भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 289

१८८ स्पन्दकारिका बौद्धों की शून्यवादी दृष्टि में शून्य ही पारमार्थिक सत्य है। शङ्कराचार्य की दृष्टि में—ब्रह्म ही पारमार्थिक सत्य है जगत् मिथ्या है— ‘ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या जीवब्रह्मैव नापरः ॥’ शङ्कराचार्य ने भी जगत् को व्यावहारिक सत्य कहा और शून्यवादियों ने भी जगत् को सांवृत्तिक सत्य कहा। शङ्कराचार्य ने भी जगत् को अनिर्वाच्य कहा। शून्यवादियों ने भी ‘शून्य’ को अनिर्वाच्य कहा। शून्यवादियों की दृष्टि में इस अनिर्वाच्य शून्यदशा को प्राप्त कर लेना ही परम उपलब्धि एवं चरम सिद्धि है। यही उनकी निर्वाण दशा है। सर्वशून्यता की अनुभूति ही निर्वाण है जिसमें सारी संवेदनायें शान्त हो जाती हैं—दीपक की लौ के शान्त हो जाने पर उदित प्रगढ़ प्रशान्त अवस्था की अनुभूति होना ही—‘निर्वाण’ है— दीपो यथा निर्वृतिमभ्युपेतो नैवावनिं गच्छति नान्तरिक्षम् दिशं न काञ्चिद् विदिशं न काञ्चिद स्नेहक्षयात्केवलमेति शान्तिम्। योगी तथा निर्वृतिमभ्युपेतो नैवावनिं गच्छति नान्तरिक्षम् १ दिशं न काञ्चिद् विदिशं न काञ्चित्क्लेशक्षयात्केवलमेति शान्तिम् ॥ सर्वशून्यता (सर्वशून्यभाव) की अनुभूति ही शून्यवादी बौद्धों का ‘निर्वाण’ है। बुद्धघोष इसी सर्वशून्यता की अनुभूति (साक्षात्कार=) को ही निर्वाण एवं शान्ति दोनों कहते हैं। वे कहते हैं कि दीपक की आग्नेय शिखा के बुझ जाने पर वह बुझी हुई लौ न तो भूमि में जाती है। न आकाश में, न दिशा में जाती है और न तो विदिशा में प्रत्यूत् तेल के समाप्त हो जाने पर लौ केवल शान्त हो जाती है उसी प्रकार योगी की चेतना निर्वृत्ति में पहुँचने पर न भूमि में जाती है और न तो आकाश में, न तो किसी दिशा में जाती है और न विदिशा में प्रत्यूत् क्लेशों का क्षय हो जाने पर शान्ति में लयीभूत हो जाती है। अभावब्रह्मवाद को स्वीकार करने में सबसे बड़ी समस्या यह है कि यदि आत्मा स्वयं ‘अभाव’ है तो अभाव की दशा में किसी भी वेदक सत्ता (जानने एवं अनुभव करने वाली सत्ता) का भी अभाव रहने के कारण अभाव की दशा का अनुभव कौन करेगा? ‘अभाव’ यदि अनस्तित्त्व का पर्याय है तो अनस्तित्व से अस्तित्व, सत्ताशून्यता से सत्ता का उदय कैसे होगा? आत्मा स्वयं ही अभाव (अनस्तित्व) है तो अनस्तित्व (अभाव) की वह अनुभूति कैसे करेगी? जो है ही नहीं वह किसी के होने या न होने का अनुभव कैसे कर सकती है? अभाव से भाव रूप जगत् का आविर्भाव कैसे हो सकता है? क्या असत् से सत् का प्रादुर्भाव संभव है? इसीलिए कारिकाकार कहते हैं— ‘नाभावो भाव्यतामेति न च तत्रास्त्यमूढ़ता ॥’ (का० १२) १. सौन्दरनन्द (१६:२८-२९)।