स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४८ स्पन्दकारिका ज्ञाताऽस्य शक्तिः परिमिततनुरल्पवेद्यमात्रपरा । ज्ञानमुत्पादयन्ती विद्येति निगद्यते बुधैराद्यैः । ३) नित्यपरिपूर्णतृप्तिः शक्तिस्त ज्ञानमुत्पादयन्ती विद्येति निगद्यते बुधैराद्यैः । ४) नित्य- परिपूर्ण तृप्तिः शक्तिस्तस्य परिमिता तु सती । भोगेषु रञ्जयन्ती सततममुं राग तत्त्वतां याता ॥' आचार्य क्षेमराज—'षट्त्रिंशत् तत्त्वसन्दोह' । भेदावभासात्मिका, भेदात्मक उल्लासशीला इच्छाशक्ति ही है। 'महामाया' शिव में अभिन्नतया रहने वाली, निखिल जगत् का उल्लासन करने वाली, शिव के अभेद को भेदावभासन में परिणत करने वाली शक्ति है 'परानिशा' (महामाया) ॥ महामाया (परानिशा)—'माया—कला—विद्या, राग, नियति, काल । 'मल' = संकुचित ज्ञान । प्रच्छन्नज्ञानात्मकता = 'मल' । पूर्णत्व की अख्याति = 'मल' । अज्ञान = 'मल' ॥ संसारांकुरकारण = 'मल' ॥ मल, अज्ञान, अभिलाषा, अविद्या—अविद्या, ग्लानि, विमूढ़ता, पशुत्व आदि सभी 'अशुद्धि' के पर्याय हैं— मलोऽभिलाषश्चाज्ञानमविद्यालोलिकाप्रथा । भवयोषोऽनुप्लवश्च ग्लानिः शोषो विमूढ़ता ॥ अहंममात्मताद्वैधो मायाशक्तिरथावृतिः । दोषवीजं पशुत्वं च संसारांकुरकारणम् ॥ तत्त्व—काश्मीरीय शैवदर्शन में ३६ तत्त्वों की मान्यता है जो निम्न है— १. शिव तत्त्व = १) शिवतत्त्व २) शक्ति तत्त्व = २ २. विद्या तत्त्व = १) सदाशिवतत्त्व, २) ईश्वर तत्त्व, ३) शुद्ध विद्या = ३ ३. आत्म तत्त्व = (३१ तत्त्व) । (६) 'माया' (७) कला (८) माया (९) राग (१०) काल (११) नियति (१२) पुरुष (१३) प्रकृति (१४) बुद्धि (१५) अहङ्कार (१६) मन (१७-२१) श्रोत्र-त्वक्-चक्षु-जिह्वा-घ्राण (२२-२६) -वाक्-पाणि-पाद-पायु- उपस्थ (२६-३१) शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गंध । (३२-३६) आकाश-वायु-वह्नि-सलिल- भूमि । 'शिवतत्त्व' (अहंविमर्श) 'सदाशिवतत्त्व' (अहमिदं विमर्श) 'ईश्वरतत्त्व' (इमिदं विमर्श)—इनमें प्रथमपद की प्रधानता है। 'सद्विद्या'—(अहं एवं इदं दोनों का समभावेन प्राधान्य) 'माया शक्ति'—अहं एवं इदं में पृथक्त्वः (क) अहमंश = पुरुष (ख) इदमंश = प्रकृति ॥ 'शिव' का 'पुरुष' रूप में रूपान्तरण—(माया द्वारा पाँच उपाधियों की सृष्टि जिससे कि 'शिव' पशु बन सके ।—पञ्च कञ्चुक—'कला' 'विद्या' 'राग' 'काल' 'नियति' । 'आत्मतत्त्वों' (३१ तत्त्वों) में प्रथम तत्त्व 'माया' है और उसी से उत्पन्न होते हैं 'पञ्चकञ्चुक' ॥ 'मायाशक्ति'—पञ्चकञ्चुक ॥ 'प्रकृति' तेरहवाँ तत्त्व है । माया—'पञ्च- कञ्चुक' । परमेश्वर की ५ शक्तियाँ—(१) 'चित्' (२) 'आनन्द' (३) 'इच्छा' (४) 'ज्ञान'