। २. तन्त्रालोक (१.६१-६२)।