भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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प्रथमः निष्यन्दः १२९ स्पन्दशास्त्र में कहा भी गया है—(श्री स्पन्दशास्त्रेषु—'यस्मात् सर्वमयो जीवः) कि जीव सर्वात्मक है और—'न सावस्था न यः शिवः ।' भी कहकर जीव को शिव ही बताया गया है ।—'शिवजीवयोरभेद एव उक्तः ।' एतत्परिज्ञान 'मुक्तिः' । एतत्त्वापरि- ज्ञानमेव च बन्धः ॥' जीवेश्वर का ऐक्यानुसंधान ही मुक्ति एवं इसका अज्ञान ही 'बन्धन' कहा गया है । जीव का जो संकुचित चित्त है वह भी पराभट्टारिका चिति शक्ति ही तो है— ‘चितिरेव चेतनपदादवरूढा चेत्यसङ्कोचिनी चित्तम् । (५) 'न चित्तं नाम अन्यत्किंचित् अपितु सैव भगवती तत् ॥ तथा हि सा स्वयं स्वरूपं गोपयित्वा यदा सङ्कोचं गृह्णाति तदा द्वयी गतिः । कदाचित् उल्लसितमपि सङ्कोचं गुणीकृत्य चित्प्राधान्येन स्फुरति कदाचित् सङ्कोच- प्रधानतया ।' जीव जो सतोगुण, रजोगुण एवं तमोगुण से आबद्ध है वह भी शिव की इच्छा, ज्ञान एवं क्रिया शक्तियों के ही रूप हैं—'स्वातन्त्र्यात्मा चितिशक्तिरेव ज्ञानक्रियामाया- शक्तिरूपा पशुदशाया सङ्कोचप्रकर्षात् सत्त्वरजस्तमः स्वभावचित्तात्मतया स्फुरति ।' इसीलिए कहा गया है कि— जो लोग संसार में परम तत्त्व का अनुसंधान करने वाले हैं उनके लिए जीवों के स्वरूप में वर्तमान शिव ज्योति का लोप नहीं होता— अतएव तु ये केचित् परमार्थानुसारिणः । तेषां तत्र स्वरूपस्य स्वज्योतिष्ट्वं न लुप्यते ॥ परमात्मा ही तो जीव है क्योंकि—'यदा चिदात्मा परमेश्वरः स्वातन्त्र्यात् अभेद- व्याप्तिं निमज्ज्य भेदव्याप्तिं अवलम्बते तदा तदीया इच्छादिशक्तयः असंकोचिता अपि सङ्कोचवत्यो भान्ति तदानीमेव च इयं मलावृतः संसारी भवति ।' शक्तिदरिद्रः संसारी उच्यते स्वशक्तिविकासे तु शिव एव ।' ‘तथापि तद्वत् पञ्चकृत्यानि करोति ॥' (प्र०हृ०१०) संसारी दशा में भी आत्मा की शिवत्व के अनुरूप क्या पहचान है? 'संसारी दशा में भी आत्मा शिव के सदृश पञ्चकृत्य करता है । शिवसूत्र में भी कहा गया है—'शिवतुल्यो जायते' (२५) 'स्पन्दसूत्र' में कहा गया है—'तत्समो भवेत्' (स्पन्दसूत्र ८) अर्थात् तुर्यपरिशीलनप्रकर्षात् प्राप्ततुर्यातीतपदः परिपूर्णस्वच्छ स्वच्छन्दचिदानन्दघनेन शिवेन भगवता तुल्यो; देहकलाया अविगलनात् तत्समो जायते ।' 'कालिकाक्रम' में भी कहा गया है— तस्मान्नित्यमसंदिग्धं बुद्ध्या योगं गुरोर्मुखात् । अविकल्पनभावेन भावयेत्तन्मयत्वतः । यावत्तत्समतां याति भगवान्भैरवोऽब्रवीत् ॥' 'शिवसूत्रवार्तिक' (वरदराज) में भी कहा गया है— स्पं० ९