भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 221

१२० स्पन्दकारिका ४. परमेश्वरस्य हि यस्मादीश्वरतामयी शक्तिरैश्वर्यरूपं स्वातन्त्र्यमेव वाच्यवाचकात्मविश्वपदार्थमयं भावजातं भवति ॥¹ 'स्वातन्त्र्यमेव जगदात्मना प्रथते' ² — ५. तस्मात् संवित्त्वमेवैतत्स्वातन्त्र्यं यत्तदप्यलम् । विविच्यमानं बह्वीषु पर्यवस्यति शक्तिषु ।। (तं० १।६१) ६. एक एवास्य धर्मोऽसौ सर्वाक्षेपेण वर्तते । तेन स्वातन्त्र्यशक्त्यैव युक्त इत्याञ्जसो विधिः ।। (तं० १।६७) 'स एव शक्तिमान स्वतन्त्रोऽनुत्तरभट्टारकः स्वस्वातन्त्र्येणोद्भासितस्य विश्वस्य स्वात्मभित्तिसंलग्नतया धारणपोषणस्वभावत्वाद् भैरवो विश्वभरितस्वभावः ॥'³ अभिनवगुप्तपाद—'श्रीबोधपञ्चदशिका' में इसके विशेष निम्न धर्मों की ओर इंगित करते हैं— क) अतिदुर्घटकारित्वमस्यानुत्तरमेव यत् । एतदेव स्वतन्त्रत्वमैश्वर्यं बोधरूपता ॥ ७ ॥ ख) स्वातन्त्र्य अपरिज्ञेय परा शक्ति है— यदेतस्यापरिज्ञानं तत्स्वातन्त्र्यं हि वर्णितम् । स एव खलु संसारो मूढानां यो विभीषकः ॥ (११) स्वातन्त्र्यवाद— प्रकाशविमर्शात्मा संवित्स्वभावः परमशिवो भगवान् स्वातन्त्र्यादेव रुद्रादि स्थावरा- न्तप्रमातृरूपतया नीलसुखादिप्रमेयरूपतया च अनतिरिक्तायाप्यतिरिक्तमेव स्वरूपानाच्छादि- कया संविद्रूपानान्तरीयकस्वातन्त्र्यमहिम्ना प्रकाशते इत्ययं स्वातन्त्र्यवादः । 'शक्ति' तथा 'शक्तिचक्र' 'आन्तरचक्र'— क) विश्व का वमन—बहिः प्रकाशन करने के कारण या संसार रूप वाम (विपरीत) आचरण करने के कारण 'वामेश्वरी' का रूप ग्रहण करती हुई । ख) 'खेचरी', 'गोचरी' 'दिक्चरी' भूचरी रूप प्रमाता तथा अन्तःकरण, बाह्यकरण एवं वस्तुस्वभावरूप में स्फुरित होती है । ग) पशुभूमिका में शून्यपद ग्रहण करके पारमार्थिक 'चिद्गगनचरी' का स्वरूप छिपाकर, किंचित्कर्तृत्वादिरूप कलादिक शक्त्यात्मक 'खेचरी' चक्र के रूप में प्रकाशित होती है । घ) अभेदनिश्चयादिरूप पारमार्थिक स्वरूप को छिपाकर, भेदनिश्चय भेदाभिमान एवं भेदकल्पना से समन्वित अन्तःकरणों की देवी के रूप में—'गोचरीचक्र' बनकर प्रकाशित होती है । १-३. बोधपंचदशिका वि० (हरभट्ट) ।

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