भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 263

१६२ स्पन्दकारिका ग) तदुपरान्त चित्त में किसी भी विषय का चिन्तन या अनुस्मरण नहीं करना चाहिए। घ) वही आन्तर स्थिति विष्णु का परमपद है जहाँ पहुँचकर मन अत्यन्त आह्लादित हो उठता है— तत्रैकावयवं ध्यायेदव्युच्छिन्नेन चेतसा। मनो निर्विषयं युक्त्वा ततः किञ्चन न स्मरेत् ॥ पदं तत्परमं विष्णोर्मनो यत्र प्रसीदति ॥ (भागवत २-१-१९) ९) ध्यानबिन्दूपनिषद् में कहा गया है कि 'जो मन प्रपञ्च की सृष्टि' स्थिति एवं लय का विधान करता है उस मन का जहाँ विलय होता है वही विष्णु का परम पद है। 'यन्मनस्त्रिजगत् सृष्टिस्थितिव्यसनकर्मकृत् । तन्मनो विलयं याति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ (ध्यान० २५) १०) 'हठयोगप्रदीपिका' में कहा गया है कि गंगा एवं यमुना इड़ा पिंगला के मध्य में स्थित बालखण्डा तपस्विनी का बलात्कारपूर्वक ग्रहण भी विष्णु का 'परमपद' है— गंगा यमुनोर्मध्ये बालखण्डां तपस्विनीम् । बलात्कारेण गृह्णीयात् तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ ११) 'घेरण्डसंहिता' में कहा गया है कि—'अनाहत शब्द की जो विशिष्ट ध्वनि होती है उस ध्वनि के अन्तर्गत ज्योति है। उस ज्योति के अंतर्गत जो मन है वह मन जहाँ विजय प्राप्त करता है वह आस्पद ही विष्णु का 'परमपद' है— अनाहतस्य शब्दस्य तस्य शब्दस्य यो ध्वनिः । ध्वनेरन्तर्गतं ज्योति ज्योतिरन्तर्गतं मनः । तन्मनो विलयं याति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ आचार्य जयरथ तन्त्रालोक की टीका 'विवेक' में कहते हैं— 'अन्तर्लक्ष्यो बहिर्दृष्टिः परमं पदमश्नुते ॥' अन्तर्लक्ष्य एवं बहिर्दृष्टि रखने वाले योगी 'परमपद' प्राप्त करते हैं। वे व्यवहार- परायण रहकर भी स्वात्ममात्र में विश्रान्ति सुख की अनुभूति प्राप्त करते हैं अतः स्पष्ट है कि योगी भेदावस्था में भी अभेद भावना-स्वरूपात्मक स्थिति-प्राप्त करता है— बहिस्तत्तद्व्यवहारपरत्वेऽपि स्वात्ममात्रविश्रान्त्या परं परं चमत्कारातिशयमनु- भवन्ति ॥१ परम पद—'अन्तः अहंपरामर्शात्मनि संवित्त्वे सावधानो बाह्यविषयासंगेऽपि स्वरूपपरामर्शपरत्वात् भैरवमुद्रानुपविष्टो योगी 'परं पदमश्नुते' विमर्शदशामधिशेते ॥'२ भैरवमुद्रानुपविष्ट योगी परमपद या विमर्श दशा प्राप्त करता है। १. जयरथ-'विवेक' (तन्त्रालोक की टीका) (आ०५)। २. तन्त्रालोक (आ०५)—'विवेक' श्लोक ८० ।