भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 267

१६६ स्पन्दकारिका (ग) मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् । (घ) ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन् । (ङ) मामनुस्मरन् (च) यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ।। (गीता ८।१२-१३) २३) ऋग्वेद में कहा है विष्णु के परमपद में मधु का उत्स (झरना) है— 'विष्णोः पदे परमे मध्व उत्सः ॥' (ऋग्वेद १।१५४।५) 'ता वां वास्तून्युश्मसि गमध्यै यत्र गावो भूरिश्रृंगाः अयासः । अत्राह तदुरुगायस्य विष्णोः परम् पदम् व भाति भूरि । (ऋग्वेद १।१५४।६) उस परमपद में प्रभूत शृंगों से युक्त (भूरिश्रृंगा) तथा शीघ्रगामी धेनुओं का निवास है । वह नित्य अति द्युतिमान लोक है जोकि इस लोक पर सदैव चमकता है । २४) 'परिमल' (महार्थमञ्जरी की टीका) में 'परमपद' का स्वरूप इस प्रकार है— 'तस्या भोक्त्याः स्वतन्त्राया भोग्यैकीकार एष यः । स एव भोगः सा मुक्तिः स एव परमं पदम् ॥ क्षोभ के विलीन हो जाने पर मितात्मा का सर्वज्ञातृत्व-सर्वकर्तृत्व— तदाऽस्याऽकृत्रिमो धर्मो ज्ञत्वकर्तृत्वलक्षणः । यतस्तदीप्सितं सर्वं जानाति च करोति च ॥ १० ॥ तब (क्षोभ के विलीन हो जाने पर) इसका (मितप्रमाता का) सहज (स्वभावसिद्ध) ज्ञातृता एवं कर्तृता रूप धर्म अनावृत रूप में प्रकाशित हो उठता है जिससे कि वह अपने समस्त आकांक्षित विषयों को (स्वातन्त्र्यपूर्वक) जानने भी लगता है और (यथाकांक्षित कार्यों को निरापद रूप में) निष्पादित भी करने लगता है ॥ १० ॥

  • सरोजिनी * मितप्रमाता का स्वभावसिद्ध धर्म सर्वज्ञातृता एवं सर्वकर्तृता है । यही उसका अकृत्रिम (सहज = स्वाभाविक) धर्म है । तदा = तब उपदेश की अपेक्षा से । क्षोभ के उपशमनोपरान्त । अकृत्रिम = सहज । (भट्टकल्लट = 'अकृत्रिम' = सहज) । धर्म—आत्मनिहित स्वभाव या गुण । 'प्राङ्निर्दिष्ट स्वातन्त्रारूपः परमेश्वरः स्वभावो ज्ञत्वकर्तृत्वे सामरस्यावस्थितप्रकाशानन्दात्मनी ज्ञानक्रिये लक्षणं अव्यभिचारिस्वरूपं यस्य तादृक् । अस्य = इस पुरुष का । ज्ञत्वकर्तृत्व = सब कुछ जानने एवं सब कुछ कर सकने की क्षमता । यत = जिसके कारण