भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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१७६ स्पन्दकारिका

तम् = स्वस्वभाव आत्मा को । अधिष्ठातृभावेन = समस्त शरीरों में समस्त अवस्थाओं में, सर्वदा, सर्वत्र मात्र अनुभविता के रूप में सभी में व्याप्त होकर, सभी में अवस्थित होकर, 'मैं ही एक (अद्वैत) एवं स्वतन्त्र परमेश्वर अधिष्ठाता हूँ'—इस प्रकार के परामर्शस्वरूप अधिष्ठातृ भाव से ॥ अवलोकयन् = देखते हुए । पूर्वोक्त उपपत्ति की दृष्टि से, उपलब्धि की दृष्टि से देखते हुए ('प्रत्यभिज्ञानन्' अपने को पहचानते हुए) । स्मयमान इव = अपने परप्रमाता आत्मतत्त्व की प्रत्यभिज्ञा होने पर और अपने मायिक प्रमातृत्व की मिथ्या समझते हुए आश्चर्यचकित होकर ॥ य आस्ते = जो अवस्थित है, जो स्थित है । अर्थात् जो निर्विप्लवा स्थिति का अनुभव करता है । तस्य = इस प्रकार के लक्षण वाले उस योगी का । इयं = यह इस प्रकार सुप्रख्यात, देहादिक में अहं प्रतीतिमूला । कुसृतिः = कुमार्ग । जन्म जरामरणादि के द्वन्द्वयोग से कुत्सिता या गर्हिता सृति (सरण) । अर्थात् अनेक योनियों में जन्ममरणादि चक्र का मार्ग—आवागमन मार्ग ॥१ प्रस्तुत कारिका का सारांश—(१) अपने आत्मस्वरूप 'स्वभाव' की जगत् के प्रत्येक कण में व्यापकता को देखकर योगी आश्चर्यचकित हो जाता है । (२) जगत् के कण-कण में अपना ही साक्षात्कार (स्वभाव का दर्शन) करने लगता है । (३) ऐसे योगियों के लिए आवागमन का कोई मूल्य नहीं होता और वे इस संसरण-चक्र से मुक्त हो जाते हैं । अभ्यासोपरान्त स्पन्दशक्ति की आन्तरिक अनुभूति स्पन्द का सार्वभौम अधिष्ठातृत्वभाव—'तमधिष्ठातृत्वभावेन स्वभावमवलोक- यन्'—सूत्रकार का कथन है कि जो कोई साधक स्वभाव (स्पन्दस्वरूप आत्म तत्त्व) की जगत् के प्रत्येक कण में विद्यमानता अनुभव करता है और इस आश्चर्यात्मक सर्वानुस्यूतता का साक्षात्कार करके विस्मय विमुग्ध हो जाता है तब वह साधक इस तिरस्कार-पूर्ण और विगर्हणीय आवागमन-चक्र से मुक्त हो जाता है । भट्ट कल्लट ने 'स्पन्दसर्वस्व' में कहा है— (१) आत्मस्वभाव (सामान्य स्पन्द तत्त्व) विश्व के प्रत्येक पदार्थ में अन्तः स्थित और प्रत्येक प्रकार की शक्ति से युक्त है । (२) यदि कोई योगी उसी विभु 'स्वभाव' (सामान्य स्पन्द) को अधिष्ठाता के रूप में (एवं सर्व व्याप्त रूप में) अवस्थित देखता है तो वह आवागमन-चक्र (सृति) से मुक्त हो जाता है— १. स्पन्दकारिकाविवृति : रामकण्ठाचार्य ।