स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३६ स्पन्दकारिका वह जादूगर के जादू के समान या ऐन्द्रजालिक की माया के समान अपने बाधक में ही रहती है। अर्थात् माया मायावी की बुद्धि में कोई भ्रम उत्पन्न नहीं करती—अपने आश्रय को दुःख नहीं देती। सा चेन्द्रजालिनो मायेवाऽऽस्थिता बाधकात्मनि ॥ यथाऽग्निर्धूमलेखेव मलवद्दर्पणस्य वा। बुद्बुदाः सलिलस्येव तच्छान्तौ निर्विकारिता ॥ जैसे अग्नि से धूम्र, जैसे दर्पण पर मल, जैसे पानी में बुलबुले—ऐसा ही उसका स्वरूप है—फिर निर्विकार ही निर्विकार है— 'बुद्बुदाः सलिलस्येव तच्छान्तौ निर्विकारिता ॥' १ क्षोभ है क्या? क्षोभ है अशुद्धिजन्य विकार। उसका केवल एक ही रूप है—देह में अहंभाव। विवेक से आत्मबल का स्पर्श होने पर वह नष्ट हो जाता है। तब परम पद की प्राप्ति अर्थात् अपने स्वरूप में स्थिति होती है। २ षड्धातुसमीक्षा में कहा गया है—मोहमूलक कर्म संसार के कारण होते हैं। मोह का मिट जाना और कर्म का मिट जाना एक ही बात है। वही सच्ची शान्ति एवं स्वस्थता है—३ 'कर्माणि मोहमूलानि संसृतेः कारणं यतः। तत्क्षयात् कर्मनिर्मुक्तः स्वस्थः शान्ततमस्ततः ॥' नारदसंग्रह में कहा गया है कि—जैसे भुना हुआ बीज अंकुरित नहीं होता वैसे ही विकल्परहित चित्त पुनर्जन्म से मुक्त हो जाता है। यह क्षोभक्षय अभ्यास से धीरे-धीरे होता है—४ 'यथा सुभर्जितं बीजं नेह भूयः प्ररोहति। विकल्पक्षीणचित्तस्य तथा भूयो न संसृतिः ॥' स्वात्मसंबोध में कहा गया है—जैसे किसी पात्र से अग्नि हटा दी जाए तो भी वह धीरे-धीरे ठण्डा हो जाता है वैसे ही अज्ञान पंक के धुल जाने पर यथा समय कैवल्य की प्राप्ति होती है— 'यथाग्निपोत्रं ज्वलनोद्धृतं सच्छैत्यं प्रयायाच्छनकैर्न सद्यः। अज्ञानपंकेऽभिन्नोऽपि तथा निरस्ते कालेन कैवल्यमुपैति देही ॥' ५ षाड्गुण्यविवेक में भी कहा गया है कि—'बोध विचित्र पदार्थों के निर्माण हेतु किसी दूसरे सहकारी कारण की अपेक्षा नहीं रखता। वह स्वयं संकल्प से ही सहस्रों रूपों की सृष्टि कर लेता है। 'अविद्याकृतसंकोचगृहीताहंयुतास्य या। तयाऽभिन्नोऽपि भिन्नोऽयं तत्त्वतः स्वप्नभीतवत्। अभीत एव यः स्वप्ने विभ्यदभ्येति संभ्रमम्। १-५. उत्पलदेवाचार्य—स्पन्दप्रदीपिका।