भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 276

प्रथमः निष्यन्दः १७५ तत्त्वे निश्चलचित्तस्तु भुंजानो विषयानपि । नैव संस्पृश्यते दोषैः पद्मपत्रमिवांभसा ॥ विषा पहारिमन्त्रादिसन्नद्धो भक्षयन्नपि । विषं न मुह्यते तेन तद्वद्योगी महामतिः ॥ (भा०वि०)१ जो शुद्ध आत्म स्वभाव को अर्थात् अधिष्ठातृभाव से अपने को स्वयं प्रकाश चिद्रूप से सर्वव्यापक रूप से देखता है वह मुस्कराता हुआ, विस्मयाविष्ट सा, खिलते हुए फूल सा रहता है । अविद्या का विलय हो जाने के कारण उसके लिए यह क्षुब्ध संसार कहाँ है? यह योगी की एक उच्च भूमिका है । इसकी दृष्टि द्रष्टा रूप से सभी का अनुभव है । इष्टोपदेश नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—‘वत्स! तुम्हारी दृष्टि से यह जो कुछ दृष्टिगत हो रहा है, उसका आग्रह छोड़ दो । जिससे देखते हो, उसको देखो । उसको देख लेने पर सब कुछ देख लोगे ।।' यदिदं दृश्यते दृष्ट्या ग्रहं पुत्राऽत्र सन्त्यज । येन पश्यति तं पश्य यं दृष्ट्वा पश्यसेऽखिलम् ॥२ ऐसी स्थिति में विकल्प की कारीगरी के अधीन होकर कुमार्ग में चलना नहीं होता, सदा अपने स्वरूप में स्थिति हो जाती हे । वही सत्यसंकल्प ईश्वर है । अभ्यास और भावना से समस्त दुःख मिट जाते हैं । रसायन आस्वादन के बिना केवल ज्ञानमात्र से भी सिद्धि देता है । कहा भी गया है— ‘यो जगु पश्वि एषु किंनु वीक्षोमाइत्य करो । विषयालविलुच्छि एसे पत्तापत्त रावीक्षोअपलइयद अस्त्युबुद्धि ।।' ‘वैसे तो प्रभो! आपको चरवाहे, बच्चे और स्त्रियाँ भी जानती हैं किन्तु साधन या युक्ति के न होने से आप उन्हें मुक्त नहीं करते । गाय में स्थित दूध भूख प्यास नहीं मिटाता । पान करने पर ही वह दूध भूख-प्यास मिटाता है ।' मुनि ने भी कहा है— ‘यदि वाचनिकाज्ज्ञानान्मुक्तिः स्याद् भवनां विना । ‘शारीरमानसैर्दुःखैर्मुच्येरन् सर्वजन्तवः ॥’ ‘रसायनं विनास्वादात् सूचितं ह्यपि सिद्धिदम्'३ भले ही रसायन का आस्वादन न किया जाय और मात्र उसके गुणों को सूचित ही किया जाय फिर भी सिद्धि प्रदान करता है । दूसरे स्थल पर भी कहा गया है कि— आगोपालबालवनितं भगवंस्त्वमित्थं, ज्ञातोऽप्युपायविरहान्न तु मोक्षदोऽसि । नान्तः स्थितं भवति धनेषु तृड्विहर्तृ, क्षीरं तदेव पुनरभ्यवहारतः स्यात् ॥४ १-४. उत्पलदेवाचार्यः ‘स्पन्दप्रदीपिका' ।