भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 269, कुल 519 में से

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पृष्ठ 269

१६८ स्पन्दकारिका अन्याङ्गेनोपगमनेन वशीकृतस्य, कामीश्वरस्थितममी बत संगिरन्ते ॥'१ नवें श्लोक में, देहादिक अनात्म तत्त्वों में अहं प्रत्ययस्वरूप क्षोभ के विगलित हो जाने पर, निवात-निश्चल-जलधि के समान सुप्रशान्त स्थिति में अवस्थित आत्मतत्त्व को 'परमपद' शब्द द्वारा प्रतिपादित किया गया था। फिर उसके बल के स्पर्श से पुरुष उससे विलक्षण (भिन्न) क्षोभात्मक धर्म कैसे प्राप्त कर लेता है कि जिसके कारण इन्द्रिय समूह को उनके व्यापार में संलग्न करते हुए 'मैं करता हूँ' 'मैं जानता हूँ'—इत्यादि अपने ऐन्द्रिय विषयों को प्राप्त करके क्षुभित हो उठता है?—इन शंकाओं का निराकरण करने हेतु एवं अनात्मज्ञानियों के मति भ्रम को दूर करने के उद्देश्य से १०वीं कारिका कही गई ॥ तदा = तब ॥ उस यथोक्त क्षोभपरिक्षयोपलक्षित काल में । अस्य—इसका इस आत्मा का । अकृत्रिम = सहजसिद्ध । सतत अव्यतिरिक्त । ज्ञातृत्वकर्तृत्वलक्षणः = ज्ञातृत्व-कर्तृत्व के लक्षण वाला । यतो = जिसके कारण । जिस अव्यभिचारी एवं कारणभूत गुण से । सर्वम् = अखिल । ईप्सितं = ज्ञेय एवं कार्य के रूप में प्राप्त करने हेतु वाञ्छित वस्तु । उस समय । सत्यस्वभाव संबन्धलक्षणयोगात्मिका उस दशा में । (न कि देहादिक आलम्बन में अहं प्रतीति से परिप्लुत सांसारिक पुरुषदशा में) । जानाति च करोति च = जानता है और करता है । ऐसा क्यों कहा गया ? सर्वज्ञातृत्व' उपलब्धृत्व, कर्तृत्व आदि तो आत्मा के अव्यतिरिक्त सहज धर्म हैं । वस्तुतः एक ही ईश्वर की स्वभावप्रत्यवमर्शरूपा एक ही शक्ति है । वही संवेदन के रूप में 'ज्ञान' तथा कार्यसंरंभरूप से 'क्रिया' शब्द द्वारा पुकारी जाती है— 'वस्तुतः एकैव ईश्वरस्य स्वभावप्रत्यवमर्शरूपा शक्तिः, सा संवेदनरूपत्वात् ज्ञान शब्देन उच्यते, लावणमात्रसंरंभरूपत्वात् क्रियाशब्देन च उद्घोष्यते ।' 'इदन्तावसेयस्य वस्तुतो ज्ञेयतया कार्यतया च द्वैविध्यात् द्वित्वेन उपचर्यते ॥' वेद्यत्वप्रतीति के उपप्लव से संस्पृष्ट वेदकैकलक्षण स्वभाव में स्थित उस आत्मा का वह धर्म सर्वज्ञातृत्व एवं सर्वकर्तृत्व के रूप में विजृंभित (प्रकट) होता है । आत्मा की ज्ञातृ—कर्तृत्वलक्षण अव्यतिरिक्तधर्मता उसका स्वभाव है न कि उसकी क्षोभावस्था । अपने इस स्वभाव के प्रत्यवमर्श के अभाव से वेद्य देहादिक में वेदक प्रत्यय का निबन्धनात्मक ज्ञातृत्व एवं कर्तृत्व आत्मा का कृत्रिम एवं परिमित विषय है न कि स्वाभाविक । स्वाभाविक धर्म तो सर्वज्ञातृत्व एवं सर्वकर्तृत्व है ।२ ज्ञातृत्व एवं कर्तृत्व का विकास पूर्वकारिका (९वीं) में कहा गया है कि 'क्षोभ' के विलीन हो जाने पर मितप्रमाता १. स्पन्दप्रदीपिका । २. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दकारिकाविवृति' ।

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