स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः निष्यन्दः १७७ 'तदेवम्, यतः सर्वानुस्यूतः सर्वसामर्थ्ययुक्तश्च आत्मस्वभावः यस्मात् तम् अधि- 'ष्ठातृभावेन सर्वव्यापकत्वेन स्वभावं पश्यन् विस्मयाविष्ट इव यस्तिष्ठति, तस्य कुत्सिता सृतिः सरणं न भवति ॥' अधिष्ठातृभाव एवं स्वभावावलोकन—नित्योदित समाधि—अन्तर्मुख एवं बहिर्मुख दोनों विरोधी भाव जिस अवस्था में समरस हो जाते हैं—जहाँ समाधि एवं व्युत्थान दोनों में अभेद का अनुभव होता है—उसी नित्योदित समाधि की अवस्था को नित्योदित समाधि कहते हैं । शैव साधक 'स्वभाव' का साक्षात्कार करके इसी स्मयमानावस्था में पहुँचता है । तुरीयावस्था या 'शाक्त भूमिका' में प्रविष्ट योगी समस्त सांसारिक व्यवहारों का निष्पादन करते हुए भी जगत् के निःसार से निःसार वस्तुओं को भी स्वस्वभावात्मक स्पन्दतत्त्व से युक्त देखकर, शरीरादिक तुच्छ पदार्थों में आत्माभिमान का त्याग करके, विश्वात्मभाव की भूमिका पर आरूढ़ होकर, (भैरव भूमिका प्राप्त करके) चतुर्दिक स्वातन्त्र्य शक्ति के प्रसार का अनुभव करते हुए, प्रत्येक अवस्था एवं प्रत्येक स्थल में अपने चित् तत्त्व की अधिष्ठातृत्ता का अनुभव करते हुए, सूर्य के ऊपर क्षणिक रूप में दृश्यमान (प्रकाशाच्छा- दक) घनों के रूप में चिद्रूप आत्मतत्त्व पर माया के क्षणिक घनों के आवरण को देखता हुआ, तुरीय भूमिका पर स्थायी अवस्थान द्वारा तुरीयावस्था प्राप्त करके शिवभाव प्राप्त कर लेता है । उच्च भूमिका में प्रविष्ट योगी यह अनुभव करता है कि उसके चारों ओर उसकी 'स्वातन्त्र्य शक्ति' ही प्रसृत है और वह तुरीयावस्था स्वरूप स्वच्छन्द भूमिका मेंप्रवेश कर रहा है— 'योगी स्वच्छन्दयोगेन स्वच्छन्दगतिचारिणा । स्वस्वच्छन्दपदे युक्तः स्वच्छन्दसमतां व्रजेत् ॥'१ ऐसे योगी को ऐसा अनुभव होता है कि जैसे जलाशय में उत्थित तरंगें, अग्नि से ऊर्ध्वोत्थित लपटें एवं सौरमण्डल से निःसृत प्रकाश पुञ्ज क्रमशः जलाशय, अग्नि एवं सौरमण्डल से अभिन्न ही है उसी प्रकार विश्व की निःशेष भंगियाँ 'स्वस्वरूप' के बहिर्मुखी विकास से अभिन्न हैं—जलस्येवोर्मयो वह्नेर्ज्वालभंग्यो यथा खेः । ममैव भैरवस्यैता विश्वभंग्यो विनिर्गताः ॥२ शाक्तभूमिका का साक्षात्कार योगी को तुरीयावस्था एवं उसके अनन्तर तुरीया- तीतावस्था में पहुँचा देता है । 'स्मयमान इवास्ते'—विस्मय-संभरित होकर, अर्थात् आश्चर्याविष्ट होकर अवस्थित रहता है । 'स्मय' या 'विस्मय' क्या है? 'विस्मय' शैव दर्शन में योग की एक उच्चावस्था है—'विस्मयो योगभूमिकाः' (शि०सू० १.१२)३ १. स्वच्छन्दतन्त्र (७-२५७-८) । २. विज्ञानभैरव (११०) । ३. शिवसूत्र (१.१२) । स्पं० १२