स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५० स्पन्दकारिका समस्त पदार्थों का आधारभूत एवं सबकी अन्तिम विश्रान्तस्थली है 'स्वतन्त्रता' एवं अखण्डस्पन्दात्मिका संवित् शक्ति । चितिक्रिया की प्रक्रिया क्या है? यह स्थूल क्रियावत् नहीं है । प्रत्युत् यह आभ्यन्तरिक साङ्कल्पिक गतिमयता है—यह है अहंप्रत्यवमर्शात्मक सामान्यस्पन्द । विमर्शात्मकता ही इसका अभिन्न स्वभाव है और यही है, जड़ एवं चेतना की व्यावर्तक रेखा । ज्ञान एवं क्रिया शक्ति (प्रकाश-विमर्श) पृथक्-पृथक् पदार्थ नहीं है प्रत्युत् ये स्पन्दात्मिका चितिशक्ति का ही रूपान्तर है । 'क्रिया' ज्ञान का ही उत्पाद (विकास) है । 'ज्ञान' क्रिया का पूर्ववर्ती स्वरूप है । 'प्रकाश' (शिव) बहिर्मुखदशा में 'विमर्श' (शक्ति) है और ही अन्तर्मुख दशा में 'प्रकाश' (शिव) है । 'इदं' अह का फल है—अहं की फसल है । 'इदं' अहं का स्थूलतर विकास है । 'अहं' एक बीज है और 'इदं' है उसका अंकुर । स्पन्दात्मक शिव अपने भीतर अभेद रूप में जगत् को अवस्थित रखता है । 'जगत्' शिव का विराट् प्रसार है । 'स्वातन्र्य' मुख्यतः कर्तृतास्वरूप है । विश्वात्मा स्वयं द्वारा आविर्भूत मल (अशुद्धि) के द्वारा आत्मस्वरूप को आंशिक रूप में आच्छादित करके तथा जड़ वर्ग को सम्पूर्णतः आच्छादित करके स्थित है । यह 'स्वातन्त्र्य' किसी को पूर्णतः अस्वतन्र कर देता है तो किसी को अंशतः । अशुद्धि—'निज शुद्ध्यासामर्थ्यस्य'—जो अपनी अशुद्धियों के कारण ही असमर्थ हो चुका हो ऐसे व्यक्ति का । 'अशुद्धि' = आणव मल । 'कर्तव्य' = कार्म मल । 'क्षोभ' = मायीयमल । 'अशुद्धि' ही है अख्याति; मल, बन्ध या अविद्या । स्वतन्त्र स्वभाव का अज्ञान, पशुत्व, आत्मविस्मृति, शिवत्व के स्थान पर पशुत्व से तादात्म्य ही 'अशुद्धि' है । 'ज्ञानं बन्धः' (शिवसूत्र) में 'ज्ञान' अज्ञानमात्र का सूचक नहीं प्रत्युत् यथार्थ आत्मस्वभाव का अज्ञान है । 'अज्ञान' वह आत्मगोपनात्मिका स्थिति है जिसमें अपने स्वस्वरूप का आच्छादन करके मितात्मा शिव पति से च्युत होकर पशु बन जाता है । इसमें आत्मा स्वातन्त्र्य शक्ति के द्वारा अपने ही स्वतन्त्र स्वरूप को छिपाकर-स्वात्म विस्मृतिरूपात्मक आच्छादन ओढ़ लेता है । 'स्वातन्त्र्यशक्ति' प्रतिक्षण पाँच रूपों में स्पन्दायमान है और उसके पाँच रूप निम्नांकित हैं—१. 'चित' २. 'आनन्द' ३. 'इच्छा' ४. 'ज्ञान' एवं ५. 'क्रिया' । इसे ही सर्वकर्तृत्व, सर्वज्ञत्व, पूर्णत्व, नित्यत्व एवं व्यापकत्व भी कह सकते हैं । शक्ति पञ्चक द्वारा सृष्टि, स्थिति, संहार, पिधान एव अनुग्रहरूपात्मक पञ्च कृत्यों का अनवरत निष्पादन किया जाता रहता है । अपने आनन्दस्वभाव के कारण चैतन्य की प्रकृति ही है विश्वरूप में अनवरतावभासन । चैतन्य का स्वभाव है—संसारभाव का अवभासन । आत्मा संसार की भूमिका पर अभेद व्याप्ति का विस्मरण करके भेद-व्याप्ति ग्रहण कर लेता है । स्वातन्त्र्य-रत्नाकर में निःशेष विश्व अभेदात्मक 'अहं' के रूप में अवस्थित है । 'अहं' को 'इदं' के रूप में अवभासित करने की अभिलाषा ही प्रथम मल है । चूँकि समस्त वैश्विक-विस्तार (जागतिक कल्पना) स्वस्वरूप में शाश्वतिक रूप में अवस्थित है और वह