भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 222

प्रथमः निष्यन्दः १२१ ङ) अभेदप्रथात्मक पारमार्थिक रूप से जिसका आच्छादित हो चुका है एवं भेदालोचन आदि जिसमें प्रधान है ऐसी बाह्य करणों की देवीस्वरूपा 'दिक्‌चरीचक्र' के रूप में भी वही शक्ति उदित होती है । च) सर्वात्मरूप को छिपाकर, भेदाभासस्वभाव' प्रमेयरूप— 'भूचरीचक्र' के रूप में पशुहृदयों को मूढ़ बनाती हुई भी वही शोभित होती है । छ) वही पतिभूमिका मे सर्वकर्तृत्वदिशक्तिरूप 'चिद्गगनचरी', अभेदनिश्चयादि रूप 'गोचरी', अभेदालोचनाद्यात्मिका 'दिक्‌चरी' और निजांगस्वरूप अद्वैत प्रथासारभूत प्रमेया- त्मक 'भूचरी' के रूप में पति-हृदय को विकसित करती हुई भी वही स्फुरित होती है । वही अज्ञातस्वरूपा रहने पर बन्धनप्रदा एवं ज्ञात होने पर मुक्तिप्रदा है— 'पूर्णावच्छिन्नमात्रबर्हिष्करणभावगाः । वामेशाद्याः परिज्ञानाज्ञानात् स्युर्मुक्तिबन्धदाः ।।' (भट्टदामोदर) निज शक्तियों से जनित व्यामोहितता—ही संसारित्व है—एवं च निजशक्तिव्यामोहिततैव संसारित्वम्' जब यह शक्ति स्व शक्तिव्यामोहित नहीं होती तब तो शरीरी परमेश्वर परमेश्वर ही है अन्यथा पशु है— 'एवं संकुचितशक्तिः प्राणादिमानपि यदा स्वशक्तिव्यामोहितो न भवति तदा अयम् ... शरीरी परमेश्वरः । 'मनुष्यदेहमास्थाय छन्नास्ते परमेश्वराः ॥' 'शरीरमेव घटाद्यपि वा ये षट्त्रिंशत्तत्त्वमयं शिवरूपतां पश्यन्ति तेऽपि सिध्यन्ति ।' (जो लोग ३६ तत्त्वमय शरीर को या घटादि को भी शिवस्वरूप देखते हैं वे भी सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं ।') (प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' सूत्रः १३) ॥ १. 'खेचरी'— 'खे बोधगगने चरतीति' (प्र०ह०सू०१२) । जो ज्ञान के अनन्ता- न्तरिक्ष में विचरण करती है वही है 'खेचरी' । इन समस्त शक्तियों का अपने मूल रूप में जो स्वरूप होता है उसे 'चिद्गगनचरी' (चिदाकाश में सदा विचरण करने वाली शक्ति) कहते हैं । जब परमात्मा सर्वकर्तृत्वदिक पाँच शक्तियों को सीमित करके उन्हें 'कला' 'विद्या' 'राग' 'काल' 'नियति' (पञ्च कंचुकों में संकुचित) रूप में प्रस्तुत करता है और यह असंकुचित शक्तियाँ किंचित्कर्तृत्व, किंचित् ज्ञातृत्व आदि अवस्थाओं को धारण करके पशुभूमिका में अवतरित होती हैं तब इन्हीं शक्तियों की समष्टि को 'खेचरी' कहते हैं । इस स्थिति में पशुओं का ज्ञान क्षेत्र संकुचित करके यह खेचरी अपने 'चिद्गगनचरी' स्वरूप को छिपाकर शिव को पशुभूमिका पर लाकर पशुओं को 'शक्तिदरिद्री' बना देती है । किन्तु शक्तिवर्ग का यह बन्धनकारी रूप ही उसका सत्स्वरूप नहीं है । यही शक्ति चक्र सर्वकर्तृत्व, सर्वज्ञातृत्व, सर्वव्यापकत्व, अमित तृप्ति आदि अपनी पञ्चधा विभक्त अपनी अनन्त एवं असीम शक्तियों में स्पन्दित होकर 'चिद्गगनचरी' के रूप में 'पति- प्रमाता' ('शङ्कर') को सर्वशक्ति सम्पन्न एवं निर्बंध एवं पूर्ण स्वतन्त्र भी बनाती है ।