स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 223, कुल 519 में से
संदर्भ में पढ़ें१२२ स्पन्दकारिका २. 'गोचरी'—शक्ति का यह स्वरूप वाणी के 'परा' 'पश्यन्ती' 'मध्यमा' 'वैखरी'—इन चार वाग्विस्तारों एवं अन्तःकरणों में विचरण करती हैं। यह एक ओर भेद व्याप्ति द्वारा पशुप्रमाता को लौकिक संकल्पविकल्पों के चक्रव्यूह में फँसा देती है और वहीं दूसरी ओर पतिप्रमाता (शिव) के हृदय में अभेदात्मक महाव्याप्ति के रूप में अविरत् स्फुरित होती रहती है। ३. 'दिक्त्वरी'—शक्ति का यह स्वरूप पाँच ज्ञानेन्द्रियों एवं पाँच कर्मेन्द्रियों के संचरण-अंतरिक्ष में प्रसरण करती हुई पशुप्रमाताओं की इन्द्रियों को संसारोन्मुख बनाती है और उनसे प्रमेयों को भेददृष्टि से ग्रहण कराकर भेदावभास उत्पन्न करती है और दूसरी ओर यही शक्ति वर्ग पति प्रमाता को अन्तर्मुखी एवं अतीन्द्रिय अवबोधों के द्वारा प्रत्येक वस्तु को 'अहं' के रूप में ग्रहण कराता है। ४. 'भूचरी'—शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गंध-पञ्च महाविषयों (पञ्च तन्मात्राओं = पञ्च सूक्ष्म महाभूतों) की प्रमेय-भूमिकाओं में व्याप्त रहने वाला यह शक्ति वर्ग एक ओर पशुप्रमाताओं को भिन्नाकारक घट पटादि अनन्त प्रमेयों के मकड़जाल में फँसा देता है और दूसरी ओर यही शक्ति वर्ग पति-प्रमाता (शिव) को उन्हीं अनन्त प्रमेयों को स्वांगरूप में अनुभव करा देता है। निःशेष 'शक्तिचक्र' एवं 'आन्तर चक्र' स्पन्दात्मिका संवित् तत्त्व के साथ अभिन्न है और अविराम स्पन्दात्मक एवं नित्य रूप से चेतन है। 'विमूढोऽमूढ़वत्'—यही नित्य चैतन्यस्वरूप शक्तिसमष्टि निःशेष इन्द्रिय समूह में एवं इन्द्रियेतर शरीर, प्राण एवं पुर्यष्टक आदि में चैतन्यावेश कराकर उनको चेतनवत् बना देता है और इसी चैतन्य भाव के कारण पशुप्रमाता भी इन करणों के द्वारा सृष्टि- संहारादिक व्यापारों का निष्पादन करता है। १. 'प्रवृत्ति'—'प्रवृत्ति' क्या है? शब्द, स्पर्श, 'प्रवृत्तिस्थितिसंहृतीः' = रूप, रस, गंध रूप अपने ग्राह्य विषयों के ग्रहण-काल में इन्द्रियों की विषयोन्मुखी (ग्राह्योन्मुखी) अवस्था को प्रवृत्ति या उन्मिषित अवस्था = सृष्टि दशा कहते हैं—'प्रवृत्तिः' जिघृक्षितार्थो-न्मुखतासमुन्मिदवस्था ॥' २. 'स्थिति'—स्थिति क्या है? स्थिति है गृहीत अर्थों की विश्रान्ति अवस्था— 'स्थितिः गृहीतार्थविश्रान्त्यवस्था'। स्वानुकूल ग्राह्य विषयों को ग्रहण करने के पश्चात् कतिपय कालखण्ड तक उन्हीं में लीन होकर विश्राम करने की अवस्था की संज्ञा है—'स्थितिदशा'। ३. 'संहृति' (संहार)—अपने कार्य-निष्पादन या उद्देश्यपूर्ति के अनन्तर कृत- कृत्य हो जाने से उन्हीं गृहीत ग्राह्य पदार्थों से पृथक् होकर, अपने व्यापारों से मुक्त होने की अवस्था को इन्द्रियों की संहारदशा कहा जाता है। यही इन्द्रियों की 'प्रत्यस्त- मायावस्था' भी है।—'संहतिः' कृतकृत्यत्वाद् बाह्यार्थपरित्यागे स्वव्यापारोपरमः 'प्रत्यस्त- मायावस्था'।