भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 283, कुल 519 में से

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पृष्ठ 283

१८२ स्पन्दकारिका स्पंद तत्त्व के नाम की सत्यता एवं सार्थकता 'शून्य' की भाँति स्मर्यमाण नहीं है क्योंकि उसे 'अज्ञेय' नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह ज्ञाता से अभिन्न है। इसीलिए बृहदारण्यकोपनिषद् में कहा गया है कि 'किस साधन से ज्ञाता को जाना जाय?' यद्यपि योगी व्युत्थानावस्था में 'समाधि' का स्मरण रखता है किन्तु यही 'स्पंद तत्त्व' नहीं है। यह वैसा नहीं है क्योंकि वह परम ज्ञाता (Omniscient) नित्य (Ever-present) असीम तथा पूर्ण प्रकाश एवं पूर्णानन्द है। 'न सावस्था न यः शिवः' (विचारों की दिशा में शब्द एवं अर्थ की ऐसी कोई दशा (अवस्था) है ही नहीं जो शिव न हो) अतः 'स्पंद तत्त्व' अनन्तानन्दस्वरूप होने के कारण स्मरण का विषय नहीं बन सकता और न तो जड़ (Insentient) ही कहा जा सकता है। उसे 'तत्' (That) कहना भी संगत नहीं है। क्योंकि ऐसा कहने से यह बोध होता है कि वह ज्ञान का विषय बन चुका है और स्मर्यमाण है। शब्द सत्य स्मर्यमाण एवं ज्ञेय नहीं है।१ आचार्य उत्पलदेव 'स्पन्दप्रदीपिका' में कहते हैं—अभाव शशशृंग के समान होता है। अतः अवस्तु होने के कारण वह कभी अनुभव का विषय नहीं बन सकता। अभाव एक मूढ़ावस्था है अतः चेतन नहीं है। अभियोग (अभिलाषा) के संस्पर्श से अभाव की भावना प्रादुर्भूत होती है। वह मेरी शून्यावस्था थी—ऐसा स्मरण होता है। कहा भी गया है कि—जिस भाव के द्वारा अभाव बाधित होता है; वह 'है' या 'नहीं'। उसके अभाव के बाधक भाव का सद्भाव कौन काट सकता है? अतः वह है और चिन्मय है। उसी से सभी का अनुभव होता है, अभाव का भी'— 'अभावो येन भावेन बाध्यतेऽस्ति न नास्ति सः। तस्य भावस्य सद्भावो वद केन निवार्यते। सोऽस्त्यतश्चिन्मयो भावो येन सर्वं विभाव्यते ॥' यही कारण है कि अभाव की भावना कृत्रिम और अनित्य ही होती है। वह सुषुप्तावस्था के समान है। यदि ऐसा न होता तो बाद में मूढ़ावस्था के समान उसका स्मरण न होता। उस अवस्था के कारण ही सदा प्रकाशमान आत्मा स्मृति का विषय बन जाती है। आत्मा देखकर ही तो स्मरण करती है। अतः वह चिद्रूप एवं नित्योदित है। यही कारण है—'कि गुरु से उपदेश प्राप्त करके आदरपूर्वक उसका सम्मान करना चाहिए। अभी तक ऐसा लगता है मानों दो अवस्थायें हों—१) स्मर्ता २) स्मर्तव्य। इनमें कौन नित्य है और कौन अनित्य?—इसका विचार अगली कारिका में किया गया है। 'अवस्थाद्वयमात्राऽस्ति स्मर्तृस्मर्तव्यभेदतः। यत्तस्य नित्यनित्यत्वविचारायेदमुच्यते ॥'२ नाभावो = न + अभावो। अभावो = वस्तुशून्यता। भाव्यतां = भवनीयत्वं। 'समाधावालम्बनभावं।' समाधि में स्थित आत्मालम्बन। नैति = नहीं जाता है। (क्योंकि अभाव एवं भाव की भावना में परस्पर विरोध है) १. स्पन्दनिर्णय। २. उत्पलदेवाचार्य—'स्पन्दप्रदीपिका'।

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