भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 288, कुल 519 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 288

प्रथमः निष्यन्दः १८७ ‘शून्य’ ही परमतत्त्व है । नागार्जुन प्रभृति दार्शनिकों ने ‘सर्वशून्यवाद’ की स्थापना की ओर समस्त सत्ताओं का निषेध किया गया । अभिनवगुप्तपादाचार्य ने अपने ‘तन्त्रालोक’ नामक ग्रन्थ में इसे ‘सर्वापह्नवहेवाक धर्मा’ कहा । ये दार्शनिक सत्ता के प्रत्येक प्रमाता, प्रमेय, प्रज्ञा आदि के अनस्तित्त्व को स्वीकार करते हैं । समस्त विश्व शून्य का विवर्त होता है । १) मुख्यो माध्यमिको विवर्तमखिलं शून्यस्य मेने जगत् ॥ २) न सत् नासन् न सदसन्न चाप्यनुभवात्मकम् । चतुष्कोटि विनिर्मुक्तत्वं माध्यमिको गुरुः ॥ ‘शून्य’ न सत् है, न असत् है, न सदसत् है, प्रत्युत् यह चतुष्कोटिविनिर्मुक्त तत्त्व है: ‘चतुष्कोटि विनिर्मुक्तं तत्त्वं माध्यमिका विदुः ।’¹ १) शून्यवाद के अनुसार विश्व शून्य का विवर्त है । शून्य ही पारमार्थिक सत्य है । २) विज्ञानवाद के अनुसार विश्व विज्ञान का विवर्त है । ३) शान्त ब्रह्मवाद के अनुसार विश्व ब्रह्म का विवर्त है । ४) व्याकरण-दर्शन के अनुसार विश्व शब्द का विवर्त है । ‘विवर्ततेऽर्थभावेन जगत्प्रक्रिया यथा ॥’ ५) आभासवाद के अनुसार विश्व केवल आभास है । ६) प्रतिबिम्बवाद के अनुसार विश्व केवल सत्य का प्रतिबिम्ब है । ७) स्वातन्त्र्यवाद के अनुसार विश्व स्पन्द की सिसृक्षा—इच्छा है । ‘इच्छामात्रं प्रभोः सृष्टिः’ (माण्डूक्यकारिका) ‘मुख्यो माध्यमिको विवर्तमखिलं शून्यस्य मेने जगत्’ (शून्यवाद) ८) भास्कराचार्य ने जगत् को ‘अविकृतपरिणाम’ कहा । ९) रामानुजाचार्य ने जगत् को ‘परिणाम’ कहा । १०) गौड़पादाचार्य (अजातिवाद) यदि जगत् हो तब उसके स्वरूप के विषय में कहा जाय कि वह सत् है कि असत्, विवर्त है कि परिणाम, आभास है कि प्रतिबिम्ब । यथार्थ तो यह है कि जगत् है ही नहीं । ११) शङ्कराचार्य = जगत् न सत् है न असत् न सत्य है न मिथ्या है प्रत्युत् यह है ‘अनिर्वचनीय’ ‘अनिर्वचनीयतावाद’ ॥ बौद्धों का शून्यवाद भी यही मानता है कि जगत, सत, असत्, सदसत् एवं सद- सत से भिन्न-इन समस्त कोटियों से परे है— ‘न सत् नासन् सदसन्न चाप्यनुभवात्मकम् । चतुष्कोटिविनिर्मुक्तं तत्त्वं माध्यमिका विदुः ॥’ १. माध्यमिककारिका ।

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक) · पृष्ठ 288, कुल 519 में से · BharatKosha