स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः निष्यन्दः १४९ (५) 'क्रिया' अपने को स्वतन्त्र बोध करना तथा अविघात इच्छासम्पन्न समझना = 'इच्छाशक्ति' ॥ स्वातन्त्र्य = 'आनन्द शक्ति' ॥ 'चित् शक्ति' = प्रकाश ॥ 'ज्ञान शक्ति' = आमर्श ॥ (आमर्श = वेद्य पदार्थ का सामान्य ज्ञान) ॥ क्रियाशक्ति = सर्वाकार धारण करने की योग्यता इन्हीं पञ्चशक्तियों द्वारा परमशिव द्वारा स्वभित्ति (शक्ति) पर जगत् का अवभासन । सांख्यदर्शन—पुरुष, प्रकृति नित्य हैं । शैव दर्शन—पुरुष, प्रकृति अनित्य हैं । १) चित् शक्ति (प्रकाशात्मक—इसी के द्वारा शिव अपने को स्वप्रकाश समझते हैं। २) आनन्दशक्ति = इसके द्वारा शिव अपने में आनन्द का साक्षात्कार करते हैं । ३) इच्छाशक्ति = इसके द्वारा शिव जगत् की सृष्टि, संहार एवं अन्य कार्य निष्पादित करते हैं । ४) ज्ञानशक्ति = इसके द्वारा शिव स्वयं ज्ञानस्वरूप हैं । ५) क्रियाशक्ति = इसके कारण शिव सभी स्वरूपों को धारण कर सकते हैं । जगत् = शिव की शक्तियों का विस्तृत रूप । 'विश्व' शक्ति-प्रचय है (शिवसूत्र) । इसी शक्ति के द्वारा शिव को 'अहं' का बोध हो पाता है । 'शक्ति' में उन्मेष—सृष्टि, 'शक्ति' में निमेष—प्रलय । 'उन्मेष'—सदाशिव तत्त्व । शैवदर्शन—'सृष्टि' = शक्ति का उन्मेष । स्वातन्त्र्य = ज्ञान एवं क्रिया का स्वतन्त्र (अनन्यमुखापेक्षी) कर्तृत्व । सृष्टि-स्थिति- संहार-पिधान और अनुग्रह के दुर्घट कार्यकारित्व, दुर्घट कार्यज्ञातृत्व । स्वातन्त्र्य = अनन्यमुखापेक्षी सर्वज्ञातृत्व, सर्वकर्तृत्व । आत्मस्वभाव पूर्णज्ञातृत्व एवं पूर्णकर्तृत्व की अहंविमर्शात्मिका विश्वात्मक स्फुरणा = 'स्वातन्त्र्य' 'आत्मा' 'चैतन्य' आदि । 'पशुभूमिका' एक साथ, सर्वत्र, निरापद, निर्बंध एवं निरपेक्ष समस्त कार्य करना एवं जानना असंभव है क्योंकि पशु अस्वतन्त्र, सीमाबद्ध एवं परमुखापेक्षी है । यही स्वातन्त्र्य है— 'स्वातन्त्र्यमेव च अनन्यमुखप्रेक्षित्वम् आत्मनः स्वरूपम् । (ई०प्र०वि०) पशु में चितिक्रिया (चेतने की क्रिया । स्वातन्त्र्यात्मक नहीं है । विश्वात्मक स्तर पर ज्ञानक्रिया समन्वित चेतने की क्रिया का अशेष एवं अनन्यमुखापेक्षी कर्तृत्व ही परमेश्वर का 'ऐश्वर्य' एवं 'पूर्ण स्वातन्त्र्य' है । यह स्वातन्त्र्य देशकालातीत है । परमात्मा प्रत्येक क्षण, सब कुछ, कहीं भी, एक साथ (बिना किसी की सहायता के तथा बिना किसी भी बाधा के) सब कुछ कर सकता है एवं सब कुछ जान सकता है किन्तु पशुभूमिक जीव नहीं है । अविराम स्पन्दात्मक 'पतिप्रमाता' का यथार्थ स्वस्वरूप क्या है? समस्त विश्व के