स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
१२२ स्पन्दकारिका २. 'गोचरी'—शक्ति का यह स्वरूप वाणी के 'परा' 'पश्यन्ती' 'मध्यमा' 'वैखरी'—इन चार वाग्विस्तारों एवं अन्तःकरणों में विचरण करती हैं। यह एक ओर भेद व्याप्ति द्वारा पशुप्रमाता को लौकिक संकल्पविकल्पों के चक्रव्यूह में फँसा देती है और वहीं दूसरी ओर पतिप्रमाता (शिव) के हृदय में अभेदात्मक महाव्याप्ति के रूप में अविरत् स्फुरित होती रहती है। ३. 'दिक्त्वरी'—शक्ति का यह स्वरूप पाँच ज्ञानेन्द्रियों एवं पाँच कर्मेन्द्रियों के संचरण-अंतरिक्ष में प्रसरण करती हुई पशुप्रमाताओं की इन्द्रियों को संसारोन्मुख बनाती है और उनसे प्रमेयों को भेददृष्टि से ग्रहण कराकर भेदावभास उत्पन्न करती है और दूसरी ओर यही शक्ति वर्ग पति प्रमाता को अन्तर्मुखी एवं अतीन्द्रिय अवबोधों के द्वारा प्रत्येक वस्तु को 'अहं' के रूप में ग्रहण कराता है। ४. 'भूचरी'—शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गंध-पञ्च महाविषयों (पञ्च तन्मात्राओं = पञ्च सूक्ष्म महाभूतों) की प्रमेय-भूमिकाओं में व्याप्त रहने वाला यह शक्ति वर्ग एक ओर पशुप्रमाताओं को भिन्नाकारक घट पटादि अनन्त प्रमेयों के मकड़जाल में फँसा देता है और दूसरी ओर यही शक्ति वर्ग पति-प्रमाता (शिव) को उन्हीं अनन्त प्रमेयों को स्वांगरूप में अनुभव करा देता है। निःशेष 'शक्तिचक्र' एवं 'आन्तर चक्र' स्पन्दात्मिका संवित् तत्त्व के साथ अभिन्न है और अविराम स्पन्दात्मक एवं नित्य रूप से चेतन है। 'विमूढोऽमूढ़वत्'—यही नित्य चैतन्यस्वरूप शक्तिसमष्टि निःशेष इन्द्रिय समूह में एवं इन्द्रियेतर शरीर, प्राण एवं पुर्यष्टक आदि में चैतन्यावेश कराकर उनको चेतनवत् बना देता है और इसी चैतन्य भाव के कारण पशुप्रमाता भी इन करणों के द्वारा सृष्टि- संहारादिक व्यापारों का निष्पादन करता है। १. 'प्रवृत्ति'—'प्रवृत्ति' क्या है? शब्द, स्पर्श, 'प्रवृत्तिस्थितिसंहृतीः' = रूप, रस, गंध रूप अपने ग्राह्य विषयों के ग्रहण-काल में इन्द्रियों की विषयोन्मुखी (ग्राह्योन्मुखी) अवस्था को प्रवृत्ति या उन्मिषित अवस्था = सृष्टि दशा कहते हैं—'प्रवृत्तिः' जिघृक्षितार्थो-न्मुखतासमुन्मिदवस्था ॥' २. 'स्थिति'—स्थिति क्या है? स्थिति है गृहीत अर्थों की विश्रान्ति अवस्था— 'स्थितिः गृहीतार्थविश्रान्त्यवस्था'। स्वानुकूल ग्राह्य विषयों को ग्रहण करने के पश्चात् कतिपय कालखण्ड तक उन्हीं में लीन होकर विश्राम करने की अवस्था की संज्ञा है—'स्थितिदशा'। ३. 'संहृति' (संहार)—अपने कार्य-निष्पादन या उद्देश्यपूर्ति के अनन्तर कृत- कृत्य हो जाने से उन्हीं गृहीत ग्राह्य पदार्थों से पृथक् होकर, अपने व्यापारों से मुक्त होने की अवस्था को इन्द्रियों की संहारदशा कहा जाता है। यही इन्द्रियों की 'प्रत्यस्त- मायावस्था' भी है।—'संहतिः' कृतकृत्यत्वाद् बाह्यार्थपरित्यागे स्वव्यापारोपरमः 'प्रत्यस्त- मायावस्था'।
प्रथमः निष्यन्दः १२३ सारांश—समस्त शक्तिचक्र, बाह्य इन्द्रिय समूह, समस्त जड़ प्रमेय वर्ग आदि को अस्तित्व प्रदान करने वाला मात्र स्पन्द तत्त्व (अहं प्रत्यवमर्शात्मिका संवित् शक्ति) ही है। पूर्ववर्ती कारिकाओं में स्पन्द तत्त्व को पारमार्थिक सत्ता के रूप में स्थापित, प्रतिष्ठित एवं सिद्ध करने के अनन्तर अग्रवर्ती कारिकाओं (६,७) में कारिकाकार ने विश्व के प्रत्येक अणु-परमाणु में एक ही स्पन्दात्मिकी संवित् शक्ति के स्वातन्त्र्य-विस्तार का विवेचन किया है। यही परस्वतन्त्र पारमेश्वरी 'स्पन्दशक्ति' अपनी अप्रतिहत 'स्वातन्त्र्य शक्ति' के द्वारा जड़ प्रमेयों में भी व्याप्त है। कारिकासूत्रकार कहते हैं— जिस स्पन्दात्मक आत्मबल के स्पर्श मात्र से आन्तर शक्ति चक्र (खेचरी आदि शक्तिचक्र) के साथ ही साथ समस्त इन्द्रिय-समूह को अचेतन होने पर भी चेतन की भाँति सृष्टि, स्थिति एवं संहार करने की शक्ति प्राप्त होती है उस स्पन्दात्मस्वभाव तत्त्व का परीक्षण एवं आदर प्रयत्नपूर्वक करना चाहिए। क्योंकि उस स्पन्दात्मक आत्मतत्त्व की स्वतन्त्रता स्वाभाविक रूप से 'प्रत्येक अणु में व्याप्त है। (६।७) ॥ सरांश = १. स्पन्दात्मक आत्मबल खेचरी, गोचरी, दिक्करी भूचरी शक्ति समूह को एवं अचेतन इन्द्रियों को सृष्टि-स्थिति-संहार करने की शक्ति प्रदान करता है। २. स्पन्दात्मक आत्म तत्त्व का प्रयत्नपूर्वक सादर परीक्षण करना चाहिए। ३. ऐसे स्पन्दात्मक आत्म तत्त्व की अकृत्रिमा स्वतन्त्रता विश्व के प्रत्येक अणु में (प्रत्येक शरीर एवं प्रत्येक अवस्था में) संचरित हो रही है। ४. सहज स्वातन्त्र्य (स्वतन्त्र अहं प्रत्यवमर्श) ही प्रत्येक पदार्थ का वास्तविक स्वभाव बनकर अवस्थित है। अर्थात् प्रत्येक पदार्थ का स्वस्वभाव सहजस्वांत्र्य है। 'यतः' = चूँकि। जिसके द्वारा। 'करणवर्ग' = इन्द्रियों का समूह। 'विमूढ़' = अचेतन। अमूढ़ = चेतन। सहान्तरेण चक्रेण = आन्तर शक्ति चक्र के ही साथ। प्रवृत्ति-स्थिति-संहती: = सृष्टि-स्थिति-संहार। तत् = उस। स्पन्दात्मक स्वभाव। आत्मा तत्त्व = आत्मा। यतः = क्योंकि। इयम् = यह। अकृत्रिमा = स्वाभाविक। प्रश्न—यः 'अन्येषां चैतन्यापादने समर्थः कथं निःस्वभावः ?' जो जड़ पदार्थों को भी चैतन्य प्रदान करता है वह स्वयं स्वभावहीन—चैतन्यहीन कैसे हो सकता है ? यह कथमपि संभव नहीं है। भट्टकल्लट कहते हैं—यतः करणवर्गस्य अन्तश्चक्रसहितस्य विमूढस्याप्यमूढवत् उत्पत्तिस्थितिनिरोधाः, सोऽन्येषां चैतन्यापादने समर्थः कथं निःस्वभावः ? तस्मात् तत् तत्त्वं यत्नेन परीक्षितव्यं योगिना, यथास्य करणादिषु चैतन्य दाने स्वातन्त्र्यम्, तथा परपुरादिष्वपि संभाव्यते, स्वातन्त्र्यस्य स्वस्वभावभूतस्य सर्वत्राकृत्रिमस्याभ्यासात् यतो व्यक्तिः ॥ ६-७ ॥
१२४ स्पन्दकारिका (क) 'करणवर्ग'—करण साधन है । 'साधकतमं करणम्' । वह साधन जो किसी कार्य के निष्पादन में सर्वाधिक उपयोगी एवं आवश्यक साधन हो उसे 'करण' कहते हैं । करणों का समूह निम्नांकित है— १) अन्तःकरण—४ = १. मन २. बुद्धि ३. चित्त ४. अहंकार । १. मन २. बुद्धि ३. अहंकार । २) बाह्यकरण—क) पञ्च कर्मेन्द्रियाँ—१. पैर २. हाथ ३. जिह्वा ४. पायु और ५. उपस्थ । (ख) पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ—१. कर्ण २. त्वचा ३. नेत्र ४. रसना ५. नासिका । ये सारे करण अचेन (मूढ़) हैं । विशेष स्पन्दों के प्रवाह ही इनमें क्रिया निष्पादन की क्षमता प्रदान करते हैं अन्यथा स्वतः तो ये अचेतन होने के कारण निष्क्रिय हैं । मृत्यूपरान्त एवं विकारग्रस्त होने पर या चैतन्य का संपर्क टूट जाने पर ये कोई कार्य निष्पादित नहीं कर पाते । (ग) 'आन्तरचक्र'—प्रथम कारिका (प्रथम स्पन्द सूत्र) में भी चक्र का उल्लेख हुआ है—'तं शक्तिचक्रविभवप्रभवं शङ्करं स्तुमः ।' पारमेश्वरी शक्ति के विविध प्रवाह निम्नांकित हैं— १. मातृका (शब्द समूह) का रूप धारण करके अ से क्ष पर्यन्त आठ वर्गों की अधिष्ठात्रियाँ बनी हुई हैं जो निम्न है—क) 'माहेश्वरी' ख) 'ब्राह्मणी' ग) 'कौमारी' घ) 'वैष्णवी' ङ) 'ऐन्द्री' च) 'याम्या' छ) 'चामुण्डा' ज) 'योगीशी' । २. अन्तःकरणों एवं बहिष्करणों का स्वरूप धारण करके समस्त शारीरिक एवं मानसिक कार्यों का निष्पादन करते हैं जो निम्न है—क) खेचरी ख) भूचरी ग) दिक्चरी घ) गोचरी शक्ति । ३. प्राण, बुद्धि, अन्तःकरण, ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ, पञ्चमहाभूत । विरंचि से तृण पर्यन्त समस्त सत्ताएँ परमात्मा की अनन्त शक्तियों के अनन्त रूप ही तो हैं । इन्हीं अनन्त शक्तियों का अभिधान है—'शक्तिचक्र' । 'तदेव शक्तिभेदेन माहेश्वर्यादि चाष्टकम् । माहेश्वरी ब्राह्मणी चैव कौमारी वैष्णवी तथा ॥ ऐन्द्री याम्या च चामुण्डा योगीशी चेति ता मताः ॥' (मा०वि० ३.१३-१४) 'प्रत्यभिज्ञाहृदय' के बारहवें सूत्र में क्षेमराज ने भी इनका उल्लेख किया है— 'किञ्चितिरेव भगवती विश्व वमनात् संसारवामाचारत्वाच्च वामेश्वर्याख्या सती, खेचरी- गोचरी-दिक्चरी-भूचरी रूपै, अशेषैः प्रमातृ अन्तःकरण बहिष्करण भावस्वभावैः परिस्फुरन्ती— क) पशुभूमिकायां शून्यपदविश्रान्ता किञ्चित्कर्तृत्वाद्यात्मक कलादिशक्त्यात्मना खेचरी क्रमेण ।
प्रथमः निष्यन्दः १२५ ख) गोपित पारमार्थिक चिद्गगनचरीत्वस्वरूपेण चकास्ति । ग) भेदनिश्चयाभिमान विकल्पन प्रधानान्तःकरणदेवीरूपेण गोचरीक्रमेण गोपिता- भेदनिश्चयाद्यात्मकपारमार्थिकस्वरूपेण प्रकाशते ।। ('प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' क्षेमराज) आत्मबल प्राप्त होने पर 'पशु' भी 'पशुपति' बन जाता है— नहीच्छानोदनस्यायं प्रेरकत्वेन वर्तते । अपित्वात्मबलस्पर्शात्पुरुषस्तत्समो भवेत् ॥ ८ ॥ यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि (मितप्रमाता) पुरुष मात्र पारमेश्वरी आकांक्षा के अंकुश का प्रेरक बनकर ही नहीं रहता प्रत्युत् आत्मबल का संस्पर्श प्राप्त करने की दशा में (वह) पुरुष उसी (पति प्रमाता = परशिव) के समान हो जाया करता है ॥ ८ ॥
- सरोजिनी * 'नहि' = न खलु । 'नहि' = नहीं । 'नोदन' = (नुद्यते अनेन इति) प्रेषण । (नुद् + ल्युट्) । प्रेरणा । चलाने का, हाँकने का काम । (हाँकने का पैना) । प्रतोद । (अंकुश) । अयं = इस आन्तर पुरुष को । 'बल' = सामर्थ्य । 'अपितु' = प्रत्युत । बल्कि । 'हि' = ही, केवल (स्पन्द प्र०) । आत्म बल = अपनी शक्ति । आत्मा की शक्ति । 'इच्छानोदन' = इच्छा प्रेषण । इच्छा ही नोदन है—प्रतोद है । 'अयं' = लौकिक पुरुष । नोदन = प्रेरक (Pusher) लौकिक पुरुष इन्द्रियों को अपने विषयों में प्रवृत्त होने हेतु प्रवृत्त नहीं करता इन्द्रियों को अपने विषयों की ओर नहीं लगाता । स्पन्दनिर्णय (क्षेमराज) यह जीवात्मा (पुरुष) केवल इच्छा-प्रेषण या करण-समूह की प्रेरणा का स्वतन्त्र कर्ता ही नहीं है प्रत्युत् अपने निरावरण चिद्रूपत्व, ज्ञत्व, कर्तृत्व आदि शक्ति के स्पर्श से वही हो जाता है अर्थात् यह स्वयं सर्वज्ञ एवं सर्वकर्ता है । आत्मा में पूर्ण स्वातन्त्र्य निहित है । (स्प०प्र०) ।१ 'प्रेरकत्वेन वर्तते' = इन्द्रिय वर्ग के प्रति उत्प्रेरक होने से यह पुरुष संसारी प्रमाता बनता है । वर्तते = (अवतिष्ठते) स्थित है । यह आन्तर पुरुष अपनी इच्छा से जड़ करण वर्ग को अपने विषय में उत्प्रेरित नहीं करता प्रत्युत यह आत्मबल के स्पर्श से करता है । पर प्रमाता, सर्वकर्ता ईश्वर का जो यह स्वभाव है कि वह बिना करणों की अपेक्षा के ही समस्त वस्तुओं का संपादन कर डालता है उसके संपर्क से या स्पर्श से उसके समान ही बन जाता है ।२ तत्समो भवेत् = स्वस्वभाव में स्थित परमात्मा इस जगत् की सृष्टि स्थिति-संहृति तीनों करने में स्वतन्त्र है । इसी प्रकार यह संसारी पुरुष भी १-२. स्पन्दप्रदीपिका ।
१२६ स्पन्दकारिका स्वस्वभाव में स्थित होकर करणवर्ग को स्वविषयों में प्रवृत्त कराने में स्वतन्त्र है। अतः वह तत्सम है। यथा ईश्वर सर्व व्यापिका ज्ञान क्रिया आदि शक्तियों से विश्व को प्रवृत्त करके सभी कुछ जानता है एवं सभी कुछ करता है उसी प्रकार पुरुष उसकी शक्ति के संस्पर्श से ज्ञातृत्व-कर्तृत्व की सामर्थ्य प्राप्त करके (माया के कारण) निश्चित विषयों द्वारा और ज्ञान-क्रिया शक्तियों द्वारा अंतरवर्ती एवं बाह्यवर्ती करणों द्वारा प्रसृत स्वविषयों को जानता भी है और संपादित भी करता है। यही है दोनों में—पुरुष एवं परमात्मा में— साम्य ॥ इसीलिए कहा गया है—'न च इच्छाप्रेरणेन करणानि प्रेरयति।' संसारी पुरुष करणवर्ग को अपने-अपने व्यापार में प्रवर्तित करते हुए ईश्वरभूमिका प्राप्त करने के कारण परमात्मा की ही भाँति स्वातन्त्र्य प्राप्त कर लेता है। अतः संसारी पुरुष एवं ईश्वर में अभेद सिद्ध है। १ आचार्य उत्पल इस कारिका के प्रतिपाद्य विषय के विषय में कहते है— 'तदिच्छायास्तु सामर्थ्यं करणानां स्वतन्त्रता। सर्वत्रोक्तास्य या सा तु भक्तियुक्तिरतस्त्वियम् ॥' २ यह बात कैसे हो गई कि उस तत्त्व से चैतन्य सदृश शक्ति प्राप्त करके इन्द्रियाँ स्वयमेव प्रवृत्त्यादि शक्तियाँ प्राप्त कर लेती हैं? यही ग्राहक—कारणों को प्रेरित करता है। तत्त्व की प्रयत्नपूर्वक परीक्षा की जानी चाहिए यह कैसे ? क्योंकि अपनी इच्छा बाहर ही अनुधावन करती रहती है न कि तत्त्व-परीक्षा में। ऐसी आशंका होने पर ही ग्रन्थकार कहते हैं— 'नहीच्छानोदनस्यायं .... पुरुषस्तत्समो भवेत् ॥' ३ अर्थात् सांसारिक प्राणी इच्छा के संचालक के रूप में अर्थात् संचालक या निर्देशक की भाँति क्रिया नहीं किया करता प्रत्युत् वह अपनी आत्मशक्ति (Vitality of self) की प्रेरणा से उस (तत्त्व) के समान हो सकता है। ४ सांसारिक प्राणी इच्छाओं का अंकुश या संचालक बनकर कोई कार्य नहीं करता, वह इच्छाओं के अभिप्रेरण (नोदन) का सूत्रधार नहीं है अर्थात् वह इन्द्रियों को अपने विषयों की ओर प्रवृत्त करने में संचालक की भूमिका का निर्वहन नहीं करता प्रत्युत् वह उस स्पन्दशक्ति की किञ्चिन्मात्र प्रेरणा से उस तत्त्व के तुल्य हो सकता है जो कि चेतना से अभिन्न आत्मा की शक्ति को जन्म देता है। यहाँ तक कि जड़ भी चेतन हो सकते हैं जब कि वे अहंता के अमृत की एक बूँद से अभिषिक्त हो जायें। तत् से वह तत्त्व स्पन्दन करने में केवल इन्द्रियों को ही नहीं प्रत्युत् कृत्रिम प्रमाता (Perceiver) को भी सक्षम बनाता है और शंका की जाती है कि वह चेतना को प्रेरित करके इन्द्रियों का १. स्पन्दकारिका विवृति। २. स्पन्दप्रदीपिका। ३-४. स्पन्दनिर्णय।
प्रथमः निष्यन्दः १२७ संचालन भी करता है। इसी कारण वह सोचता है कि 'मैने इन्द्रियों को निर्देशित किया।' वह उस तत्त्व की प्रेरणा के बिना अपने अस्तित्व का त्याग करने हेतु बाध्य हो जाता है। अतः उस तत्त्व की परीक्षा अवश्य की जानी चाहिए। वह तत्त्व अपनी प्रकाश-रश्मियों के वर्ग से आविर्भूत अन्तःप्रवाही तरंगों (Inflow of currents) द्वारा इन्द्रियों एवं प्रमाता (Perceiver) को चेतना, सजीवता (Sentiency) में परिवर्तित कर देता है। इस प्रकार यह सब कुछ सोपपत्तिक (Logical) है। यदि इसका प्रत्यक्ष विरोध करते हुए आक्षेपक (Objector) अपने इस विचार पर दृढ़ है कि इन्द्रियाँ इच्छा रूपी अंकुश के स्वरूप वाली किसी अन्य इन्द्रिय से निर्देशित होती हैं तब तो वह इच्छा रूपी इन्द्रिय के स्वरूप का होने के कारण अपने संचालन के लिए अन्य इन्द्रिय की अपेक्षा करने लगेगा और फिर वह भी किसी दूसरे इन्द्रिय की अपेक्षा करने लगेगा तब तो अनन्त श्रेणी-परम्परा उत्पन्न हो जाएगी जो कि कभी समाप्त ही नहीं होगी।१ मनुष्य अपनी इच्छा को याथार्थ्य या परासत्ता के परीक्षणार्थ प्रस्तुत नहीं कर सकता क्योंकि परासत्ता अज्ञेय (Inconceiveble) है अतः अपनी इच्छा के द्वारा उसे नहीं समझा जा सकता। किन्तु जब वही प्रमाता अपनी इच्छाओं को शान्त कर लेता है, स्पन्द तत्त्व का संस्पर्श कर लेता है या अन्तर्मुखी आत्मा को छू लेता है, विषयों की सोत्कण्ठ शोध (Hot pursuit of the objects) द्वारा, इसे पूर्ण एवं अभीष्ट परितृप्ति (Satiation) हेतु अनुमति प्रदान करते हुए जब स्पन्दतत्त्व का स्पर्श करता है और चैतन्य द्वारा अपनी इन्द्रियों को समलंकृत करते हुए अग्रपद होता है तब वह 'उसके' सदृश हो जाता है।२ ऐसी स्थिति में वह इसके अन्तःप्रवाह (Inflow) के द्वारा उस तत्त्व के सदृश सर्वत्र स्वातन्त्र्य प्राप्ति कर लेगा। इसीलिए कहा गया है याथार्थ्य (Reality) की परीक्षा की जानी चाहिए।३ यहाँ पर 'स्पर्श' शब्द आत्म शक्ति के संदर्भ में प्रयुक्त किया गया है। १. चिद्रूप आत्मा का जो स्पन्दतत्त्वात्मक बल है उसके स्पर्श से स्वल्प मात्रक आवेश से भी साधक 'उसके' समान हो जाता है— 'आत्मनश्चिद्रूपस्य यद्बलं स्पन्दतत्त्वात्मकं तत्स्पर्शात् तत्कृतात् कियन्मात्रात् आवे- शात् तत्समो भवेत् ॥'४ २. अहन्ता के रस से अभिषिक्त अचेतन भी चेतन हो जाता है— 'अहन्तारसविप्रुड अभिषेकात् अचेतनोऽपि चेतनताम् आसादयति।' ३. सांसारिक पुरुष तत्त्वपरीक्षणार्थ इच्छाओं को प्रवर्तित करने में सक्षम नहीं है क्योंकि तत्त्व अविकल्प्य (inconceivable) है अतः वह अपनी इच्छा से तत्त्व को विषय बनाने में समक्ष नहीं है— 'नायं पुरुषः तत्त्वपरीक्षार्थं इच्छां प्रवर्तयितुं शक्नोति— १-४. स्पन्दनिर्णय।
१२८ स्पन्दकारिका न इच्छया तत्त्वं विषयीकर्तुं क्षमः, तस्य अविकल्प्यत्वात् ।' १ ४. विषयानुवर्तिनी इच्छाओं का शमन करके, स्पन्दतत्त्व का स्पर्श करके ही योगी साधक 'स्वातंत्र्य' प्राप्त कर सकता है तथा 'उसके' समान हो सकता है अन्यथा नहीं— २ 'विषयानुधावन्ती' इच्छां तदुपभोगपुरःसरं प्रशमय्य यदा तु अन्तर्मुखं आत्मबलं स्पन्दतत्त्वं स्वकरणानां च चेतनावहं स्पृशति तदा तत्समो भवेत् । तत्समावेशात् तद्वत् सर्वत्र स्वतन्त्रतां आसादयति एव यस्मात् एवं तस्मात् तत्त्वं परीक्ष्यम् ॥' ३ आचार्य उत्पलदेव कहते हैं यह जीवात्मा पुरुष केवल इच्छा-प्रेषण या करण- समूह की प्रेरणा का स्वतन्त्र कर्ता नहीं है प्रत्युत् अपने निरावरण चिद्रूपत्व ज्ञत्वं एवं कर्तृत्व आदि के बल के स्पर्श से वही हो जाता है अर्थात् यह स्वयं ही सर्वज्ञ एवं सर्वकर्ता है ।४ 'आत्मनो बलमात्मबलं निरावरण चिद्रूपं ज्ञत्वकर्तृत्वलक्षणम् । तत्स्पर्शात्- दवष्टाम्भात् तत्समो भवति । सर्वज्ञः सर्वकर्ता स्यादित्यर्थः ॥' ५ 'मितात्मा' एवं 'अमितात्मा' (अणु + परमेश्वर) दोनों में एकरूपता है क्योंकि— 'कर्तृत्व' 'स्वातन्त्र्य' 'चैतन्य' 'ईश्वरता' एवं 'अहंता' ये पर्यायवाची शब्द हैं और दोनों में स्थित है— 'ईश्वरता कर्तृत्वं स्वतन्त्रता चित्स्वरूपा चेति । एतेऽहन्तायाः किल पर्यायः सद्भििरुच्यते ॥' (विरूपाक्षपञ्चाशिका) पुरुषस्तत्समो भवेत्—'पशु' पशुपति (शिव) के समान बन जाता है । आचार्य क्षेमराज—'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' में कहते हैं— 'चितिः संकोचात्मा चेतनोऽपि संकुचित विश्वमयः ॥' (सू०४) अर्थात् 'जिस प्रकार संसार भगवान् का शरीर है उसी प्रकार संकुचित चिति शक्तिस्वरूप जीवात्मा भी संकुचित विश्वमय शरीर धारण करने वाला है ।' श्री परमशिव अपने स्वरूप से अभिन्न रूप में अवस्थित विश्व को 'सदाशिव' आदि के रूप में प्रकाशित करने की इच्छा करते हुए प्रथमतः चिदैक्य संकोचमय अनाश्रित शिव या शून्यातिशून्य रूप में प्रकाशात्मक तथा प्रकाशमानरूप से स्फुरित होते हैं । फिर घनीभूत चिद्रसमय निखिल तत्त्व, भुवन, भाव एवं भिन्न-भिन्न प्रमाताओं के रूप में अपने को विकसित करते हैं । यथा भगवान् विश्वरूप शरीर वाले हैं वैसे ही संकुचित चिद्रूप प्रमाता भी बटबीज के समान संकुचित समस्त विश्वरूप होता है वह पृथक् रूप से शरीरी भी है और अशरीरी भी तथा समष्टि रूप से समस्त शरीरों का शरीरी आत्मा है ।६ ग्राहक संकुचित विश्वमय ही है । ग्राहक जीव भी प्रकाश तत्त्व के साथ ऐकात्म्य प्राप्त होने से उक्त आगम की युक्ति से विश्वरूप शरीरधारी शिव से अभिन्न ही है । मायाशक्ति से स्वरूप के अभिव्यक्त न होने से संकुचित सदृश प्रतीत होता है । संकोच भी चिदैक्य रूप से विकसित होने के कारण चिन्मय के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । सभी जीव विश्वशरीरी शिवभट्टारक ही है—'इति सर्वो ग्राहको विश्वशरीरः शिवभट्टारक एव' (क्षेमराज-प्रत्यभिज्ञाहृदयम् ॥ १-३. स्पन्दनिर्णय । ४-५. स्पन्दप्रदीपिका । ६. क्षेमराज—प्र०हृ० (पृ० ११)
प्रथमः निष्यन्दः १२९ स्पन्दशास्त्र में कहा भी गया है—(श्री स्पन्दशास्त्रेषु—'यस्मात् सर्वमयो जीवः) कि जीव सर्वात्मक है और—'न सावस्था न यः शिवः ।' भी कहकर जीव को शिव ही बताया गया है ।—'शिवजीवयोरभेद एव उक्तः ।' एतत्परिज्ञान 'मुक्तिः' । एतत्त्वापरि- ज्ञानमेव च बन्धः ॥' जीवेश्वर का ऐक्यानुसंधान ही मुक्ति एवं इसका अज्ञान ही 'बन्धन' कहा गया है । जीव का जो संकुचित चित्त है वह भी पराभट्टारिका चिति शक्ति ही तो है— ‘चितिरेव चेतनपदादवरूढा चेत्यसङ्कोचिनी चित्तम् । (५) 'न चित्तं नाम अन्यत्किंचित् अपितु सैव भगवती तत् ॥ तथा हि सा स्वयं स्वरूपं गोपयित्वा यदा सङ्कोचं गृह्णाति तदा द्वयी गतिः । कदाचित् उल्लसितमपि सङ्कोचं गुणीकृत्य चित्प्राधान्येन स्फुरति कदाचित् सङ्कोच- प्रधानतया ।' जीव जो सतोगुण, रजोगुण एवं तमोगुण से आबद्ध है वह भी शिव की इच्छा, ज्ञान एवं क्रिया शक्तियों के ही रूप हैं—'स्वातन्त्र्यात्मा चितिशक्तिरेव ज्ञानक्रियामाया- शक्तिरूपा पशुदशाया सङ्कोचप्रकर्षात् सत्त्वरजस्तमः स्वभावचित्तात्मतया स्फुरति ।' इसीलिए कहा गया है कि— जो लोग संसार में परम तत्त्व का अनुसंधान करने वाले हैं उनके लिए जीवों के स्वरूप में वर्तमान शिव ज्योति का लोप नहीं होता— अतएव तु ये केचित् परमार्थानुसारिणः । तेषां तत्र स्वरूपस्य स्वज्योतिष्ट्वं न लुप्यते ॥ परमात्मा ही तो जीव है क्योंकि—'यदा चिदात्मा परमेश्वरः स्वातन्त्र्यात् अभेद- व्याप्तिं निमज्ज्य भेदव्याप्तिं अवलम्बते तदा तदीया इच्छादिशक्तयः असंकोचिता अपि सङ्कोचवत्यो भान्ति तदानीमेव च इयं मलावृतः संसारी भवति ।' शक्तिदरिद्रः संसारी उच्यते स्वशक्तिविकासे तु शिव एव ।' ‘तथापि तद्वत् पञ्चकृत्यानि करोति ॥' (प्र०हृ०१०) संसारी दशा में भी आत्मा की शिवत्व के अनुरूप क्या पहचान है? 'संसारी दशा में भी आत्मा शिव के सदृश पञ्चकृत्य करता है । शिवसूत्र में भी कहा गया है—'शिवतुल्यो जायते' (२५) 'स्पन्दसूत्र' में कहा गया है—'तत्समो भवेत्' (स्पन्दसूत्र ८) अर्थात् तुर्यपरिशीलनप्रकर्षात् प्राप्ततुर्यातीतपदः परिपूर्णस्वच्छ स्वच्छन्दचिदानन्दघनेन शिवेन भगवता तुल्यो; देहकलाया अविगलनात् तत्समो जायते ।' 'कालिकाक्रम' में भी कहा गया है— तस्मान्नित्यमसंदिग्धं बुद्ध्या योगं गुरोर्मुखात् । अविकल्पनभावेन भावयेत्तन्मयत्वतः । यावत्तत्समतां याति भगवान्भैरवोऽब्रवीत् ॥' 'शिवसूत्रवार्तिक' (वरदराज) में भी कहा गया है— स्पं० ९
१३० स्पन्दकारिका तुर्याभ्यासप्रकर्षेण तुर्यातीतात्मकं पदम् । संप्राप्तः साधकः साक्षात्सर्वलोकान्तरात्मना ॥ शिवेन चिन्मयस्वच्छस्वच्छन्दानन्दशालिना । तुल्योविगलनाद्देहकलाया गहने शिवः ॥ जीवों में इच्छा-स्वातन्त्र्य है या नहीं ? यदि चिदात्मा परमात्मा या पराभट्टारिका स्पन्दात्मिका संवित् शक्ति या स्वातन्त्र्य शक्ति या विमर्श ही सभी का कारण है और सारी इच्छायें उसकी इच्छाशक्ति की दास हैं तो मितप्रमाता की क्या भूमिका है ? क्या पशुप्रमाता में इच्छा-स्वातन्त्र्य है या कि वह केवल परमेश्वरी 'इच्छाशक्ति' (विमर्श, स्वातन्त्र्यशक्ति) के आदेशानुसार ही उनकी प्रेरणा से इन्द्रियों को अपने-अपने कार्यों में नियोजित करती है ? पशुप्रमाता में इच्छा-स्वातन्त्र्य का प्रतिपादन (स्पन्द सूत्र ८)—कारिकाकार कहता है कि मितप्रमाता पुरुष केवल पारमेश्वरी इच्छा के अंकुश का प्रेरक मात्र बनकर ही नहीं रह जाता प्रत्युत् वह स्वात्म बल के स्पर्श होने की अवस्था में स्वयं पतिप्रमाता (शिव) के समतुल्य बन जाता है । १. उत्पलदेवाचार्य कहते हैं—'अयं पुरुषो जीवात्मा नेच्छानोदनस्य नेच्छा प्रेषणस्य करणचक्र चोदकस्यैव केवलं प्रेरकभावेन वर्तले ।।'—'स्पन्दप्रदीपिका' २. रामकण्ठाचार्य कहते हैं—१. 'ननु स्वव्यापारे करणवर्गं प्रवर्तयन् पुरुषः ईश्वर-भूमिकासादनात् तद्वत् स्वातन्त्र्यम् आप्नोति ।। इति तयोः ईश्वरपुरुषयोः अभेदं एव प्रतिपादितः स्यात्' कथं भेद निबन्धनम् ईश्वरसाम्यं पुरुषस्य प्रतिपादितं तस्यां दशायाम्? २. 'परमेश्वरो जगदिदं प्रवृत्ति-स्थिति-संहती: यथेष्टं लंभयितु स्वतन्त्रः । तत्रैव स्थित्वा पुरुषोऽपि अयं संसारी करणवर्गं स्वविषये प्रवृत्त्यादि लंभयितुं स्वतन्त्रः तेन तत्समो भवेत् ।। ३. 'यथा ईश्वरः सर्वव्यापिकाभ्यां ज्ञान-क्रियाख्याभ्यां शक्तिभ्यां विश्वं प्रवृत्त्यादि प्रापयन् सर्वं जानाति च करोति च' तथा पुरुषः तलस्पर्शादेव अज्ञातज्ञत्व-कर्तृत्व-सामर्थ्यो मायावशात् नियतविषयाभ्यां ज्ञानक्रियाशक्तिभ्यां अन्तर्बहिरूपकरणर्गतया प्रसुताभ्यां स्वविषयं जानाति च करोति च, इति तत्साम्यम्—'स्पन्दकारिकाविवृति' ३. भट्टकल्लट कहते हैं—'न च इच्छा प्रेषणेन करणानि प्रेषयति, अपितु स्व- स्वरूपे स्थित्वा केवलं यादृशी तस्येच्छा प्रवर्तते तथाविधमेव सामर्थ्यम् किंतु तस्य सर्वत्र' —'स्पन्दसर्वस्व' । वृत्तिकार कहते हैं कि यही नहीं समझ लेना चाहिए कि मितप्रमाता (पशुप्रमाता) पारमेश्वरी इच्छांकुश के कारण इन्द्रियों की अपना कार्य निष्पादित करने मात्र की प्रेरणा देता है और उसका कोई भी इच्छा स्वातन्त्र्य या क्रिया-स्वातन्त्र्य नहीं है । इसके विपरीत सत्ता तो यह है कि पशुप्रमाता अपने स्वरूप में अवस्थित रहकर अपनी इच्छा के अनुरूप बाह्याभ्यन्तर कार्यों का निष्पादन करता है । इन दशाओं में मितप्रमाता (पशु) की किंचन इन्द्रियों को विषयोन्मुख करने की ही सामर्थ्य नहीं होती प्रत्युत् उसे (पशु-प्रमाता को) प्रत्येक क्षेत्र में स्वातन्त्र्यपूर्ण कार्य करने की पूर्ण क्षमता भी अधिगत रहती है ।
प्रथमः निष्यन्दः १३१ सारांश यह कि प्रत्येक पशुप्रमाता अपनी स्वतन्त्र इच्छा द्वारा अपनी इन्द्रियों को उनके-उनके विषयों में संलग्न करने का अधिकार एवं शक्ति रखता है अन्यथा वह कर्मस्वातन्त्र्याभाव में कर्मफलों से भी मुक्त रहता । प्रमातृसप्तक अनाश्रित शिव सदाशिव ईश्वर शुद्धविद्या विज्ञानाकल प्रलयाकल सकल (शून्य प्रमाता) (बुद्धि (प्राण (देह प्रमाता) प्रमाता) प्रमाता) अनाश्रितः शून्यमाता बुद्धिमाता सदाशिवः । ईश्वरः प्राणमाता च विद्यादेहप्रमातृता !। 'शुद्धविद्या' से लेकर अनाश्रित शिवपर्यन्त 'शुद्धाध्वा' है । 'मन्त्र' 'मन्त्रेश्वर' 'मन्त्रमहेश्वर' 'शुद्धाध्वप्रमाता' हैं । शिव के दो रूप हैं 'अनाश्रित शिव' 'पञ्चकारण रूप शिव' (पञ्चकारण रूप शिवों में आश्रित न रहने (शिव । शक्ति । सदाशिव । ईश्वर या स्वशक्ति मात्र का आश्रय होने के शुद्धविद्या) (साश्रित) कारण 'अनाश्रित' कहलाते हैं ) उपर्युक्त समस्त प्रमाताओं एवं प्रमेयों में स्वरूपतः कोई भेद नहीं है । इन सभी पर प्रकाश डालने के बाद आठवीं कारिका का भाव सुस्पष्ट हो पायेगा । १. पतिप्रमाता—आचार्य उत्पलदेव 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञां (३.२.३) में कहते हैं— 'स्वांगरूपेषु भावेषु प्रमाता कथ्यते पतिः ।' अर्थात् प्रमाता जिस अवस्था में समस्त भावमण्डल को अपने शरीर का अभिन्न अंग जैसा मानता है—अर्थात् अहंविमर्शात्मक स्वभाव से अपने को अभिन्न मानता है । उसे ही 'पतिप्रमाता' कहते हैं । यही है 'पतिप्रमातृभाव' । इस प्रमाता का समस्त भाववर्ग पर स्वामित्व स्थापित रहने के कारण ही इसे 'पति' कहते हैं । 'पति' रक्षक को भी कहते हैं । यह भावमण्डल का सर्वोच्च रक्षक है अतः इसे 'पति' कहना उपयुक्त है । २. पशुप्रमाता—यह आत्मा जिस अवस्था में मायीय आवरण से आच्छादित रहने के कारण (विश्व के स्वांग होने पर भी) विश्व को अपना अंग नहीं प्रत्युत स्वातिरिक्त अन्य पदार्थ मानती है उसे ही 'पशुप्रमाता' कहते हैं—यही है पशु—'मायातो भेदिषु क्लेश कर्मादिकंलुषः पशुः ।।' (ई०प्र० ३.२.३) यह भाववर्ग का स्वामी नहीं उसका दास होता है । भावों के क्षोभ को ही बन्धन कहते हैं । 'पशु' इसी बन्धन का कैदी होता है और संसृति-चक्र में फँसकर अनन्त काल तक बन्धन में पड़ा रहता है ।
१३२ स्पन्दकारिका 'संसारी' (पशु रूप ग्राहक) और 'पतिप्रमाता' स्वरूपतः अभिन्न होने के कारण समतुल्य हैं। इन दोनों की 'इच्छाशक्ति' 'क्रियाशक्ति' एवं 'ज्ञानशक्ति' भी यत्किञ्चित् समतुल्य हैं। दोनों की क्रियाओं में अन्तर है तो केवल यह कि पति भूमिका पर 'इच्छा' 'क्रिया' एव 'ज्ञान' तीनों निरपेक्ष, नित्य, स्वतन्त्र, देशकालातीत, आत्मस्वरूप, सर्व- व्यापी, अमित अनादि, अनन्त, सर्वात्मक तथा सर्वानुस्यूत है। किन्तु पशुभूमिक मितात्मा की इच्छा, ज्ञान एवं क्रिया देशकालावच्छिन्न, अनित्य, अस्वतन्त्रात्मक, सादि-सान्त, मितानुस्यूत एवं व्यष्टिगत होता है। चिद्रूपता पर पड़े आवरण के परिमाण एवं मात्रा के अनुसार ही इच्छा, ज्ञान एवं क्रिया पर आवरण पड़ता है। किसी के ऊपर यह आवरण झीना होता है तो किसी के ऊपर अत्यन्त मोटा। इसी अनुपात में प्रत्येक मितात्मा की इच्छा-ज्ञान-क्रिया में शक्ति, सामर्थ्य, चेतना और स्वातन्त्र्य का निवास होता है। समस्त विश्व-वैचित्र्य और अनन्त भाव राशि शिव की असीम एवं अनन्त शक्तियों का विश्वात्मक प्रसार मात्र है, उसके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं— 'एष चानन्तशक्तित्वादेवमाभासयत्यमून । भावानिच्छावशादेषा क्रिया निर्मातृतास्य सा ॥'१ जगत् परमात्मा का संकल्पावभासन मात्र है। 'स्वातन्त्र्यशक्ति' की ही यह विशिष्ट क्षमता है कि वह तात्त्विक दृष्टि एवं स्वरूप की दृष्टि से एक (अद्वैत) होते हुए भी अनेकाकार ग्राह्यों को अवभासित करती है। यही है उसका क्रियास्वरूप स्वातन्त्र्य। यह शक्ति मितात्मा ग्राहकों (पशुओं = अणुओं = जीवों) में नहीं है। 'ग्राहक' 'ग्राह्य' एवं 'ग्रहण'—इन तीनों में एक ही सत्ता भासमान है। 'पतिप्रमाता' 'पशुप्रमाता' एवं समस्त ग्राह्य वर्ग (प्रमेय समूह) (जड़ पदार्थ) एक ही मूल सत्ता के रूपान्तर हैं। संवित्तत्त्व (१) विभु होने के कारण सर्वव्यापक (२) नित्य होने के कारण आदि- अन्त-शून्य (३) विश्वाकार होने के कारण—चेतन और जड़ तथा विश्व वैचित्र्य एवं अनन्त आकार-प्रकारों को अवभासित करता है— 'विभुत्वात्सर्वगो नित्यभावादाद्यन्तवर्जितः। विश्वकृतित्वाच्चिदचित्तद्वैचित्र्यावभासकः ॥ ततोऽस्य बहुरूपत्वम् ... ... ... ... ॥'२ विश्वसिसृक्षु परमात्मा प्रथमतः अपने से अपृथक् विश्व को अपने से भिन्न वस्तु के रूप में प्रकाशित करता है और इसे ही 'आदिसर्ग' कहा गया है—'विश्वनिर्माणेच्छुर्हि परमेश्वरः प्रथमं स्वाव्यति रिक्तमेव विश्वं प्रकाशयेत् । अयमेव हि आदिसर्गः ॥' अनन्त शक्तियों से संयुक्त शिव जगत् का बाह्यावभासन करते समय संकल्पोन्मुखता के काल में उसका अवभासन अभिन्न अहंविमर्श के रूप में ही करता है। 'स्वातन्त्र्यशक्ति' रूपान्तरित होकर 'मायाशक्ति' का रूप ग्रहण करती है और स्वरूप पर आवरण डालकर (आत्म- स्वरूप को आच्छादित करके) स्वात्मचैतन्य के मुकुर में अनन्त ग्राह्यग्राहकों को अव- भासित करती है— १. ईश्वरप्रत्यभिज्ञा (२.४.२)। २. तन्त्रालोक (१.६१-६२)।
प्रथमः निष्यन्दः १३३ ‘सोऽयमात्मानमावृत्य स्थितो जडपदं गतः । आवृतानावृतात्मा तु देवादिस्यावरान्तगः । जडानडस्याप्येतस्य द्वैरूप्यस्यास्ति चित्रता ॥’ (तं० १।१३४-५) ‘पतिप्रमाता’ ‘पशुप्रमाता’ एवं ‘जड़ प्रमेय’ तीनों अपने सभी रूपों में स्पन्दात्मक स्वभाव के ही स्वस्वरूप हैं । इनका स्वरूप निम्नानुसार है—
| १. | पतिप्रमाता | विशुद्ध, चिद्रूप, अनावृत | ज्ञातृत्व कर्तृत्व स्वातन्त्र्य शक्ति | विश्वात्मक निराकार | स्वांग रूप में विश्व का ग्रहण | भेदशून्य |
|---|---|---|---|---|---|---|
| २. | पशुप्रमाता | चिदचिद् अर्द्धावृत अर्द्धानावृत | संकुचित ज्ञान संकुचित क्रिया | देह, प्राण पुर्यष्टक शून्य | सर्व, रूपों से अभिन्नता | देवता मनुष्य पशु पक्षी |
| ३. | प्रमेय जड़वर्ग | अचित् पूर्णावृत चैतन्य वाला | ज्ञेय कार्य | जड़ पञ्चभूत | विमूढ़ता में स्थिति के कारण विसंज्ञ | समस्त स्थावर प्रकृति अनन्तभेद |
| क्षोभावसान से परमपद की प्राप्ति का प्रतिपादन— | ||||||
| निजाशुद्ध्यासामर्थ्यस्य कर्तव्येष्वभिलाषिणः । | ||||||
| यदा क्षोभः प्रलीयेत् तदा स्यात् परमं पदम् ॥ ९ ॥ | ||||||
| अपनी (अपने स्वातन्त्र्य से समुत्पादित) (मलात्मक) अशुद्धि से असमर्थ तथा | ||||||
| (वासनात्मक) कर्तव्यों की आकांक्षायें रखने वाले (मितप्रमाता) का ‘क्षोभ’ जब (स्व- | ||||||
| स्वरूप में) लयीभूत हो जाता है । तब उसको ‘परमपद’ प्राप्त होता है ॥ ९ ॥ | ||||||
| इस कारिका के प्रतिपाद्यविषय के बारे में स्पन्दप्रदीपिकाकार कहते हैं— | ||||||
| ‘अनेन सर्व स्वातन्त्र्यमुक्तस्य च तद्भवेत् । | ||||||
| अभिमानात्मकक्षोभक्षयेन त्वन्यमाह च ॥’ |
- सरोजिनी * ‘निजाशुद्धि’ = ‘निजा सहजा । अनादिर्याऽशुद्धिरविद्याऽविवेकमूला भोगाभिलाष- मलरूपतयाऽसमर्थस्य संकुचितशक्तेः ॥’ (स्पन्दप्रदीपिका) निजा = स्वात्मीया । अशुद्धि = ‘आणव मल’ । ‘मायीय मल’ । ‘कार्म मल’ । अशुद्धि = अशुद्धियाँ । आणव, मायीय एवं कार्म अशुद्धियाँ ।
१३४ | स्पन्दकारिका 'स्वस्वातन्त्र्योल्लासिता या इयं स्वरूपाविमर्शस्वभावा इच्छाशक्तिः संकुचिता सति अपूर्णामन्यतारूपा 'अशुद्धि'—तन्मलोत्थित कंचुकपञ्चकाविलत्वात् ।'¹ १. आणव मल—अपनी स्वातन्त्र्योल्लासित स्वरूपाविमर्शस्वभावा जो 'इच्छा शक्ति है जब वह संकुचित होकर अपूर्णामन्यतारूपा हो जाती है तब इसी मलपंकिल इच्छाशक्ति ही 'अशुद्धि' कहलाने लगती है । यह अशुद्धि तीन प्रकार की है—१. इच्छा- शक्ति की अशुद्धि, २. ज्ञानशक्ति की अशुद्धि, ३. क्रियाशक्ति की अशुद्धि । २. मायीय मल—ज्ञानशक्ति की अशुद्धिः 'मायीयमल'—जब ज्ञानशक्ति अपने सर्वज्ञत्व की अनन्त शक्ति को छोड़कर किंचिज्ज्ञत्व (स्वल्प ज्ञातृत्व) को ग्रहणकर लेती है तब उसके इस संकोच-ग्रहण को ज्ञानशक्ति की अशुद्धि या मायीय मल कहते हैं— ज्ञानशक्तिः क्रमेण भेद—सर्वज्ञत्व-किंचिज्ज्ञत्व अन्तःकरणबुद्धि इन्द्रियतापत्तिपूर्व अत्यन्तं संकोचग्रहणेन भिन्नवेद्यप्रथारूपं मायीयं मलम् अशुद्धिरेव ॥³ ३. कार्ममल—क्रियाशक्ति की अशुद्धि—'कार्ममल'—जब क्रियाशक्ति की सर्व कर्तृत्व की शक्ति किंचित्कर्तृत्व में रूपान्तरित हो जाती है तब कार्ममल स्वरूप यह क्रिया-शक्ति अशुद्धस्वरूप हो जाने के कारण अशुद्ध हो जाती है । इसे ही क्रियाशक्ति की अशुद्धि कहा जाता है—क्रियाशक्तिः क्रमेण भेदसर्वकर्तृत्वकिंचित्कर्तृत्वकर्मेन्द्रियरूप- संकोचग्रहण पूर्वं अत्यन्तं परिमिततां प्राप्ता शुभाशुभानुष्ठानमयं कार्ममलं अपि अशुद्धिः । निजाशुद्धिरूप जो 'मल' है कोई पृथग्भूत तत्त्व नहीं हैं 'निजाशुद्धि शब्देन 'मलं' नाम द्रव्यं पृथग्भूतं अस्ति इति ये प्रतिपन्नाः ते दूष्यत्वेन कटाक्षिताः ॥'⁴ मलों से रहित प्राणी ही मुक्त है—वही भैरव है— मानसं चेतना शक्तिरात्मा चेति चतुष्टम् । यदा प्रिये परिक्षीणं तदा तद्भैरवं वपुः ॥ (वि०भै०१३८) । क्षोभ = प्रकृति का क्षोभ । सीमित प्रमेयों के साथ अपनी एकात्मता या अभिन्नता । अशुद्धि जनित विकार । अशुद्धि = देह में अहंभाव । आचार्य क्षेमराज कहते हैं कि—परमेश्वर के स्वभाव का होने पर संसारी (शरीर- धारी) प्राणी या आत्मा अपनी पूर्णता के साथ क्यों नहीं दिव्यालोक से प्रकाशित होता ? वह क्यों आन्तर आत्मबल के स्पर्श की अपेक्षा रखता है?—इसी शंका का निवारण करने के लिए ग्रन्थकार ने निम्न श्लोक कहा— 'निजाशुद्ध्या समर्थस्य ............ परं पदम् ॥'⁵ अब तक आत्मा के पूर्ण स्वातन्त्र्य का निरूपण किया गया । यदि इसके अभि- मानात्मक क्षोभ का क्षय हो जाय तो कहना ही क्या ? अनादि अशुद्धि अविवेकमूला अविद्या भोगाभिलाषा मल से आत्मा की शक्ति को संकुचित एवं सामर्थ्यहीन बना देती है । फिर उसको अपनी भोगाभिलाषाओं को पूर्ण १-५. स्पन्दनिर्णय ।
प्रथमः निष्यन्दः १३५ करने हेतु अनेक कर्तव्य करने की इच्छा होने लगती है। यही अज्ञान है 'अनादिर्याऽ- शुद्धिरविद्याऽविवेकमूला भोगाभिलाषमलरूपतयाऽसमर्थस्य संकुचितशक्तेः ॥'१ श्रीसात्वत नामक ग्रन्थ में भी कहा गया है कि—अज्ञान, परिच्छिन्नता, सुख- दुःख—ये सर्वज्ञ आत्मतत्त्व में इसलिए आ जाते हैं क्योंकि वह कर्मचक्र का आलम्बन ले लेता है। इसे ही दूसरे शास्त्रों में गमनागमन, प्रकृति, अशुद्धि, कर्मवासना, माया, अविद्या, भ्रम, मोह, अज्ञान एवं मल आदि नामों से कहा गया है—२ 'अज्ञता व्यापकत्वं च सुखदुःखादिवेदनम् । सर्वज्ञस्यात्मतत्त्वस्य कर्मचक्रावलम्बनात् ।। गतीस्वेषा प्रकृत्याख्या शुद्धिः प्राक्कर्मवासना । मायाऽविद्या भ्रमो मोहोऽज्ञानं मलमिति क्वचित् ॥'३ गीता में भी कहा गया है कि—प्रकृति एवं पुरुष दोनों अनादि हैं। सारे विकार एवं सारे गुण प्रकृति से उत्पन्न हुए हैं— प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि । विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान् ।। 'अनादित्वे समानेऽस्या विशेषोऽयं विचारतः ॥'४ प्रकृति और पुरुष की अनादिता समान होने पर भी मायारूप प्रकृति का लय हो जाता है और आत्मसंवित् ज्यों की त्यों रहती है। 'संवित्प्रकाश' में कहा गया है कि—माया का मायापन यही है कि तत्त्वसाक्षा- त्कार होते ही मिट जाती है। रज्जु का, ज्ञान होने पर, सर्प, माला आदि मानने का प्रश्न ही कहाँ ?' और भी कहा गया है—'तुम्हारे अतिरिक्त जो कोई अन्य वस्तु है' इस प्रकार प्रतीत होता है कि वह विचार करने पर गंधर्व नगर के समान विलीन हो जाती है । केवल तुम्हीं शेष रहते हो । इसलिए तुम्हारा नाम शेष है ।'५ मायात्वमेतदेव स्यान्नाशस्तत्त्वप्रदर्शनात् । नहि विज्ञातरज्ज्वात्मा सर्पादीन्मन्यते पुनः ॥ त्वत्तो द्वितीयमिहवस्तु यदस्ति किञ्च, तत्तद्विचार पदवीमवतारितं चेत् । गंधर्वपत्तनमिवोपलयं प्रयाति, त्वं शिष्यसे ध्रुवमतस्तव शेषसंज्ञा ॥६ विद्याधिपति का कहना है कि—समाधि का स्वभाव है—विषय का भोग । जब युक्तिपूर्वक समाधि लगाने से वह विषय प्रकाश को खा जाती है तब आपकी पदवी हो जाती है। सर्वभोक्ता और केवल आप ही अभुक्त रह जाते हैं। भक्षणप्रकृतिना समाधिना युक्तितो विषयधाम्नि भक्षिते । सर्वभक्षपदवीमुपेयुषः शिष्यते परमभक्षितो भवान् ॥ १-६. उत्पलदेवाचार्य—स्पन्दप्रदीपिका ।
१३६ स्पन्दकारिका वह जादूगर के जादू के समान या ऐन्द्रजालिक की माया के समान अपने बाधक में ही रहती है। अर्थात् माया मायावी की बुद्धि में कोई भ्रम उत्पन्न नहीं करती—अपने आश्रय को दुःख नहीं देती। सा चेन्द्रजालिनो मायेवाऽऽस्थिता बाधकात्मनि ॥ यथाऽग्निर्धूमलेखेव मलवद्दर्पणस्य वा। बुद्बुदाः सलिलस्येव तच्छान्तौ निर्विकारिता ॥ जैसे अग्नि से धूम्र, जैसे दर्पण पर मल, जैसे पानी में बुलबुले—ऐसा ही उसका स्वरूप है—फिर निर्विकार ही निर्विकार है— 'बुद्बुदाः सलिलस्येव तच्छान्तौ निर्विकारिता ॥' १ क्षोभ है क्या? क्षोभ है अशुद्धिजन्य विकार। उसका केवल एक ही रूप है—देह में अहंभाव। विवेक से आत्मबल का स्पर्श होने पर वह नष्ट हो जाता है। तब परम पद की प्राप्ति अर्थात् अपने स्वरूप में स्थिति होती है। २ षड्धातुसमीक्षा में कहा गया है—मोहमूलक कर्म संसार के कारण होते हैं। मोह का मिट जाना और कर्म का मिट जाना एक ही बात है। वही सच्ची शान्ति एवं स्वस्थता है—३ 'कर्माणि मोहमूलानि संसृतेः कारणं यतः। तत्क्षयात् कर्मनिर्मुक्तः स्वस्थः शान्ततमस्ततः ॥' नारदसंग्रह में कहा गया है कि—जैसे भुना हुआ बीज अंकुरित नहीं होता वैसे ही विकल्परहित चित्त पुनर्जन्म से मुक्त हो जाता है। यह क्षोभक्षय अभ्यास से धीरे-धीरे होता है—४ 'यथा सुभर्जितं बीजं नेह भूयः प्ररोहति। विकल्पक्षीणचित्तस्य तथा भूयो न संसृतिः ॥' स्वात्मसंबोध में कहा गया है—जैसे किसी पात्र से अग्नि हटा दी जाए तो भी वह धीरे-धीरे ठण्डा हो जाता है वैसे ही अज्ञान पंक के धुल जाने पर यथा समय कैवल्य की प्राप्ति होती है— 'यथाग्निपोत्रं ज्वलनोद्धृतं सच्छैत्यं प्रयायाच्छनकैर्न सद्यः। अज्ञानपंकेऽभिन्नोऽपि तथा निरस्ते कालेन कैवल्यमुपैति देही ॥' ५ षाड्गुण्यविवेक में भी कहा गया है कि—'बोध विचित्र पदार्थों के निर्माण हेतु किसी दूसरे सहकारी कारण की अपेक्षा नहीं रखता। वह स्वयं संकल्प से ही सहस्रों रूपों की सृष्टि कर लेता है। 'अविद्याकृतसंकोचगृहीताहंयुतास्य या। तयाऽभिन्नोऽपि भिन्नोऽयं तत्त्वतः स्वप्नभीतवत्। अभीत एव यः स्वप्ने विभ्यदभ्येति संभ्रमम्। १-५. उत्पलदेवाचार्य—स्पन्दप्रदीपिका।
प्रथमः निष्यन्दः १३७ तस्य स्वप्नादभिन्नस्य को भेदः पारमार्थिकः ॥ तथाहि मिथ्यैव भयं ममेति यदि बुद्ध्यते । स्वप्नतत्त्वं परामृश्य भीतिभिर्नैर्न बाध्यते ॥ एवं तन्मय एवाऽहमिति भावनया त्वयि । प्रलीनाहंकृतिग्रंथिः पश्यत्येव त्वदात्मताम् ॥'१ आत्मा और परमात्मा में केवल इतना ही भेद बतलाया गया है कि अविद्या के कारण अहम्भाव का संकोच होने से यह आत्मसंवित् परमात्मा से अभिन्न होने पर भी भिन्न रूप में भासित है । यथा कोई स्वप्नावस्था में कोई डर जाय । वस्तुतः स्वप्नद्रष्टा निर्भय है किन्तु वह भय के कारण व्याकुल हो जाता है । क्या स्वप्नद्रष्टा और स्वप्न-दृश्य में कोई पारमार्थिक भेद है? जब किसी वस्तु को 'मेरी' मान लिया जाता है तब मिथ्या भय का उदय होता है । 'यह पदार्थ स्वप्नवत् है'—यह समझते ही भय भाग जाता है । इसी प्रकार 'मैं परमात्मरूप ही हूँ'—इस भावना से जिसकी अहंकार-ग्रंथि नष्ट हो जाती है, वह अपने को परमात्मस्वरूप ही देखता है ॥'२ संवित्प्रकाश में कहा गया है कि—यह समस्त कर्म तुम्हीं करते हो और तुम्हीं हो । अहंकार नहीं है तो केवल तुम्हीं शेष हो । अहंभाव ही आत्मा का परमात्मा से भेद कराने वाला तत्त्व है । वह भावना के अभ्यास से नष्ट हो जाय तो एकता ही एकता ही है—३ 'कर्मेदं त्वत्कृतमपि तन्मयं येन माधव । विहीनाऽहंकृति ततस्त्वमेव परिशिष्यते । एतावतैव भेदोऽय यदहम्मानिताऽऽत्मनि । सा चेद्विलीना त्वद्भक्त्या नष्टो भेदः स्थितैकता ॥'४ निश्चय ही पुरुष अपनी इन्द्रियों को अपने व्यापारों में संलग्न करने हेतु उन्हें स्वव्यापार में प्रवर्तित करने के लिए ईश्वर भूमिका प्राप्त करने के कारण उसी प्रकार 'स्वातन्त्र्य' प्राप्त कर लेता है । अतः ईश्वर एवं पुरुष दोनों में अभिन्नता का प्रतिपादन किया गया है । फिर ईश्वर से साम्य रखने वाले पुरुष की ईश्वर से भिन्नता उसका भेद- निबन्धन कैसे प्रतिपादित किया गया ? ग्रन्थकार का कथन है कि यह सत्य है कि उस अवस्था में दोनों में अभिन्नता विद्यमान है किन्तु यह पुरुष अपनी सहज देहादि में आत्मप्रतिपत्ति (आत्मा से अभिन्नता का स्वीकरण) मूलक रागादिक अशुद्धियों (मलों) के कारण क्षणिक सुख लव का 'अभिलाषी' (इच्छुक) बनकर उसके द्वारा, उन क्षणिक सुखों को पाने हेतु विषयावाप्ति हेतु 'कर्तव्यों' (क्रियाओं) के निष्पादन में 'असमर्थ' (अशक्त) होकर यह शक्तिदरिद्री (पुरुष) सुखादिक की इच्छा होने के बाद भी अपने अभीष्ट को प्राप्त नहीं कर पाता । इस प्रकार के इस पुरुष का जब (जिस समय) 'क्षोभ' (प्रतिनियत शरीरादिक आलम्बनों में अहं प्रत्ययात्मक मायीय उपप्लव) विगलित (विनष्ट, विलीन, प्रलयीभूत) हो जाता है १-४. उत्पलदेवाचार्य—स्पन्दप्रदीपिका ।
१३८ स्पन्दकारिका अर्थात् जब कृत्रिम आलम्बनों से मुक्त होकर स्वाभाविक अहं प्रत्यय के सूर्यालोक से क्षोभ रूपी प्रालेयपटल (हिमसंतति) विगलित हो जाती है—तब निरुत्तर ('परम') स्थान सद्भाव के द्वारा प्रकाशित हो उठता है । तात्पर्य यह है कि आत्मा एवं पुरुष में तथा पर एवं अपर संवित् तत्त्वों में अभेदावस्था अधिकाधिक संवर्द्धित होती रहे । भाव यह कि स्वस्वभाव में प्रतिष्ठान हो और अभेदापत्ति हो— 'अभेदः ... ... ... ... ... स्वस्वभावे प्रतिष्ठानम्' ।— अशुद्धिः = भिन्नभिन्न दर्शनों में पुरुष की भिन्न-भिन्न अशुद्धियों का उल्लेख किया गया है । इस प्रकरण में तो अचित्स्वरूप, अनित्य एवं परतन्त्र देहादिक आत्मेतर पदार्थों में जो भ्रमात्मक अहंप्रत्यय प्रवर्तित होता है अतः उनके विगलित होने पर स्वस्वभावाभि- व्यक्तिलक्षणा परा शुद्धि प्राप्त हो जाती है । कहा भी गया है— 'जाते देहप्रत्ययद्वीपभंगे, प्राप्तैकध्ये निर्मले बोधसिन्धौ । अव्यावर्त्येन्द्रियग्राममत्त, विश्वात्मा त्वं नित्यमेकोऽभासि ॥' यह भी कहा गया है— 'नात्माधीनत्वेऽपि विश्वं नियोक्तुं, सर्वो हस्तादीनिवेष्टे यथेष्टम् । बालो राजेवात्मशक्त्यप्रबोधात्, त्वय्यन्तःस्थे सर्वशक्तिस्तु सर्वः ॥'१ 'यदोक्षोभः प्रलीयेत्'—जब देहादिक अहं प्रत्यय रूप क्षोभ लीन हो जाता है तब आत्मा परमपद में प्रतिष्ठित हो जाती है ।' 'अशुद्धि' = देहाद्यात्मप्रतिपत्तिमूलरागादिरूपा' (रामकण्ठ) । अशुद्धि = मल । 'क्षोभ' = प्रतिनियत शरीराद्यालंबनाहंप्रत्ययात्मा मायीय उप- प्लव' (रामकण्ठाचार्य) ॥ परमपद = निरुत्तर स्थान (रामकण्ठ) इस श्लोक में स्वस्वभाव में प्रतिष्ठा का ही प्रतिपादन किया गया है—'स्वस्वभावे प्रतिष्ठानम् इति अनेन श्लोकेन प्रतिपादितम् ॥ (रामकण्ठ) ॥ 'अशुद्धि' = अचित्स्वरूपों में अनित्य वस्तुओं में (देहादि में) अहं प्रत्यय (राम- कण्ठ) । क्षोभ की शान्ति से स्पन्दोपलब्धि का प्रतिपादन—आठवें स्पन्दसूत्र में कहा गया था कि—'अपि त्वात्मबलस्पर्शात् पुरुषस्तत्समो भवेत्' यदि पशु एवं पशुपति में, १. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दकारिकाविवृति' ।
प्रथमः निष्यन्दः १३९ अणु और शिव में कोई भेद नहीं है तो यह अणु शिव ही क्यों नही बन जाता उसके समान ('पुरुषस्तत्समो भवेत्') क्यों बनता है? पतिप्रमाता एवं पशुप्रमाता में तात्त्विक भेद तो नहीं है किन्तु फिर दोनों में भेदाभास होता क्यों है ? क्षोभ और अशुद्धि—सूत्रकार इसका उत्तर देते हुए कहते हैं कि अपने 'स्वातन्त्र्य' से उत्पादित सहज अशुद्धि (मल) के द्वारा असमर्थ बने हुए एवं संसार की वासनात्मक अभिलाषाओं में फँसे हुए मितप्रमाता (पशुप्रमाता) का 'क्षोभ' जब स्वस्वरूप में ही लयीभूत हो जाए तब उसे 'परमपद' की प्राप्ति होती है। भट्टकल्लट का कथन है— १. मितप्रमाता को आत्मबल का पूर्ण स्पर्श होने ही नहीं पाता क्योंकि वह वासना- त्मक अभिलाषाओं के चक्रव्यूह में फँसा रहता है। ऐसा क्यों होता है? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि स्वभाव से उत्पन्न अशुद्धि (मल) द्वारा प्रमाता ओत-प्रोत रहता है। २. देहादिक अनात्म पदार्थों में 'अहं'—इत्याकारक अभिमान, से जात विकल्प परम्परा ही 'क्षोभ' है। यही 'क्षोभ' मालिन्य, मल, अज्ञान एवं अशुद्धि है। इस क्षोभ के स्वस्वरूप में लय हो जाने पर तब प्रमाता को 'परमपद' की प्राप्ति हो जाती है। ३. 'परमपद' का प्रतिबन्धक कौन है? 'क्षोभ' ही प्रतिबन्धक है। विद्वानों ने स्पन्द सूत्र में प्रयुक्त 'अशुद्धि' 'कर्तव्याभिलाषा' 'क्षोभ' इन तीनों का अर्थ लिया है—'आणव मल' 'कार्य मल' एवं 'मायीय मल'। 'अशुद्धि' = आणव मल। 'कर्तव्य' = कार्ममल 'क्षोभ' = मायीय मल। अशुद्धि क्या है? 'देहाद्यात्मप्रतिपत्तिमूलरागादि रूप मल'—रामकण्ठाचार्य क्षोभ क्या है? 'प्रतिनियत शरीराद्यालम्बनाहंप्रत्ययात्मा मायीय उपप्लवः।' —रामकण्ठाचार्य। अशुद्धि किसे कहते हैं? 'अनादिर्याऽशुद्धिरविद्याऽविवेकमूला भोगाभिलाषमलंरूप' —उत्पलदेव। क्षोभ किसे कहते हैं? 'क्षोभो विकारोऽशुद्धिजनितो देहाहम्प्रत्ययरूपो।' —उत्पलदेवाचार्य। 'अभिमानात्मकक्षोभ'—उत्पलदेवाचार्य। इसी क्षोभ के निलीन हो जाने पर 'परमपद' की प्राप्ति होती है। यह 'परमपद' क्या है? रामकण्ठाचार्य कहते हैं—'प्रलीन देहाद्यहंप्रत्ययलक्षणक्षोभो निवातनिश्छल जलधिवत सुप्रशान्त स्थितिः आत्मैव परमपद शब्द प्रतिपादितः।।'—रामकण्ठाचार्य॥ 'परमपद' = 'निरुत्तर स्थान'—रामकण्ठाचार्य। भट्टकल्लट इस स्पन्दसूत्र की व्याख्या करते हुए कहते हैं— 'स चास्य आत्मबलस्पर्शः सहजया अशुद्ध्या व्याप्तस्य कार्यमिच्छतोऽपि न भवति, किन्तु यदा क्षोभः 'अहमिति' प्रत्ययभावरूपोऽस्य प्रलीयेत्, तदास्य भवति परमे पदे प्रतिष्ठानम्।'
१४० स्पन्दकारिका अन्तरात्मा की रंगभूमि पर विश्वाभिनय—पतिभूमिका में प्रतिष्ठित विश्वात्मा एवं पशुभूमिका में प्रतिष्ठित जीवात्मा (पशुपति एवं पशु) एक ही सत्ता के दो रूप हैं—१. पूर्ण स्वतन्त्र २. संकुचित स्वातन्त्र्योपहित ये ही इसके दो रूप हैं । 'रंगोऽन्तरात्मा' एवं 'नर्तक आत्मा' कहकर शिवसूत्रकार ने पशुपति को विश्व रूपी महानाट्य का अभिनेता कहा है । परप्रमाता की नाट्यलीला ही विश्व एवं उसकी सृष्टि है । विश्वरूप महानाट्य का अभिनय करने के लिए यह नाटककार अपनी 'शिव' निर्बंध 'स्वातन्त्र्य शक्ति' को 'माया शक्ति' का स्वरूप प्रदान करके, पूर्ण स्वतन्त्र होते हुए भी स्वात्मविस्मृति रूप अख्याति को धारण करने में 'मितस्वतन्त्र' पशु बनकर, अपनी चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान, क्रिया की महती शक्तियों को पञ्चकञ्चुकों में रूपान्तरित करके, असीमता, सर्वज्ञता, सर्वव्यापकता, सर्वकर्तृत्ता आदि को स्वेच्छया भुलाकर, ससीम, अल्पज्ञ आदि बनकर, सर्वशक्तिमान से 'शक्तिदरिद्री' बनकर, पशुपति से पशु बनकर आरोहण भूमिका से अवरोहण भूमिका में पदार्पण करके स्वात्मभित्ति के दर्पणस्वरूप रंगमंच पर विश्वमयता के अवभासन के रूप में विश्वनाट्य का मुकुरनगरवत् अभिनय करता है । अभिनेता शिव का विश्वाभिनय—शिव की 'आनन्दशक्ति' के द्वारा ही विश्वो- ल्लासन होता है अतः विश्व अनन्त आनन्दामृत का उच्छलन है । वही शिव अभेदव्याप्ति को छिपाकर भेद व्याप्ति ग्रहण कर लेता है, शिव होकर भी, विश्वनाट्य के रंगमंच पर, जीव बन जाता है । मुक्त होकर भी वह बद्ध बन जाता है । यह 'अशुद्धि' 'क्षोभ' 'अख्याति' 'स्वरूपगोपन' 'आत्मविस्मृति' अवभास अवरोहण' आदि नाटककार एवं नट परमशिव का एक स्वेच्छाभिनीत अभिनय है । शिव से धरणी पर्यन्त वही विश्वोत्तीर्ण एवं विश्वात्मक शिव ग्राह्य, ग्राहक आदि अनेक आकारों में अवभासित होकर स्फुरित है उसके अतिरिक्त अन्य कोई है ही नहीं— 'भगवान्विश्वशरीरः' 'श्री परमशिवः स्वात्मैक्येन स्थितं विश्वं' 'श्रीमत्परमशिवस्य पुनः विश्वोत्तीर्ण-विश्वात्मक परमानन्दमय प्रकाशैकघनस्य एवंविधमेव शिवादि धरण्यन्तं अखिलं अभेदेनैव स्फुरति, न तु वस्तुतः अन्यत् किञ्चित् ग्राह्यं ग्राहकं वा, अपितु श्री परमशिवभट्टारक एव इत्थं नानावैचित्र्यसहस्रैः स्फुरति ।।' (प्र०ह०सू० ३) ॥ वही शिव भी है और वही पशु भी है । जब चिदात्मा परमेश्वर अपनी स्वेच्छा से अपनी 'स्वातन्त्र्य शक्ति' द्वारा अपनी अभेद व्याप्ति को निमज्जित करके और भेद व्याप्ति को ग्रहण करके और अपनी अनन्त व्यापक शक्तियों को संकुचित करके पशुभूमिका पर अभिनय करने लगता है तो वही मलावृत्त संसारी कहलाने लगता है— 'चिद्वत्तच्छक्तिसंकोचात् मलावृत्तः संसारी ।' (प्र०ह० ९) आचार्य क्षेमराज इसी तथ्य को अपने शब्दों में इस प्रकार कहते हैं— 'यदा चिदात्मा परमेश्वरः स्वस्वातन्त्र्यात् अभेद व्याप्तिं निमज्जय भेदव्याप्तिम् अव- लम्बते तदा तदीया इच्छादिशक्तयः असंकुचित अपि संकोचवत्यो भान्ति, तदानीमेव च अयं मलावृत्तः संसारी भवति ।' इसके परिणामस्वरूप— क) इच्छाशक्ति—(संकुचित होकर) अपूर्णम्मन्यता रूप 'आणवमल'
ख) ज्ञानशक्ति—(संकुचित होकर) सर्वज्ञत्व से अल्पज्ञत्व रूप, एवं सङ्कोच-ग्रहण से संकुचित बनकर 'मायीयमल' बन जाती है । ग) क्रियाशक्ति—(संकुचित होकर) अल्पकर्तृत्व बनकर 'कार्ममल' बन जाती है। इस प्रकार— सर्वकर्तृत्व, सर्वज्ञत्व, पूर्णत्व, नित्यत्व, व्यापकत्व शक्तियाँ संकुचित होकर 'कला' 'विद्या' 'राग' 'काल' एवं 'नियति' बन जाती है। श्री सर्वस्वतन्त्र आत्मा शिव संसारी (पशु) बन जाता है। 'शक्तिदरिद्रः संसारी उच्यते, स्वशक्तिविकासे तु शिव एव ।।' ('प्रत्य- भिज्ञाहृदयम्' सूत्र ९ क्षेमराज) 'अशुद्धि'—'निजाशुद्ध्यासामर्थ्यस्य' में अशुद्धि क्या है और शिव की सामर्थ्य (स्वातन्त्र्य शक्ति) क्या है ? स्वातन्त्र्यवाद—'स्वातन्त्र्यवाद' एवं 'आभासवाद' प्रत्यभिज्ञा की सृष्टि-दृष्टि की व्याख्या के दो सिद्धान्त हैं। परप्रमाता की दृष्टि से तो 'स्वातन्त्र्यवाद' एवं 'प्रमेय' की दृष्टि से 'आभासवाद' चरितार्थ है—ज्यादा संगत है—अधिक उपपन्न है। 'स्वातन्त्र्य' शिव की वह पराशक्ति है जो कि उससे अभिन्न है और जिसका अपर पर्याय 'आनन्द' है। अति दुर्घटकारित्व इसी स्वातन्त्र्य की विशेषता है। यह शिव का ऐश्वर्य है जो कि स्वातन्त्र्य से अपृथक् है। परमात्मा की इच्छा का निर्बाध, अप्रतिहत, निर्बंध, एवं अविराम प्रसार उसका 'स्वातन्त्र्य' है। 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी' (१।१) में कहा गया है—'स्वातन्त्र्यं च नाम यथेच्छं तत्रेच्छा प्रसरस्य अविघातः ।' यही स्वातन्त्र्य अति दुर्घटकारित्व का चमत्कार है—'एतदेव स्वातन्त्र्यं यदतिदुर्धट- कारित्वम् ।' स्वातन्त्र्य—परमात्मा के नित्योदित 'परावाक्' को उसका 'स्वातन्त्र्य' एवं 'ऐश्वर्य' कहा गया है। यही विमर्शात्मा चिति भी है। शब्दतत्त्व (परावाक्) सृष्टि के प्रसार की आदि कोटि एवं सृष्टि-सङ्कोच की चरम कोटि है। शिव ही प्रकाशात्मा चिति हैं। दोनों अविनाभूत हैं। अविभक्त (अन्तर्लीन) विमर्शात्मक शिव 'परमशिव' कहलाते हैं और यह उनकी निष्कल अवस्था है। 'चिद्रूपाह्लादपरमो निर्विभागः परस्तदा' ('शिवदृष्टि') प्रकाशविमर्शात्मक संवि- त्स्वरूप भगवान् परमशिव अपनी इसी 'स्वातन्त्र्य शक्ति' से रुद्रादिक प्रमाता एवं नीलसुखादिक प्रमेयों के रूप में प्रकाशित होते हैं। यद्यपि शिव का यह अवभासन अनतिरिक्त है तथापि अतिरिक्तवत् आभासित होता है। इस अवस्था में शिवस्वरूप आच्छादित नहीं होता। यही है संवित्स्वरूप शिव के स्वातन्त्र्य की महत्ता। 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृतिविमर्शिनी' में कहा गया है—'तस्मादनपह्नवनीयः प्रकाश- विमर्शात्मा संवित्स्वभावः परमशिवो भगवान् स्वातन्त्र्यादेव रुद्रादिस्थावरान्तप्रमातृरूपतया नीलसुखादिप्रमेयरूपतया च अनतिरिक्तायापि अतिरिक्तयेव स्वरूपानाच्छादिकया संवि- त्स्वरूप नान्तरीयक स्वातन्त्र्य महिम्ना प्रकाशते इत्ययं 'स्वातन्त्र्यवादः' प्रोन्मीलितः ॥'