स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः निष्यन्दः १३७ तस्य स्वप्नादभिन्नस्य को भेदः पारमार्थिकः ॥ तथाहि मिथ्यैव भयं ममेति यदि बुद्ध्यते । स्वप्नतत्त्वं परामृश्य भीतिभिर्नैर्न बाध्यते ॥ एवं तन्मय एवाऽहमिति भावनया त्वयि । प्रलीनाहंकृतिग्रंथिः पश्यत्येव त्वदात्मताम् ॥'१ आत्मा और परमात्मा में केवल इतना ही भेद बतलाया गया है कि अविद्या के कारण अहम्भाव का संकोच होने से यह आत्मसंवित् परमात्मा से अभिन्न होने पर भी भिन्न रूप में भासित है । यथा कोई स्वप्नावस्था में कोई डर जाय । वस्तुतः स्वप्नद्रष्टा निर्भय है किन्तु वह भय के कारण व्याकुल हो जाता है । क्या स्वप्नद्रष्टा और स्वप्न-दृश्य में कोई पारमार्थिक भेद है? जब किसी वस्तु को 'मेरी' मान लिया जाता है तब मिथ्या भय का उदय होता है । 'यह पदार्थ स्वप्नवत् है'—यह समझते ही भय भाग जाता है । इसी प्रकार 'मैं परमात्मरूप ही हूँ'—इस भावना से जिसकी अहंकार-ग्रंथि नष्ट हो जाती है, वह अपने को परमात्मस्वरूप ही देखता है ॥'२ संवित्प्रकाश में कहा गया है कि—यह समस्त कर्म तुम्हीं करते हो और तुम्हीं हो । अहंकार नहीं है तो केवल तुम्हीं शेष हो । अहंभाव ही आत्मा का परमात्मा से भेद कराने वाला तत्त्व है । वह भावना के अभ्यास से नष्ट हो जाय तो एकता ही एकता ही है—३ 'कर्मेदं त्वत्कृतमपि तन्मयं येन माधव । विहीनाऽहंकृति ततस्त्वमेव परिशिष्यते । एतावतैव भेदोऽय यदहम्मानिताऽऽत्मनि । सा चेद्विलीना त्वद्भक्त्या नष्टो भेदः स्थितैकता ॥'४ निश्चय ही पुरुष अपनी इन्द्रियों को अपने व्यापारों में संलग्न करने हेतु उन्हें स्वव्यापार में प्रवर्तित करने के लिए ईश्वर भूमिका प्राप्त करने के कारण उसी प्रकार 'स्वातन्त्र्य' प्राप्त कर लेता है । अतः ईश्वर एवं पुरुष दोनों में अभिन्नता का प्रतिपादन किया गया है । फिर ईश्वर से साम्य रखने वाले पुरुष की ईश्वर से भिन्नता उसका भेद- निबन्धन कैसे प्रतिपादित किया गया ? ग्रन्थकार का कथन है कि यह सत्य है कि उस अवस्था में दोनों में अभिन्नता विद्यमान है किन्तु यह पुरुष अपनी सहज देहादि में आत्मप्रतिपत्ति (आत्मा से अभिन्नता का स्वीकरण) मूलक रागादिक अशुद्धियों (मलों) के कारण क्षणिक सुख लव का 'अभिलाषी' (इच्छुक) बनकर उसके द्वारा, उन क्षणिक सुखों को पाने हेतु विषयावाप्ति हेतु 'कर्तव्यों' (क्रियाओं) के निष्पादन में 'असमर्थ' (अशक्त) होकर यह शक्तिदरिद्री (पुरुष) सुखादिक की इच्छा होने के बाद भी अपने अभीष्ट को प्राप्त नहीं कर पाता । इस प्रकार के इस पुरुष का जब (जिस समय) 'क्षोभ' (प्रतिनियत शरीरादिक आलम्बनों में अहं प्रत्ययात्मक मायीय उपप्लव) विगलित (विनष्ट, विलीन, प्रलयीभूत) हो जाता है १-४. उत्पलदेवाचार्य—स्पन्दप्रदीपिका ।