स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 284, कुल 519 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः निष्यन्दः १८३ भाव = संविद्विषयतायोग्यपदार्थ। यह ध्येय के रूप में आलम्बन का विषय बन सकता है। एक स्थान पर कहा गया है— 'अभावं भावयेत्तावद्यावत्तन्मयतां व्रजेत्॥' ध्यान, ध्यातृ एवं ध्येय रूप विकल्पों के उच्छेदस्वरूप जो समाधि की अवस्था है उसे ही आत्मतत्त्व का विस्मरण करने वाले (अज्ञ) लोग 'अभाव' मानते हैं। तत्र = वहाँ। उस अवस्था विशेष में। अमूढ़ता = मूढ़ता का अभाव॥ 'यतोऽभियोगसंस्पर्शात्' = व्युत्थानावस्था में उसी प्रकार की दशा अन्तरा- नुसंधान का विषय के रूप में गृहीत अभियोग के द्वारा तत्समय प्रत्युदित अभिलाप से होने वाले संस्पर्श या संपर्क से। तदासीत्—तद् + आसीत्। 'तद्' = दशान्तर। वह दशान्तर। 'आसीत्' = था। (अभूत्)॥ इति निश्चयः = अध्यवसाय। (अध्यवसायः स्यात्)॥ अभाव समाधिलब्धप्रतिष्ठ योगी व्युत्थानावस्था में अवस्थित होने पर यदि उस अवस्था का अनुसंधान न कर पाये तब भला हम उसे लब्ध प्रतिष्ठ कैसे कह सकते हैं ? और वह भी अपने को उस प्रकार का कैसे समझ सकता है ? उसके ऐसा न होने पर समाधि और व्युत्थान इन दोनों में कोई व्यतिरेक (पृथक्ता) रह ही नहीं जाएगी। अर्थात् उसकी व्युत्थानावस्था एवं समाधि दोनों में कोई अन्तर रह ही नहीं जाएगा। भाव यह है कि उसे समाधि का अनुभव हो ही नहीं पायेगा। हाँ, उस अभाव की अवस्था की प्राप्ति के कारण इतना स्मरण अवश्य बना रहेगा कि मैंने उसका अनुभव अवश्य किया था।१ बारहवीं कारिका के भाव को स्फुटीकृत करने के लिए ग्रन्थकार ने तेरहवीं कारिका कही। अतः = इसलिए। 'वह अनुभव मुझे कभी भूतकाल में हुआ था'—ऐसा अभियुज्यमान होने के कारण। तत् = वह। 'अभावसमाधि' नामक वस्तु। कृत्रिमं ज्ञेयं—बनावटी समझना चाहिए अर्थात् भावाभावदशा के योग के कारण उसे काल्पनिक एवं अनित्य समझना चाहिए। सदा—सदैव। अर्थात् ऐसी कोई कालकला संभव नहीं हो पाती जिसमें कि उस प्रकार की समाधि की अवस्था नित्य रूप में स्थित रह सकें। इसे किस प्रकार की कृत्रिमता समझा जाय? इसे सुषुप्तावस्था के समान अर्थात् सुखपूर्ण निद्रा ('सुखस्वापावस्था') के समान वाले पद (संविदधिकरण) के तुल्य समझना चाहिए॥ १. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दकारिकाविवृति'।