भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 234

प्रथमः निष्यन्दः १३३ ‘सोऽयमात्मानमावृत्य स्थितो जडपदं गतः । आवृतानावृतात्मा तु देवादिस्यावरान्तगः । जडानडस्याप्येतस्य द्वैरूप्यस्यास्ति चित्रता ॥’ (तं० १।१३४-५) ‘पतिप्रमाता’ ‘पशुप्रमाता’ एवं ‘जड़ प्रमेय’ तीनों अपने सभी रूपों में स्पन्दात्मक स्वभाव के ही स्वस्वरूप हैं । इनका स्वरूप निम्नानुसार है—

१.पतिप्रमाताविशुद्ध, चिद्रूप, अनावृतज्ञातृत्व कर्तृत्व स्वातन्त्र्य शक्तिविश्वात्मक निराकारस्वांग रूप में विश्व का ग्रहणभेदशून्य
२.पशुप्रमाताचिदचिद् अर्द्धावृत अर्द्धानावृतसंकुचित ज्ञान संकुचित क्रियादेह, प्राण पुर्यष्टक शून्यसर्व, रूपों से अभिन्नतादेवता मनुष्य पशु पक्षी
३.प्रमेय जड़वर्गअचित् पूर्णावृत चैतन्य वालाज्ञेय कार्यजड़ पञ्चभूतविमूढ़ता में स्थिति के कारण विसंज्ञसमस्त स्थावर प्रकृति अनन्तभेद
क्षोभावसान से परमपद की प्राप्ति का प्रतिपादन—
निजाशुद्ध्यासामर्थ्यस्य कर्तव्येष्वभिलाषिणः ।
यदा क्षोभः प्रलीयेत् तदा स्यात् परमं पदम् ॥ ९ ॥
अपनी (अपने स्वातन्त्र्य से समुत्पादित) (मलात्मक) अशुद्धि से असमर्थ तथा
(वासनात्मक) कर्तव्यों की आकांक्षायें रखने वाले (मितप्रमाता) का ‘क्षोभ’ जब (स्व-
स्वरूप में) लयीभूत हो जाता है । तब उसको ‘परमपद’ प्राप्त होता है ॥ ९ ॥
इस कारिका के प्रतिपाद्यविषय के बारे में स्पन्दप्रदीपिकाकार कहते हैं—
‘अनेन सर्व स्वातन्त्र्यमुक्तस्य च तद्भवेत् ।
अभिमानात्मकक्षोभक्षयेन त्वन्यमाह च ॥’
  • सरोजिनी * ‘निजाशुद्धि’ = ‘निजा सहजा । अनादिर्याऽशुद्धिरविद्याऽविवेकमूला भोगाभिलाष- मलरूपतयाऽसमर्थस्य संकुचितशक्तेः ॥’ (स्पन्दप्रदीपिका) निजा = स्वात्मीया । अशुद्धि = ‘आणव मल’ । ‘मायीय मल’ । ‘कार्म मल’ । अशुद्धि = अशुद्धियाँ । आणव, मायीय एवं कार्म अशुद्धियाँ ।