भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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प्रथमः निष्पन्दः १६३ ‘नेत्रतन्त्र’ (प्रथमपटल) में शिव कहते हैं— स्वं स्ववीर्यं स्वसंवेद्यं ममैव परमं पदम् ।१ तद्वीर्यं सर्ववीर्याणां तद्द्रैबलवतां बलम् ॥ (नेत्रतन्त्रः १।२४) बौद्धों का परमपद—बुद्धितत्त्व में स्वामित्व की भूमिका का निर्वाह ब्रह्मा करते हैं—बौद्धों का यही मोक्ष है—यही परम पद है— ब्रह्मा तत्राधिपत्येन बुद्धितत्त्वे व्यवस्थितः । सर्वज्ञ च तमेवाहुर्बौद्धानां परमं पदम् ॥२ १. योगशास्त्र में छब्बीसवाँ तत्त्व ही परम पद है— षड्विंशकं तु देवेशि योगशास्त्रे परं पदम् ॥३ २. पाशुपत व्रत में ईश्वर ही ‘परमपद’ है—‘व्रते पाशुपते प्रोक्तमैश्वरं परमं पदम् ॥’४ ३. शैवों का परमपद—समस्त अध्वाओं की सीमायें पार करके जो पद या अवस्था आती है वही शैवों का परमपद है। सर्वाध्वनो विनिष्क्रान्तं शैवानां तु परं पदम् । त्रिक मत के अनुसार—इदन्ता परामर्श का लेश मात्र न रह जाना तथा सर्वत्र पराहन्तापरामर्श का प्रकाश उल्लसित होना ही मुक्तिप्रद ज्ञान है—‘सर्वप्रकारं वासनामात्रे- णापि यत् उज्झितं पराहन्ता परामर्शसारम ॥’५ देवी के द्वारा ‘परमज्ञान’ एवं ‘परमपद’ के विषय में संपृष्ट प्रश्न के विषय में शिव उत्तर देते हुए कहते हैं— परमपद शक्ति गर्भ है—‘शक्त्या गर्भान्तर्वर्तिन्या शक्तिगर्भं परं पदम्’ स्वातन्त्र्य और विमर्श रूपा शक्ति ही गर्भ है । (गर्भ = सार । रहस्य) ‘तन्त्रसार’ में इसे ‘परनाद गर्म आमर्श’ कहा गया है । प्रमात्रैकात्म्य की अन्तर्वर्तिनी पराकाष्ठामयी शक्ति के स्वभाव से यह परम पद उपलक्षित है । अवभास का स्वभाव ही विमर्श है । शक्ति में स्वातन्त्र्य एवं विमर्शात्मक ‘स्व’ भाव शाश्वतिक है । अहं प्रत्यवमर्श ही स्वातन्त्र्य शक्ति है । ‘स्वभावमवभासस्य विमर्शं विदुरन्यथा ।’ १२) ‘योगतत्त्वोपनिषद्’ (१२४-१३६) के अनुसार— तीन लोक, तीन वेद, तीन संध्या, तीन स्वर, तीन अग्नि, एवं तीन गुण—ये सभी प्रणव के त्र्याक्षरों में स्थित हैं। इन तीनों अक्षरों के मध्य जो अर्द्ध मात्रा स्थित है उसके

१. नेत्रतन्त्र । २. तन्त्रालोक-विवेक (१आ०पृ०७९)। ३. तन्त्रालोक-विवेक । ४. तन्त्रालोक-विवेक । ५. तन्त्रालोक-विवेक ।