स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२८ स्पन्दकारिका न इच्छया तत्त्वं विषयीकर्तुं क्षमः, तस्य अविकल्प्यत्वात् ।' १ ४. विषयानुवर्तिनी इच्छाओं का शमन करके, स्पन्दतत्त्व का स्पर्श करके ही योगी साधक 'स्वातंत्र्य' प्राप्त कर सकता है तथा 'उसके' समान हो सकता है अन्यथा नहीं— २ 'विषयानुधावन्ती' इच्छां तदुपभोगपुरःसरं प्रशमय्य यदा तु अन्तर्मुखं आत्मबलं स्पन्दतत्त्वं स्वकरणानां च चेतनावहं स्पृशति तदा तत्समो भवेत् । तत्समावेशात् तद्वत् सर्वत्र स्वतन्त्रतां आसादयति एव यस्मात् एवं तस्मात् तत्त्वं परीक्ष्यम् ॥' ३ आचार्य उत्पलदेव कहते हैं यह जीवात्मा पुरुष केवल इच्छा-प्रेषण या करण- समूह की प्रेरणा का स्वतन्त्र कर्ता नहीं है प्रत्युत् अपने निरावरण चिद्रूपत्व ज्ञत्वं एवं कर्तृत्व आदि के बल के स्पर्श से वही हो जाता है अर्थात् यह स्वयं ही सर्वज्ञ एवं सर्वकर्ता है ।४ 'आत्मनो बलमात्मबलं निरावरण चिद्रूपं ज्ञत्वकर्तृत्वलक्षणम् । तत्स्पर्शात्- दवष्टाम्भात् तत्समो भवति । सर्वज्ञः सर्वकर्ता स्यादित्यर्थः ॥' ५ 'मितात्मा' एवं 'अमितात्मा' (अणु + परमेश्वर) दोनों में एकरूपता है क्योंकि— 'कर्तृत्व' 'स्वातन्त्र्य' 'चैतन्य' 'ईश्वरता' एवं 'अहंता' ये पर्यायवाची शब्द हैं और दोनों में स्थित है— 'ईश्वरता कर्तृत्वं स्वतन्त्रता चित्स्वरूपा चेति । एतेऽहन्तायाः किल पर्यायः सद्भििरुच्यते ॥' (विरूपाक्षपञ्चाशिका) पुरुषस्तत्समो भवेत्—'पशु' पशुपति (शिव) के समान बन जाता है । आचार्य क्षेमराज—'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' में कहते हैं— 'चितिः संकोचात्मा चेतनोऽपि संकुचित विश्वमयः ॥' (सू०४) अर्थात् 'जिस प्रकार संसार भगवान् का शरीर है उसी प्रकार संकुचित चिति शक्तिस्वरूप जीवात्मा भी संकुचित विश्वमय शरीर धारण करने वाला है ।' श्री परमशिव अपने स्वरूप से अभिन्न रूप में अवस्थित विश्व को 'सदाशिव' आदि के रूप में प्रकाशित करने की इच्छा करते हुए प्रथमतः चिदैक्य संकोचमय अनाश्रित शिव या शून्यातिशून्य रूप में प्रकाशात्मक तथा प्रकाशमानरूप से स्फुरित होते हैं । फिर घनीभूत चिद्रसमय निखिल तत्त्व, भुवन, भाव एवं भिन्न-भिन्न प्रमाताओं के रूप में अपने को विकसित करते हैं । यथा भगवान् विश्वरूप शरीर वाले हैं वैसे ही संकुचित चिद्रूप प्रमाता भी बटबीज के समान संकुचित समस्त विश्वरूप होता है वह पृथक् रूप से शरीरी भी है और अशरीरी भी तथा समष्टि रूप से समस्त शरीरों का शरीरी आत्मा है ।६ ग्राहक संकुचित विश्वमय ही है । ग्राहक जीव भी प्रकाश तत्त्व के साथ ऐकात्म्य प्राप्त होने से उक्त आगम की युक्ति से विश्वरूप शरीरधारी शिव से अभिन्न ही है । मायाशक्ति से स्वरूप के अभिव्यक्त न होने से संकुचित सदृश प्रतीत होता है । संकोच भी चिदैक्य रूप से विकसित होने के कारण चिन्मय के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । सभी जीव विश्वशरीरी शिवभट्टारक ही है—'इति सर्वो ग्राहको विश्वशरीरः शिवभट्टारक एव' (क्षेमराज-प्रत्यभिज्ञाहृदयम् ॥ १-३. स्पन्दनिर्णय । ४-५. स्पन्दप्रदीपिका । ६. क्षेमराज—प्र०हृ० (पृ० ११)