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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 268

प्रथमः निष्यन्दः १६७ ईप्सित = अभीष्ट ॥ तदा = तब१ च + च = यौगपद्य । (ज्ञान-क्रिया में ऐकात्म्य सूचित करने के लिए यहाँ दो चकार प्रयुक्त हुए हैं ।) अकृत्रिम—१) स्वरूपभूत २) साधना से प्राप्त नई उपलब्धि या नव्य सम्प्राप्ति नहीं प्रत्युत् पहले से ही विद्यमान किन्तु मलों के कारण आवृत (माया के कारण सावरण) आत्मधर्म रूपसर्वज्ञत्व एवं सर्वकर्तृत्व रूप शक्ति । जब प्रकृति का ‘क्षोभ’ (आत्म प्रत्यभिज्ञा का ससीम पदार्थों के साथ ऐकात्म्य) शान्त हो जाता है तब समस्त क्रियायें अवरुद्ध हो जाती हैं—यथा निस्तरंग समुद्र की । इस संदर्भ में समुत्थित शंका के निवारण के लिए यह—'तदा... करोति च' श्लोक कहा गया है ।२ उस समय उस योगी का, सर्वज्ञत्व एवं सर्वकर्तृत्व लक्षण वाला सहज धर्म अपने समस्त जिज्ञास्य एवं यथाभीष्ट विषयों को जान लेता है तथा उन कार्यों को निष्पादित कर डालता है ।३ जब ‘क्षोभ’ का लय हो जाता है तब आत्मा स्वरूपस्थ हो जाती है और उसका सहज स्वभाव हो जाता है । सहजस्वभाव क्या है?४ ‘सर्वज्ञता’ और ‘सर्वकर्तृत्ता’ । वह जो जानना चाहे’ जान सकता है, जो करना चाहे कर सकता है—अपने लिए भी एवं अन्य लोगों के लिए भी ।५ ‘पंचरात्र’ में यह सहज धर्म—‘विवेकज ज्ञान’ के नाम से कहा गया है । जब उसका प्रादुर्भाव होता है, तब क्या होता है ? यह आत्मा सर्वज्ञ, सर्वदर्शी' सर्वेश्वर एवं सर्वशक्ति सम्पन्न हो जाता है । यह बिना इन्द्रियों के भी होता है । जैसे अग्नि दाह्य क्या है—इसका विचार नहीं करती । वैसे ही आत्मा ‘ज्ञेय क्या है?’— इसका विचार नहीं करता क्योंकि वह स्वयं बोधस्वरूप है ।६ ‘षाड्गुण्यविवेक’ में भी कहा गया है कि—बोध विचित्र पदार्थों के निर्माण के लिए किसी दूसरे सहकारी कारण की अपेक्षा नहीं रखता । वह ‘स्वयं संकल्प से ही सहस्रों रूपों की सृष्टि कर लेता है— ‘नहि बोधो विचित्रार्थनिर्माणेऽन्यमपेक्षते । संकल्पादेव यो रूपसहस्राणि सृजत्यजः ॥’७ किसी-किसी का ऐसा भी कहना है कि आत्मा में ज्ञातृत्व और कर्तृत्व आदि किसी दूसरे परतत्त्व से आते हैं, वे वस्तुतः आत्मा को अनीश्वर ही मानते हैं ।८ ‘आगमरहस्य’ में कहा गया है—‘जो ईश्वर की क्रिया को किसी सहकारी कारण से की हुई मानते हैं उन्होंने ईश्वरता को ही तिलाञ्जलि दे दी । वे तो ऐसा कहते हैं मानो परस्त्री के अधीन पुरुष का नाम कम कामीश्वर रख दिया गया हो ।’— ‘येऽपीश्वरं व्यपदिश्यन्ति निमित्तहेतु, तैरर्पितः स्थलजलाञ्जलिरीशितायै । १-३. क्षेमराज = स्पन्दनिर्णय । ४-८. स्पन्दप्रदीपिका ।