स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
१८८ स्पन्दकारिका बौद्धों की शून्यवादी दृष्टि में शून्य ही पारमार्थिक सत्य है। शङ्कराचार्य की दृष्टि में—ब्रह्म ही पारमार्थिक सत्य है जगत् मिथ्या है— ‘ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या जीवब्रह्मैव नापरः ॥’ शङ्कराचार्य ने भी जगत् को व्यावहारिक सत्य कहा और शून्यवादियों ने भी जगत् को सांवृत्तिक सत्य कहा। शङ्कराचार्य ने भी जगत् को अनिर्वाच्य कहा। शून्यवादियों ने भी ‘शून्य’ को अनिर्वाच्य कहा। शून्यवादियों की दृष्टि में इस अनिर्वाच्य शून्यदशा को प्राप्त कर लेना ही परम उपलब्धि एवं चरम सिद्धि है। यही उनकी निर्वाण दशा है। सर्वशून्यता की अनुभूति ही निर्वाण है जिसमें सारी संवेदनायें शान्त हो जाती हैं—दीपक की लौ के शान्त हो जाने पर उदित प्रगढ़ प्रशान्त अवस्था की अनुभूति होना ही—‘निर्वाण’ है— दीपो यथा निर्वृतिमभ्युपेतो नैवावनिं गच्छति नान्तरिक्षम् दिशं न काञ्चिद् विदिशं न काञ्चिद स्नेहक्षयात्केवलमेति शान्तिम्। योगी तथा निर्वृतिमभ्युपेतो नैवावनिं गच्छति नान्तरिक्षम् १ दिशं न काञ्चिद् विदिशं न काञ्चित्क्लेशक्षयात्केवलमेति शान्तिम् ॥ सर्वशून्यता (सर्वशून्यभाव) की अनुभूति ही शून्यवादी बौद्धों का ‘निर्वाण’ है। बुद्धघोष इसी सर्वशून्यता की अनुभूति (साक्षात्कार=) को ही निर्वाण एवं शान्ति दोनों कहते हैं। वे कहते हैं कि दीपक की आग्नेय शिखा के बुझ जाने पर वह बुझी हुई लौ न तो भूमि में जाती है। न आकाश में, न दिशा में जाती है और न तो विदिशा में प्रत्यूत् तेल के समाप्त हो जाने पर लौ केवल शान्त हो जाती है उसी प्रकार योगी की चेतना निर्वृत्ति में पहुँचने पर न भूमि में जाती है और न तो आकाश में, न तो किसी दिशा में जाती है और न विदिशा में प्रत्यूत् क्लेशों का क्षय हो जाने पर शान्ति में लयीभूत हो जाती है। अभावब्रह्मवाद को स्वीकार करने में सबसे बड़ी समस्या यह है कि यदि आत्मा स्वयं ‘अभाव’ है तो अभाव की दशा में किसी भी वेदक सत्ता (जानने एवं अनुभव करने वाली सत्ता) का भी अभाव रहने के कारण अभाव की दशा का अनुभव कौन करेगा? ‘अभाव’ यदि अनस्तित्त्व का पर्याय है तो अनस्तित्व से अस्तित्व, सत्ताशून्यता से सत्ता का उदय कैसे होगा? आत्मा स्वयं ही अभाव (अनस्तित्व) है तो अनस्तित्व (अभाव) की वह अनुभूति कैसे करेगी? जो है ही नहीं वह किसी के होने या न होने का अनुभव कैसे कर सकती है? अभाव से भाव रूप जगत् का आविर्भाव कैसे हो सकता है? क्या असत् से सत् का प्रादुर्भाव संभव है? इसीलिए कारिकाकार कहते हैं— ‘नाभावो भाव्यतामेति न च तत्रास्त्यमूढ़ता ॥’ (का० १२) १. सौन्दरनन्द (१६:२८-२९)।
प्रथमः निष्यन्दः १८९ 'नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।' (गीता) अभावसमाधि—के उपदेष्टा कहते हैं कि 'मैं नहीं हूँ, मैं नहीं हूँ'—इस प्रकार की भावना का अभ्यास तब तक करणीय है जब तक कि आत्मा अभावस्वरूप न बन जाय । भावना का विषय तो वही संभाव्य है जिसकी सत्ता हो । यदि 'अभाव' (प्रत्येक भावात्मक सत्ता का अनस्तित्व = भाव का अभाव = अस्तित्व का अत्यन्ताभाव) अनस्तित्व का ही पर्याय है तो उसे भावना का विषय बनाया भी कैसे जा सकता है ? स्पन्दनिर्णयकार कहते हैं कि यदि 'अभाव' कोई भावात्मक सत्ता (जागतिक अस्तित्व व्यावहारिक सत्य) है तब तो वह अभाव का अभाव होने के कारण स्वयं भाव- सत्ता (अस्तित्व) बन जाएगा— 'भावनाया भाव्यवस्तु विषयत्वादभावस्य न किंचित्त्वाद् भाव्यमानतायां वा किंचित्त्वे सत्यभावत्वा भावात् ॥' ('स्पंदनिर्णयः' १/१२) अभावभावना के उपदेष्टा शास्ता एवं उपदिष्ट शिष्य दोनों को 'अभावब्रह्मवाद' में आस्था रखने पर—इस आत्मछल को स्वीकार करना पड़ता है कि 'मैं विद्यमान तो होने का अनुभव तो कर रहा हूँ किन्तु मैं हूँ नहीं'—हमारी सत्ता तो है किन्तु वह सत्ता- हीनता है । अभाववादी यह प्रतिपादित करते हैं कि 'अभावसमाधि' में सर्वाभावरूप विश्वाभाव ही भावना का विषय बनता है किन्तु यदि 'विश्वोच्छेद' (विश्वाभाव) का अर्थ प्रत्येक सत्ता का निषेध है तब तो अनुभविता का भी उच्छेद हो जाएगा और फिर इस 'विश्वोच्छेद' का अनुभव कौन करेगा ? यदि यह मान लिया जाय कि विश्वोच्छेद होने की दशा में भी अनुभविता का उच्छेद नहीं होगा तो विश्वोच्छेद की कल्पना वन्ध्यापुत्र के समान निरर्थक होगी— 'किञ्च भावकस्यापि यत्राभावः स विश्वोच्छेदः कथं भावनीयः भावकाभ्युपगमे तु न विश्वोच्छेदो भावकस्यावशिष्यमाणत्वात् ॥' 'मूढ़ता' एक विशेष प्रकार की जड़ता है जिसमें किसी प्रकार की संवेदना नहीं रहती । अभाव समाधि का योगी समाधिगत अनुभव को अपनी व्युत्थानावस्था में इस प्रकार अनुभव करता है—'मैं प्रगाढ़ मूढ़त्व की अवस्था में लीन था और मेरी वह अवस्था व्यतीत हो चुकी है ।' वह 'समाधि' समाधि कहने योग्य भी नहीं है जिसमें अपने ज्ञान क्रिया संवलित चैतन्य की अनुभूति भी न हो सके । उसे मद्यजन्य तामसिक अचेतना के सदृश एक मोहात्मक अवस्था माना जा सकता है । फिर प्रगाढ़ सुषुप्ति एवं समाधि में भेद क्या रह जाएगा ? बौद्धों के 'निर्वाण' की जिस अवस्था को 'शान्ति' कहा जाता है वह भी अन्ततः 'शून्य' ही तो है । 'निर्वाण' में यदि ज्ञान-क्रिया संवेदना (ज्ञातृत्व एवं कर्तृत्व का संवेदन) का अभाव है तो उसे शैव स्पन्दशास्त्र स्वीकार नहीं करता क्योंकि शैव दार्शनिक
१९० स्पन्दकारिका इस ज्ञातृत्व-कृतित्व की संवेदना से शून्य अवस्था को मात्र जड़ता ही मानते हैं। शैव दर्शन में निर्वाण या मोक्ष स्वरूप प्रथन मात्र है अन्य कुछ नहीं—'मोक्षो हि नाम नैवान्यः स्वरूपप्रथनं हि सः । स्वरूपं चात्मनः संवित्नान्यत्' आत्मा अख्याति की संकुचित सीमाओं को लाँघकर अनन्त ज्ञातृत्व एवं असीम कर्तृत्व की अनुभूति करने लगता है और यही है उसका मोक्ष। मुक्तजीव जड़ नहीं होता प्रत्युत् पूर्णचेतन होता है। वह 'अभाव' 'शून्यता' एवं 'जड़ता' का अनुभव नहीं करता। शून्यवाद के अनुसार प्रत्येक ज्ञान, ज्ञाता एवं ज्ञेय (त्रिपुटी) निःस्वभाव एवं शून्य है। वे ज्ञाता-कर्ता संवित् को भी निःस्वभाव मानते हैं। इनके मत में संवित् की शून्यता ही निर्वाण है। स्पन्द, प्रत्यभिज्ञा एवं क्रम दर्शन मानता है कि संवित् पूर्णज्ञान एवं पूर्ण कर्तृत्वस्वरूप 'स्पन्द' है। 'स्पन्द' से ही समस्त भावों का अवभासन और स्थिति हुआ करती है। इस विश्वात्मक स्पंद को ही अस्वीकार कर दिया जाय तो समस्त विश्व संज्ञाहीन हो जाएगा। शून्यवादियों के शून्य का कोई सुस्पष्ट स्वरूप भी नहीं है। प्रश्न उठता है कि आत्मा का कोई अस्तित्व नहीं है तो 'निर्वाण' किसका है? जड़ पदार्थों का निर्वाण तो संभव नहीं है। यदि वेदक आत्मा का ही अस्तित्व नहीं है तो क्लेश किसको होगा? और उसके विनाश का प्रयास किसके लिए किया जाएगा? शून्यवादियों का स्वपक्ष में तर्क—शून्यवादी माध्यमिक आचार्यों का कथन है कि आचार्य नागार्जुन ने जिस शून्य का प्रतिपादन किया है वह मात्र निषेधपरक ही नहीं है— 'सर्वालम्बनधर्मैश्च सर्वतत्त्वैरशेषतः । सर्वक्लेशाशयैः शून्यं न शून्यं परमार्थतः ॥' —इस श्लोक के अनुसार (१) 'शून्य' सर्वाभावस्वरूप नहीं है। (२) 'शून्य' ऐसा निरपेक्ष परतत्त्व है जिसमें सम्पूर्णतत्त्वों एवं समस्त क्लेशात्मक वासनाओं की शून्यता स्थित है। यह सर्वाभाव स्वरूप नहीं है। 'शून्य' अवाङ्मनस- गोचर, चतुष्कोटिविनिर्मुक्त एवं मन-वाणी से अतीत है। 'शून्य' ग्राह्य-ग्राहक भावों से शून्य है। विज्ञानवादी कहते हैं समस्त प्रपंच विज्ञप्ति का विकास मात्र है। यह ज्ञान चेतन क्रिया के साथ सम्बद्ध होने के कारण 'चित्त' कहा जाता है। यही 'पारमार्थिक सत्य' है। 'शून्य' एवं 'विज्ञान' मूलतः अभिन्न हैं। शैव ज्ञान मात्र चित्त नहीं है। अन्तःकरण स्वयं जड़ है। ज्ञान तो चैतन्य है फिर वह जड़ चित्त का स्वरूप कैसे हो सकता है? शैवशास्त्र में शून्य की कल्पना—शैव दार्शनिक 'शून्य' के प्रति अपनी पृथक् दृष्टि रखते हैं। उनके मतानुसार 'शून्य' चिदानन्द घन (स्पन्दात्मक) परमशिव है। वह 'शून्य' क्यों है क्योंकि वह विश्वातीत है—मायोपरि है—परिणामादिक से अप्रभावित है—सर्वाभाव का प्रतीक नहीं है—ज्ञान-क्रिया का अभिव्यञ्जक है। शैवदार्शनिक मानते हैं कि शून्य, अभाव, समाधि एवं व्युत्थान आदि सभी में वेदक आत्मा की ज्ञान क्रिया संवलित स्पंदता सभी स्थितियों में अपरिवर्तित है।
प्रथमः निष्यन्दः १९१ सारांश यह है कि स्पन्दमान आत्मसत्ता की प्रत्यभिज्ञा की समस्त अवस्थायें भावात्मक हैं—सर्वाभाव, सर्व शून्य एवं मूढ़ता की अवस्था नहीं है । शैव शास्त्रों में 'शून्य' का अर्थ कुछ अन्य है— १) शून्यता शून्यभूतोऽसौ शून्याकारः पुमान् भवेत् ॥१ (४०) २) अर्धेन्दुबिन्दुनादान्त शून्योच्चाराद भवेच्छिवः ॥२ (४२) ३) विश्वमेतन्महादेवि! शून्यभूतं विचिन्तयेत् ॥ (५७) ४) ज्ञानायत्ता बहिर्भावा अतः शून्यमिदं जगत् ।३ ५) प्रणवादिसमुच्चारात् प्लुतान्ते शून्यभावनात् । शून्यया पराया शक्त्या शून्यतामेति भैरवि ॥४ (३९) अभावसमाधि = (१) साधारण पशुवर्ग में प्राप्त । (२) मोहात्मक सुषुप्ति, प्रगाढ़ निद्रा जैसी कृत्रिम एवं जड़ता की अवस्था । (३) यह अभाव समाधि पशुवर्ग की सुषुप्ति के समान कृत्रिम है और स्मर्यमाण नहीं बन पाता । मैं नहीं हूँ—मैं नहीं हूँ—इस प्रकार अभावात्मक भावना की निरन्तर कल्पना, ध्यान एवं अभ्यास करने पर यदि साधक को ऐसी भूमिका का साक्षात्कार भी हो जाय तो भी वह भूमिका कृत्रिम एवं अनित्य होगी । आत्मा का यथार्थ स्वरूप तो चिद्रूप है और उसकी सत्ता तो त्रिकालाबाधित एवं नित्य है । भट्टकल्लट 'स्पन्दसर्वस्व' में कहते हैं—'अभावभावलब्ध भूमिकस्यापि कृत्रिमा अनित्या सा अवस्था, यथा, सौषुप्ते पदे, यस्मात् चिद्रूपत्वं तु आत्मनः स्वरूपं नित्य सन्निहितं तदेव गुरूपदेशेन नित्यमेवानुशीलनीयम् ॥'५ (अ) पशुवर्ग की सुषुप्ति अवस्था—'शिवसूत्र' में इसकी व्याख्या इस प्रकार की गई है—'शिवसूत्र' (१) 'अविवेको माया सौषुप्तम् । (शिवसूत्र १.१०)' (२) 'यत्रार्थस्मरणे न स्तस्तत्सौषुप्तमुदाहृतम्' (शिवसूत्रः १.१०) (३) 'ज्ञानज्ञेयस्वरूपायाः शक्तेरनुदयो यदा । चिद्रूपस्याविवेकः स्यादसावेवाविमर्शतः । सैव मायावृत्तिजालपोषकत्वात्प्रकीर्तिता ॥ सुषुप्तता ॥ —शिवसूत्रवार्तिक (४) 'यस्तु अविवेकोविवेचनाभावोऽख्यातिः एतदेव मायारूपं मोहमयं सौषुप्तम् ॥ (शिवसूत्रविमर्शिनी १.१०) ।' पशुप्रमाता में सुषुप्ति एवं प्रगाढ़ निद्रा (ज्ञानाभाव) की अवस्था है । इसमें जागृति, स्वप्न, तुरीय, तुरीयातीत आदि किसी भी प्रकार का ज्ञान नहीं रहता किन्तु चेतना रहती है तभी वह सोने के बाद कहता है कि 'मैं खूब गहरी नींद सोया ।' 'मैं सुखपूर्वक सोया' आदि । इसमें तमोगुण के आवरण के कारण उत्पन्न मोह की सान्द्रता के कारण वेद्य प्रमेयों का ज्ञान या स्मृति नहीं रहती— १-४. विज्ञानभैरव (१७) । ५. भट्टकल्लट : 'स्पन्दसर्वस्व' ।
१९२ स्पन्दकारिका 'यथार्थस्वरूपायाः स्तस्तत्सौषुप्तमुदाहृतम् ॥' (१.१०) अविवेक (ज्ञान एवं ज्ञेय रूप चित् शक्ति पर चढ़ा हुआ अविद्यावरण) के कारण प्रमाता की अपनी चिद्रूपता एवं बाह्य रूप में अनन्तावभासन की क्षमता सुषुप्ति में रुक जाती है । सुषुप्ति काल में (ज्ञान-ज्ञेय पर मायीय आवरण पड़ा रहने के कारण) प्राणी की बाह्यार्थों की ओर उन्मुखता, ऐन्द्रिय बोध एवं उनकी स्मृति कुछ भी संभव नहीं रहती । सुषुप्तिगत व्यक्ति की समस्त चेतनाशक्ति, शरीर, प्राण, बुद्धि, इन्द्रिय आदि से सिमट कर पुर्यष्टक में लीन हो जाती है । पुर्यष्टक में सुषुप्तिकालीन संस्कारों के कारण व्यक्ति जागृति की अवस्था में आने पर सुषुप्ति के अनुभव 'मैं सुख से सोया' 'मुझे कुछ भी ज्ञान नहीं है' आदि आदि होते हैं । (आ) योगियों की दृष्टि में सुषुप्ति की अवस्था—योगियों की सुषुप्ति पशुप्रमाताओं की सुषुप्ति के समतुल्य नहीं है । गीताकार कहते हैं— 'या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्तिसंयमी । यस्यां जागर्ति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥' शङ्कराचार्य के लिए निद्रा और समाधि दोनों में भेद नहीं है—वे कहते हैं—'निद्रा समाधिस्थितिः' योगियों के लिए निद्रा समाधि की स्थिति होती है । समाधि की अवस्था में बाह्य पदार्थों की ओर उन्मुखता न रहने के कारण सारे प्रमेय एवं सब कुछ स्वस्वरूप में विश्रान्त रहता है अतः आत्मा तब तक विशुद्ध चिन्मात्र रूप में अवस्थित रहती है । समाधि निष्ठ योगी में ग्राहकता एवं ग्राह्यता का भेद नहीं रहता । उसके समस्त भाव आत्मस्वरूप में विश्रान्त या अवभासित रहते हैं । योगी समाधि की दशा में ज्ञान-क्रिया- पूर्ण स्पन्दन की पूर्ण चेतना रखता है । योगी की सुषुप्ति पशुओं की सुषुप्ति के समान मूढ़ता की दशा नहीं है । यहाँ वेदक योगी किसी भी अभाव या शून्यता को अनुभव नहीं करता । समाधि में अनुभूत आत्मस्वरूप की सत्ता कोई प्रातिभासिक एवं व्यावहारिक नहीं प्रत्युत् शाश्वतिक एवं पारमार्थिक होती है । 'अभाव समाधि' एवं 'शून्य समाधि' दोनों जड़ हैं । आत्मानुभूति सतत स्फुरण- समन्विता होने के कारण नित्यात्मिका होती है । किन्तु पशुभाव में होने वाली अनुभूति अनित्य होती है । 'मैं नहीं हूँ' यह अभावात्मक अनुभूति भी किसी भावसत्ता (वेदक) पर ही आधृत है । यदि भाव (वेदक) की ही सत्ता न रहे तो अभाव ('मैं नहीं हूँ') की स्मृति किसे होगी? 'शिवसूत्र' (१.१०) में इन्हीं दृष्टियों से योगियों की सुषुप्ति एवं उनकी समाधि को समतुल्य कहा गया है— ग्राह्य-ग्राहकभेदासञ्चेतनरूपश्च समाधिः सौषुप्तं, इत्यप्यनया वचोयुक्त्या दर्शितम् ॥'१ १. शिवसूत्रविमर्शिनी (१.१०) ।
प्रथमः निष्यन्दः १९३ स्पन्दतत्त्व की दो अवस्थायें— अवस्थायुगलं चाऽत्र कार्यकर्तृत्वशब्दितम् । कार्यता क्षयिणी तत्र कर्तृत्वं पुनरक्षयम् ॥ १४ ॥ (यहाँ पर) अवस्थाद्वय को ‘कार्य’ एवं ‘कर्ता’ कहा गया है (इसमें) कार्यता तो नश्वर है किन्तु वहीं ‘कर्तृत्व’ अविनश्वर है ॥ १४ ॥ १
- सरोजिनी * ‘स्पंद’ की दो अवस्थायें हैं—(१) कर्तृत्व (Subjectivity) (२) कार्यत्व (Objectivity) । कार्यता = किसी कार्य का किया जाना । कार्य-निष्पादन ।। क्रिया करने का भावः (Objectivity) । ‘कर्तृत्व’ = कर्ता की क्रिया शक्ति, सिसृक्षा-बल, कर्ता की सृजन- शक्ति (Subjectivity) । ‘स्पंद’ की दो अवस्थायें हैं । ‘स्पंद’ क्या है? स्वयं परमतत्त्व ही ‘स्पन्द’ है । वह अपने को ‘शब्द’ के द्वारा अभिव्यक्त करता है । ‘स्पन्द’ वाच्य है और ‘शब्द’ वाचक है । ‘स्पन्द’ का अर्थ है किंचित् हिलना ।। निस्तरंग परमात्मा में जो एक साथ सर्वरूप से उन्मुख होने की क्षमता है—वहीं ‘स्पन्द’ है—किंचित् चलन है । यह किंचित् चलन भी परमात्मा ही है । इस स्पन्द तत्त्व में दो अवस्थायें विद्यमान है—(१) कार्य-कर्ता (२) भोग्य-भोक्ता (३) दृश्य-द्रष्टा । इन्हें ‘वेद्य’ एवं ‘वेदक’ भी कहते हैं । इनके अध्यास से जो कार्यता है वह क्षयिष्णु है और उत्पत्ति-विनाश युक्त है । जो शुद्धकर्ता, भोक्ता एवं द्रष्टा (आवेदक) है वह अक्षय है । वह निर्बाध, निरवधि एवं चित्स्वरूप है ।२ स्पन्द तत्त्व की अवस्थायें—कार्य, भोग्य, दृश्य, वेद्य, स्मर्तव्य, ज्ञेय, कर्ता, भोक्ता, द्रष्टा, वेदक, स्मर्ता एवं ज्ञाता हैं । अत्र—इस प्रतिपादित आत्माख्य पर तत्त्व में । अवस्थायुगलं = दो अवस्थायें—(१) हेय (२) उपादेय । वैसे तो ये अवस्थायें अनन्त है फिर भी विश्ववैचित्र्य के कारण द्विविध हैं । उनमें से एक परमार्थस्वरूप परमेश्वर या आत्मा है जो कि निरुपम, निष्प्रतीघात, निरूपादान निजैश्वर्य शक्ति बल से दो रूपों में अपने को अवभासित करके क्रीड़ा करता है—इसी रहस्य को अभिव्यंजित करने हेतु कारिकाकार ने अवस्थाद्वय का उल्लेख किया है । ये अवस्थायें हैं—(१) कार्य (२) कर्ता । कर्तृत्व, भोक्तृत्व एवं वेदकत्व द्वारा तो जिस चेतनभाव को सूचित किया गया है १. ‘The pair of states is here styled—objectivity and subjectivity. The objectivity is perishable and the subjectivity is indestructi- ble’—स्पन्दनिर्णय । २. स्पन्दप्रदीपिका । स्पं० १३
१९४ स्पन्दकारिका वह एक ऐसी अवस्था है जो स्वतन्त्र है तथा द्वितीय अवस्था इसके विपरीत कार्यरूपा, भोग्या, वेद्या, जड़ात्मिका एवं परतन्त्रात्मिका है । 'शब्दितं' = 'शब्दितं' कहकर यह सूचित किया गया है कि इन दोनों अवस्थाओं को भिन्न-भिन्न रूप में समझने के लिए शब्द तो दे दिया गया है किन्तु उनमें वास्तविक भेद नहीं है । यह कार्यरूपा अवस्था प्रकाशमानता से अपनी सत्ता प्राप्त करता है और प्रकाशमान है परमात्मा । चूँकि 'कार्य' किसी कर्ता पर निर्भर है अतः कार्य एवं कर्ता तत्त्वतः भिन्न नहीं है । प्रकाशमान कार्य, प्रकाशैकस्वभाव से अभिन्न हैं । कर्तृरूपावस्था नित्या है, नित्योदित है, सर्वावस्थाव्यापक और अविनाशी है । 'कार्य' उदय-व्यय के सम्बन्ध के कारण नश्वर है ।¹ नित्योदित होने के कारण सदा प्रकाशमान होने पर भी वह तत्त्व अप्रत्यभिज्ञायमान होने के कारण बन्धन का कारण है । अतएव लब्धोपदेश द्वारा सभी अवस्थाओं में वेद्य एवं वेदक रूप दो तत्त्वों से संगृहीत विश्व प्रपञ्च के भेदात्मक होने के कारण वेदकांश को 'मैं हूँ' अर्थात् मैं समस्त वेद्यों के स्वरूप से परे हूँ इस प्रकार परामर्श करना चाहिए । इसी तथ्य का उपदेश देने हेतु अपनी माया से उद्भासित द्वैतात्मक रूप का प्रतिपादन करने हेतु ग्रन्थकार चौदहवीं कारिका कह रहा है । भट्टकल्लट (स्पन्दकारिकावृत्ति) में इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं—(१) स्पन्दात्मक आत्मतत्त्व की जो दो अवस्थायें होती हैं उनके नाम हैं— 'कार्यता' और 'कर्तृत्व' । इसमें एक भोग्य है दूसरा भोक्ता है । (२) 'भोग्य' उत्पन्न एवं नष्ट दोनों होता है । (३) 'भोक्ता' चिद्रूप होने के कारण न तो उत्पन्न होता है और न तो नष्ट होता है प्रत्युत वह नित्य है । अभिनवगुप्त कहते हैं कि परतत्त्व का स्वातन्त्र्य सदैव निरावरण होता है । परतत्त्व 'वेदक' एवं 'वेद्य' दोनों स्वरूपों में अवभासमान रहता है । यह तत्त्व एक साथ ही 'कर्ता' एवं 'कार्य' दोनों की भूमिकायें निभाता है । कर्तृता की अवस्था— अपरिणामी, अक्षर, अविचल, नित्य कार्यता की अवस्था—परिणमनशील, क्षर, चल, अनित्य एवं नश्वर ।। 'स्पन्द' के जो दो रूप हैं—उनके पक्ष भी दो हैं— १) कर्तृत्व पक्ष २) कार्यत्व पक्ष (वेदक पक्ष) (वेद्य पक्ष) (शक्ति का वास्तविक अनश्वर रूप) (देश, काल के प्रभाव से प्रभावित होने के कारण उदयास्तमय, नश्वर) अन्ततः कार्यता उपसंहृत होकर कर्तृत्व अंश में विश्रान्ति लेती है और निर्मल ज्ञानक्रियात्मक चिद्रूप में अवभासमान रहती है । समाधि की अवस्था में इस कार्यतापक्ष का लोप हो जाता है । १. स्पन्दकारिकाविवृति (रामकण्ठाचार्य) ।
प्रथमः निष्यन्दः १९५ स्पन्द की अवस्थायें— स्पन्द विज्ञान की दृष्टि में स्पन्द की दो अवस्थायें— इस स्पन्द दर्शन में 'स्पन्द तत्त्व' की दो अवस्थाएं मानी गई हैं । स्पन्द की अवस्थायें—(१) 'कार्यता' (२) 'कर्तृता' । कार्यता क्षणभंगुर है, नश्वर है । कर्तृता अविनश्वर है, स्थायी है और नित्य है। आचार्य भट्टकल्लट 'स्पन्दसर्वस्व' में कहते हैं कि— (क) स्पन्दात्मक आत्मतत्त्व की निम्न अवस्थायें हैं— (१) 'कार्यता' (२) 'कर्तृता' (१) भोग्यता (२) 'भोक्ता' (नश्वर) (अनश्वर) (अचिद्रूप) (चिद्रूप) (वेद्य) (वेदक) 'अवस्था युगलम्' अवस्था द्वयमेव कार्यकर्तृत्वसंज्ञं भोग्यभोक्तृभेदभिन्नम्' तत्र यो भोग्यरूपो भेदः स उत्पद्यते नश्यति च, भोक्तृभेदस्तु चिद्रूपः पुनर्न जायते न कदाचिद् विनश्यति तेन नित्यः ॥१ स्पन्दात्मक आत्मसत्ता के जो दो रूप हैं उनमें—(क) वेदक रूप (ख) वेद्य रूप; (क) कर्ता (ख) कार्य; (क) भोक्ता (ख) भोग्य । इन दो रूपों में आत्मा का 'क' रूप—वेदक, कर्ता, भोक्ता ही नित्य है—'ख' रूप नश्वर है । अहंविमर्शात्मक स्पन्द तत्त्व पूर्ण स्वतन्त्र है। इसमें दो अवस्थायें अखण्ड रूप में निरन्तर स्पन्दायमान हैं जो निम्न हैं— (क) 'सामान्य अवस्था' । (ख) 'विशेष अवस्था' । सामान्यावस्था—समस्त उपरागों से शून्य, विशुद्ध, चिद्रूप । यही है कर्तृत्व की अवस्था । इसमें समस्त बाह्य प्रमेय समूह, विभाग शून्य, 'अहं विमर्श' के रूप में स्थित हैं । विशेष अवस्था उस दशा का नाम है जिसमें मूल चिद्रूपता, स्वोत्पन्न अज्ञान के द्वारा, स्वस्वरूप को आच्छादित करके देह, प्राण, बुद्धि, ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ या घट पट आदि अनन्त जड़ वेद्य वस्तुओं के रूप में अवभासित होती है। यही है कार्यता, भोग्यता, वेद्यता एवं प्रमेयता की अवस्था ॥ आचार्य अनिभवगुप्तपाद कहते हैं कि—मूल तत्त्व अपनी 'स्वातन्त्र्य शक्ति' की सामर्थ्य से वेदक एवं वेद्य दोनों रूपों में अवभासित होता है तत्त्व एक साथ ही कर्ता- कार्य, अपरिणामी-परिणामी, अचल-चल, अनश्वर-नश्वर, भोक्ता-भोग्य आदि सभी है— १. भट्टकल्लटः 'स्पन्दसर्वस्व' ।
१९६ स्पन्दकारिका 'निरावरणमाभाति भात्यावृतनिजात्मकः ॥' (तं० १.९३) समाधि की अवस्था—इसमें कार्यता विलीन हो जाती है। कार्यता ज्ञानक्रियात्मक चिद्रूप में अवभासमान रहती है। कर्तृत्वांश कभी परिवर्तित नहीं होता। स्पन्दात्मक आत्मतत्त्व की अवस्थायें— स्पन्दतत्त्व की दो अवस्थायें हैं—(१) 'वेदक' (२) 'वेद्य' (या 'कर्ता' एवं 'कार्य')। इन्हें ही 'भोक्ता' एवं 'भोग्य' भी कहते हैं। इनके विविध अभिधान हैं— (१) वेदक, कर्ता, भोक्ता, अक्षय (२) वेद्य, कार्य, भोग्य, क्षयिष्णु। 'अवस्थायुगलं चात्र कार्यकार्तृत्वशब्दितम्। कार्यता क्षयिणी तत्र कर्तृत्वं पुनरक्षयम् ॥' 'स्पन्दतत्त्व' की युगल अवस्थायें—कर्ता एवं कार्य—भट्टकल्लट के शब्दों में—'अवस्थायुगलम्' अवस्थाद्वयमेव कार्यकार्तृत्वसंज्ञं भोग्यभोक्तृभेदभिन्नम्, तत्र यो भोग्यरूपो भेदः स उत्पद्यते नश्यति च, भोक्तृभेदस्तु चिद्रूपः पुनर्न जायते न कदाचित् विनश्यति तेन नित्यः ॥१ १. स्पन्दतत्त्व की कर्तृतावस्था या कर्ताभाव (कर्तास्वरूप) अखण्ड एवं अक्षर है। २. स्पन्दतत्त्व की कार्यावस्था या कार्य भाव (कार्यस्वरूप) क्षयिष्णु है। कारिकाकार ने इन अवस्थाओं को (१) 'कर्ता' एवं (२) 'कार्य' तथा भट्टकल्लट ने (१) भोक्ता (२) 'भोग्य' शब्दों से अभिहित किया है। भोग्य—उत्पन्न, परिवर्तनशील, कार्य एवं नश्वर है। भोक्ता = अनुत्पन्न, अपरिवर्तनशील, कारण, अनश्वर, चिद्रूप। इस अहं विमर्शात्मकस्पन्दतत्त्व की अन्य अवस्थाओं का विवेचन किया गया है जो कि निम्नांकित हैं— (१) 'सामान्यावस्था' (२) 'विशेषावस्था'। (क) स्पन्दतत्त्व की सामान्यावस्था—वह अवस्था जो समष्टिगत, निर्विकल्प, विशिष्ट लक्षणों, व्यावर्तक लक्ष्मणरेखाओं एवं भेदक रेखाओं से शून्य तथा विशिष्ट धर्मों से विमुक्त। यह प्रत्येक अराग से शून्य एवं विशुद्ध चिद्रूपता की सामान्यावस्था है। इसमें प्रमेयवर्ग के विभाजन नहीं हैं और यह विभागहीन अहंविमर्शात्मक सूक्ष्मावस्था है। इसे ही अवस्थायुगलं चात्रकार्यकर्तृत्वशब्दितम्' कारिका में 'कर्तृत्व' या कर्ता कहा गया है। कर्तृत्वांश में किसी भी अवस्था में कोई भी परिवर्तन संभव नहीं है। वेदकावस्था शाश्वत, अक्षुण्ण एवं नित्य तथा शक्ति का यथार्थ स्वरूप है। (ख) स्पन्दतत्त्व की विशेषावस्था—यह कार्यता की अवस्था है। इसे ही सूत्रकार ने 'कार्य' एवं वृत्तिकार भट्टकल्लट ने 'भोग्य' शब्द से अभिहित किया है। प्रगाढ़ १. स्पन्दसर्वस्व।
प्रथमः निष्यन्दः १९७ ध्यान या समाधि की अवस्था में इस कार्यता वाले पक्ष का उपसंहार हो जाता है । यह संहृत होकर कर्तृता में विश्रान्तभाव में अवस्थित हो जाती है । यह समाधि की दशा में अपने निर्मल, ज्ञान क्रियात्मक, चिद्रूप में अवभासित होती है । इस प्रकार समाधि की अवस्था में स्पन्दात्मिका कर्तृता (वेदकता) (बाह्य प्रमेय समूह की ओर उन्मुखता छोड़कर) अपने कार्यांश को अपने में संलीन करके निर्मल चिद्रूप (चिन्मात्र) स्वरूप में अवस्थित हो जाती है । कार्यता अंश के संलीन, विश्रान्त या लयीभूत हो जाने की स्थिति में एक प्रशान्त समाधि की अवस्था की अनुभूति होती है । इसी तथ्य को अगली कारिका में इस तरह कहा गया है— 'कार्योन्मुखः प्रयत्नो यः केवलं सोऽत्र लुप्यते । तस्मिंल्लुप्ते विलुप्तोऽस्मीत्यबुधः प्रतिपद्यते ।।' (१५) स्पन्दतत्त्व की यह विशेषावस्था वह स्थिति है जिसमें कि नित्य चिद्रूप स्पन्दतत्त्व स्वस्वरूप को आच्छादित करके, अपनी अविद्या या माया के द्वारा अस्वतन्त्र होकर (मित होकर) घट, पट, प्राण, चित्त, देह, इन्द्रियाँ, अन्तःकरण, एवं जड़ वेद्य पदार्थों के रूप में अवभासित होने लगता है । यही कार्यता की अवस्था है । जड़ समाधि में अवस्थित अबुध योगी की अभावात्मक मिथ्यानुभूति— कार्योन्मुखः प्रयत्नः यः केवलं सोऽत्र लुप्यते । तस्मिँल्लुप्ते विलुप्तोऽस्मीत्यबुधः प्रतिबुध्यते ॥ १५ ॥ केवल वह अध्यवसाय जो कि कार्य को निष्पादित करने की ओर प्रवृत्त है यहाँ वही (मात्र) लुप्त हो जाता है । उसके लोप हो जाने पर एक मूर्ख व्यक्ति ऐसा समझता है कि 'मैं' (ही) विलुप्त हो गया हूँ ॥ १५ ॥
- सरोजिनी * कार्योन्मुखः = कार्य की ओर उन्मुख । कार्य-प्रवृत्त । कार्याभिप्रेरित । कार्य = बाह्यार्थ कार्यवर्ग । लुप्यते = (न लक्ष्यते): दिखाई नहीं पड़ता । प्रयत्न = अध्यवसाय । व्यापार । प्रयास । बाह्य करण व्यापार रूप कार्य । यः = जो । केवलं = मात्र । सोऽत्र = वह यहाँ । लुप्यते = लुप्त हो जाता है । तस्मिंल्लुप्ते = उसके लुप्त हो जाने पर विलुप्तोस्मि = मैं ही लुप्त हो गया हूँ । मैं नष्ट हो गया हूँ । अबुधः = अज्ञानी । कार्योन्मुख = कार्यसम्पदनाभिमुख ।१ प्रतिबुध्यते = समझता है । लुप्यते—इन्द्रियों के स्थगित हो जाने से व्यापार सामर्थ्य रुक जाने से लुप्त हो जाता है । यह बाह्यार्थ कार्यवर्ग जब क्षीण होने लगता है तब कार्य-सम्पादनानुकूल बाह्येन्द्रियों का व्यापार रूप प्रयत्न लुप्त हो जाता है । वह सिकुड़कर आत्मा में लीन हो १. स्पन्दप्रदीपिका ।
१९८ स्पन्दकारिका जाता है अतः दृष्टिगोचर नहीं होता । इन्द्रियाँ यदि स्थगित हो गईं तो प्रयत्न की शक्ति कहाँ रही? लुप्त तो प्रयत्न होता है । किन्तु अज्ञानी यह मानता है कि मैं ही लुप्त हो गया—मैं ही नष्ट हो गया ।१ वस्तुतः चिद्रूप का विनाश कभी होता ही नहीं । कहा भी गया है—'शरीर का विनाश हो जाने पर भी विज्ञप्ति का नाश कभी नहीं होता । सूर्यकान्त मणि का अभाव हो जाने पर भी सूर्य की कोई हाँनि नहीं होती । प्रतिबुध्यते 'स्पन्दप्रदीपिका' में इसका पाठ 'प्रतिपद्यते' है । प्रतिपद्यते = जानता है । चिद्रूप का विनाश तो कभी होता नहीं किन्तु ऐसा समझता अवश्य है— 'विज्ञप्तेर्न विनाशोऽस्ति विनष्टेऽपि शरीरके । अभावे सूर्यकान्तस्य नैवास्ति सवितुः क्षतिः ।।'२ लुप्यते = लुप्त हो जाता है । क्यों लुप्त हो जाता है? स्वात्मन्यास्ते—वह आत्मा में स्थित हो जाता है अतः बाह्येन्द्रियाँ उसे देख नहीं पातीं अतः लगता है कि वे सदैव के लिए नष्ट हो गई हैं । पूर्वपक्ष—(Objection) अभाव (Non-existence) या शून्य पर ध्यान देने के समय एवं प्रगाढ़ निद्रा के समय हम आत्मा को 'कर्ता' के रूप में अनुभव नहीं करते क्योंकि उस स्थिति में उसका कर्तृत्व रहता ही नहीं ।३ उत्तर पक्ष—हाँ यह सत्य है कि इन्द्रियाभिप्रेरित कार्योन्मुख प्रयास उपर्युक्त स्थिति में समाप्त हो जाते हैं क्योंकि उस समय ज्ञेय के नाश (Objective-destruction) के कारण कर्तृत्व संभव ही नहीं रहता । इस समय विषय और विषयी में (प्रमेय-प्रमाता, कर्ता-कार्य, ज्ञाता-ज्ञेय) में भिन्नता नहीं रह जाती । किन्तु इस समय (कार्योन्मुखी प्रवाह बन्द होने के समय) अज्ञानी व्यक्ति यह सोचता है कि 'मैं नष्ट हो गया' क्योंकि उसका स्वस्वभाव आच्छादित रहता है । विनाश कभी आन्तर स्वस्वभाव का हो ही नहीं सकता क्योंकि वह तो प्रकाशस्वरूप है, चेतना का निलय है और सर्वज्ञता का धाम है । सर्वज्ञातृत्व (Omniscience) ही पूर्ण कर्तृत्व है । क्योंकि अन्य कोई तो आन्तर प्रकृति के नाश का ज्ञाता हो ही नहीं सकता । किन्तु यदि अन्य ज्ञाता की कल्पना भी कर ली जाय तो वह भी अपनी आन्तर चेतना का प्रतिनिधि होगा । यदि वह ज्ञाता अस्तित्व में है ही नहीं फिर तुम कैसे कह सकते हो कि विनाश की अवस्था होती है ?४ प्रतिपक्ष—चलिये मैंने मान लिया कि कोई भी व्यक्ति आन्तर स्वभाव के नाश को नहीं देख पाता-उसका कोई ज्ञाता नहीं है—लेकिन उसकी जो प्रकाशमयी प्रकृति है वह तो देखती है ।५ ग्रन्थकार—फिर तुम अभाव या शून्य (Non existence on vacuum) को उसके आन्तर भाव से अभिन्न कैसे कह सकते हो? यह सत्य है कि जिस प्रकार किसी घड़े का न होना इस बात से प्रमाणित एवं निर्णीत किया जाता है कि जिस स्थान पर घड़ा था वहाँ है भी या नहीं । उसी प्रकार आत्मा के अभाव को भी इसी तरह निर्णीत १-३. स्पन्दप्रदीपिका । ४-५. स्पन्दनिर्णय ।
प्रथमः निष्यन्दः १९९ किया जा सकता है कि कोई भी ज्ञान या अनुभव क्या आत्मा (या अपनेपन) के अभाव में संभव है यदि संभव है तो आत्मा का अभाव माना जा सकता है अन्यथा नहीं । लेकिन इस उदाहरण में भी 'ज्ञाता' का अस्तित्व आवश्यक है। अतः आत्मा के अभाव के होते हुए भी उसके अभाव का ज्ञान किसे होगा ?१ यदि पदार्थमयं जगत् (Objective world) के प्रति कार्योन्मुख प्रयत्न का लोप होने पर आभ्यन्तरिक स्वस्वभाव (Inward nature) का भी लोप मान लिया जाए तो आगामी समय में अन्य प्रयत्न का अवबोध या ज्ञान (Perception) संभव नहीं होगा और परिणामस्वरूप अन्य प्रयत्न का भी ज्ञानाभाव हो जाएगा। इसके अतिरिक्त यह भी कि, कोई भी मूर्ख व्यक्ति भला स्वप्न-शून्य प्रगाढ़ निद्रा में (सुषुप्ति के समय) बहिर्गामिनी शक्ति के अबोध (Non perception) द्वारा अन्तर्मुखी अनुभूति के लुप्त होने की शङ्का, यह जानते हुए भी कि एक चीज को लुप्त होना किसी दूसरी वस्तु को प्रभावित नहीं कर सकता, कैसे कर सकता है?२ ज्ञाता की लुप्तता (Disappearance) संभव नहीं है। इस पादार्थिक जगत् के प्रति उन्मुख कार्यों की अनुपस्थिति या अनुपस्थिति की अभिव्यक्ति के द्वारा, प्रकाश से अभिन्न एवं अन्तरोन्मुखी ज्ञाता की लुप्तता संभव नहीं है । अन्तर्मुखी स्वभाव (Inward faced nature), जो कि सर्वज्ञता के गुण के मूल स्थान का निर्धारण करता है,—अभाव (अनुपस्थिति) की दशा को भी जानता है क्योंकि अन्यथा वह दशा अस्तित्व में रह ही नहीं सकती। 'अन्तर्मुखी' शब्द बाह्यपदार्थता (Objectivity) को आत्म चैतन्य (Subjectivity) से पृथक् करता है। दोनों परस्पर विरोधी भाव है। 'अन्तर्मुखी' का अर्थ है—वह जिसमें पराहंता (Supreme egaity) अधिपत्य रखती हे। ज्ञाता ही सत्य है, ज्ञेय तो उसका विषय है।३ इसीलिए कहा गया है— न तु योऽन्तर्मुखोभावः सर्वज्ञत्व गुणास्पदम् । तस्य लोपः कदाचित्स्यादन्यस्यानुपलंभनात् ॥ कार्ये = निर्मेय वेद्य या वस्तु में । उन्मुखः = संमुखीभूत । उसके संपदनार्थ प्रवण । यः प्रयत्नः = जो प्रयास । कर्तृत्व, सहज उत्साह । स केवलं = वह मात्र । यही परमकारण या व्यापार का हेतु है । क्योंकि उस दशा में स्थूलरूप कार्य के अभाव से । लुप्यते = लुप्त हो जाता है । अनभिव्यक्त रूप में आत्मा में ही अमुख्य विलुप्तोस्मि = मैं लुप्त हो चुका हूँ। प्रतिपद्यते = समझता है । बनकर अवस्थित रहता है। **तस्मिन्—**उसमें । उस प्रयत्न में । (उस प्रयत्न में तत्काल ही) । १-३. स्पन्दनिर्णय ।
२०० स्पन्दकारिका लुप्ते = लुप्त हो जाने पर । अबुधः = तत्त्वावबोधशून्य । विलुप्तोऽस्मि इति प्रतिपद्यते—'मैं नहीं हूँ' इस प्रकार भाव-वैलक्षण्य के कारण तो वस्तु का परिच्छेद (विभाजन) ही हो जाएगा । (मैं लुप्त हो गया हूँ—ऐसा समझना चाहिए ।) यह स्वयंसिद्ध आत्मा तो स्वसिद्ध है अतः उसका अभाव कैसे संभव है? 'सिद्धः कथं निषेधस्य विषयः स्यात् ?' जिस प्रकार घर में स्थित किसी व्यक्ति को 'ऐ देवदत्त'—ऐसा कहकर बुलाया जाय तो वह आत्मा का अपह्नव (अनात्मभाव) करने वाले व्यक्ति से कह सकता है कि 'मैं देवदत्त नहीं हूँ' क्योंकि आत्मा देवदत्त नहीं है और न तो किसी आत्मा का नाम ही देवदत्त हो सकता है । वह यह अवश्य कह सकता है कि 'मैं हूँ' किन्तु वह आत्मा की दृष्टि से यह अवश्य कह सकता है कि 'मैं देवदत्त नहीं हूँ' । अभाव समाधि आदि अवस्थाओं में कार्य के अभाव के कारण तथा इन्द्रियों के व्यापार के रुक जाने से 'आत्मभाव प्राप्त हो गया' इस प्रकार का प्रत्यय मात्र भ्रान्ति है सत्य नहीं है तथा इन्द्रियों के न रहने से यह मानना कि—'आत्मा का अभाव हो गया है'—भ्रान्ति है—'अभावसमाध्यवस्थासु कार्याभावात् करणव्यापारविरतिमात्रेणात्माभाव- प्रत्ययो भ्रान्तिरेवेति ॥'१ कारिकाकार ने (१) 'कार्योन्मुख प्रयत्न' एवं (२) अन्तर्मुख भाव' दोनों की तुलनात्मक व्याख्या की है— (१) कार्योन्मुखः प्रयत्नो यः केवलं सोऽत्र लुप्यते ॥ १५ ॥ (२) म तु योऽन्तर्मुखो भावः सर्वज्ञत्वगुणास्पदम् ॥ १६ ॥ (अन्तर्मुख = अहं प्रत्यवमर्श के रूप में स्पन्दायमान) 'कार्योन्मुख प्रयत्न' : 'तस्मिंल्लुप्ते विलुप्तोस्मीत्यबुधः प्रतिपद्यते ॥ 'अन्तर्मुख भाव' : 'तस्य लोपः कदाचित् स्यादन्यस्यानुपलंभनात् ॥' (यहाँ किसी अन्य का अस्तित्त्व भी संभव नहीं होता—'अन्यस्य अनुपलंभनात्') अन्तर्मुखीन स्थिति में कार्यों का अभाव होता है अतः वहाँ कार्योन्मुख प्रयत्न संभव ही नहीं है । अन्तर्मुखता की स्थिति में कार्य तो नहीं किन्तु 'भाव' तो रहता ही है । इसीलिए कारिकाकार ने 'कार्य' के साथ 'प्रयत्न' एवं कर्तृता (अन्तर्मुखता) के साथ 'भाव' शब्दों का प्रयोग किया है । 'प्रयत्न' स्वाभाविक नहीं कृत्रिम होता है किन्तु आत्मा की क्रियात्मकता प्रयत्न नहीं स्वाभाविक होती है । समाधिगत अनुभूतियाँ भट्टकल्लट स्पन्दसर्वस्व में कहते हैं कि—समाधिकाल में केवल इतना हो जाता है कि कार्य सिद्ध करने की जो क्षमता इन्द्रियों में होती है और उसके माध्यम से वे शब्द- १. 'स्पन्दकारिकाविवृति' (रामकण्ठाचार्य) ।
प्रथमः निष्यन्दः २०१ स्पर्श-रूप-रस-गंध आदि पंच महाविषयों को जो ग्रहण करती हैं वह क्षमता लुप्त हो जाती है अर्थात् इन्द्रियों में विषय-ग्रहण की क्षमता का तिरोधान हो जाता है। अज्ञ यह समझने लगता है कि इन्द्रियों द्वारा विषय ग्रहण की क्षमता के लोप के कारण मेरा भी लोप हो गया है—यह अनुभव मात्र अज्ञान है क्योंकि नित्य स्वभाव का कभी लोप नहीं होता— 'कार्यसंपादनसामर्थ्यं बाह्यकरणव्यापाररूपं केवलं विलुप्यते', स्थगितेन्द्रियस्य तस्मिन् विलुप्ते सामर्थ्ये, 'स्वभावों में विलुप्त'—इति अबुधो जानाति, न तु भावस्य विनाशोस्ति ॥'१ कारिकाकार कहते हैं कि समाधिकाल में व्यक्ति के इन्द्रियों की कार्यसम्पादनो- न्मुख अध्यवसाय (कार्योन्मुख प्रयत्न) ही रुकता है—जीव की बहिर्मुखी कार्यता या चिकीर्षा का प्रयास या क्रियान्वय रुकता है किन्तु उसके लुप्त होने से यह सोचना कि 'मैं ही विलुप्त हो गया हूँ'—ऐसा अनुभव तो केवल अज्ञानियों को होता है अन्य को नहीं ॥ अभाववाद का खण्डन—अभाववादी दार्शनिक यह मानते हैं कि सारे 'भाव' काल्पनिक हैं—अध्यारोपित हैं—अध्यास है और सत्य मात्र—'अभाव' है। जो कुछ भी है—यथा शरीर, शरीरांग, इन्द्रियाँ, उनकी अनुभूतियाँ, जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति आदि अव- स्थायें, सुख, दुःख, बाल्य-यौवन-वार्धक्य, जीवन, मरण लिंगभेद, स्वर्ग-नरक, बन्धन- मुक्ति आदि सभी क्षणभंगुर हैं और कतिपय काल तक ही अस्तित्व में रहते हैं बाद में उनका अभाव हो जाता है—कोई भी भाव स्थायी नहीं होता अतः 'अभाव' ही सत्य है—अनस्तित्व ही परम यथार्थ है। अभाववादी आत्मा को भी स्थायी एवं नित्य भाव की वस्तु नहीं मानते। उनका कथन है—'आत्मा ध्वंसो हि मोक्षः ॥'२ अभाववादी पदार्थों के अनस्तित्व को परम सत्य स्वीकार करते हैं। अभाववादी ध्यान करते हैं—'मैं नहीं हूँ, मेरा भाव (अस्तित्त्व) नहीं है।' इस प्रकार की भावना का अभ्यास करने वाले ये अभाववादी जब कभी समाधि में पहुँचते हैं तो इन्द्रियों का अपने व्यापारों से विरत हो जाने पर—बाह्य विषयों की अनुभूति का अभाव होने पर—शब्द- स्पर्श-रूप-रस-गंध विषयों को ग्रहण न कर पाने के कारण यह समझते हैं कि मेरा जो 'मैं' (आत्मा) था उसका भी अभाव हो गया है। तुरीय शाक्त भूमिका पर आरूढ़ योगी ज्ञान-क्रियासमन्विता स्पन्दन का अनुभव करते रहने के कारण सदैव वेदक होने का अनुभव करता रहता है। यह जो 'कार्योन्मुख प्रयत्न' लुप्त हो जाता है यदि इसके साथ ही वेदक (प्रमाता) को अपने कर्तृत्व अंश का भी लोप अनुभव में आ जाता तो अभाववाद संगत माना जाता किन्तु प्रश्न यह है कि यदि इस कर्तृत्वांश का भी लोप संभव हो जाय तो इस लोप का अनुभव कौन करेगा? यह अनुभविता ही 'कर्ता' है, आत्मा है—भाव है। फिर अभाववाद कैसा? किसी वस्तु के लुप्त होने की अनुभूति का वेदक भी तो कोई न कोई होगा? यह वेदक (आत्मा) भाव सत्ता (अस्तित्त्व) ही तो है। यदि आत्मा भी अभाव (सत्ताहीन) मान ली जाय तो लोप (अभाव) की अनुभूति किसको होगी? अतः आत्मा के १. 'स्पन्दसर्वस्व' : भट्टकल्लट। २. 'सर्वदर्शनसंग्रह' (माधवाचार्य)।
२०२ स्पन्दकारिका भावसत्ता होने के कारण अभाववाद संगत नहीं है। 'सब कुछ अभावात्मक है—' अभाव ही परम यथार्थ है—अनस्तित्त्व ही परम सत्य है'—इस सर्वाभाववाद का साक्षी या अनुभविता कौन है? इसका अनुभविता या साक्षी 'भाव' (सत्तासीन वस्तु) ही तो होगा— यह आत्मा ही 'भाव' है अतः अभाववाद अज्ञता की दृष्टि है। यह भाव सत्ता (आत्मा) ही किसी अभाव को अभाव (न होने के भाव = अनस्तित्त्व) के रूप में सत्ता प्रदान करके (अर्थात् अभाव के रूप में स्थित मानकर) उसका (भावशून्यता का, अनस्तित्त्व का, अभाव का) अनुभव करती है। अतः वेदक सत्ता का किसी भी अवस्था में लोप नहीं हो सकता। यह वेदक सत्ता ही आत्मा है। अतः 'सर्वाभाववाद' मिथ्या कल्पना है। समाधि में सर्वाभाववाद की अनुभूति नहीं होती। समाधि में केवल कार्यता ('कार्योन्मुख प्रयास') का लोप होता है। स्पन्दात्मिका कर्तृता (वेदकता) बाह्य प्रमेय समूह की ओर प्रवृत्तोन्मुख न होने के कारण अपने ही कार्यता अंश को अपने में ही विलीन करके, विशुद्ध चिन्मात्र रूप में स्थित हो जाती है। अप्रबुद्ध योगी ही समाधि दशा में कार्यता के लुप्त होने पर यह समझते हैं कि हम भी लुप्त हो गए या अभाव में विलीन हो गए। 'स्वभाव' (आत्म सत्ता) का लोप कभी नहीं होता ॥ समाधि की अवस्था में कार्यता सम्बद्ध स्पन्दतत्त्व की स्थिति—आचार्य अभिनवगुप्तपाद कहते हैं कि विशुद्ध चिन्मात्र स्पन्द तत्त्व अपनी 'स्वातन्त्र्य शक्ति' के कारण प्रत्येक काल खण्ड में 'वेदक' एवं 'वेद्य' दोनों स्वरूपों में नित्य अवभासित रहता है अर्थात् वह एक ही साथ एवं एक ही समय—कार्यता एवं कर्तृता दोनों अवस्थाओं में स्पन्दमान रहता है। अन्तर यह है कि एक परिणामी, क्षयिष्णु, परिवर्तनशील अवस्था है जब कि दूसरी अपरिणामिनी, अक्षर एवं अपरिवर्तनशील तथा नित्य अवस्था है। कार्योन्मुख प्रयत्न समाधिकाल में लुप्त हो जाता है और इस स्थिति में अभा- वात्मक स्थिति का भी बोध होने लगता है अतः ऐसे योगी अभाव को ही परमसत् (पारमार्थिक सत्ता) मानकर 'अभाववाद' का प्रतिपादन करने लगते हैं किन्तु यह उनका भ्रम है क्योंकि परमार्थ सत् या पारमार्थिकी सत्ता अभावात्मक नहीं भावात्मक है। भट्टकल्लट प्रस्तुत कारिका (क्र०१५) की व्याख्या करते हुए कहते हैं—'कार्य- संपादनसामर्थ्य बाह्यकरण व्यापाररूपं केवलं विलुप्यते, स्थगितेन्द्रियस्य तस्मिन् विलुप्ते सामर्थ्ये 'स्वभावों में विलुप्त'—इति अबुधो जानाति, न तु भावस्य विनाशोऽस्ति ।' समाधि के समय बहिर्मुख कार्य के प्रति, प्रमाता की उन्मुखता लुप्त हो जाती है। इस विलुप्तता की स्थिति में समस्त वाह्य वेद्य़ों की अनुभूति का अभाव होने के कारण योगी को ऐसा प्रतीत होने लगता है कि 'मैं विलुप्त हो गया हूँ अर्थात् मेरा अभाव हो गया है।' अपने स्वभाव की ही विलुप्तता का भ्रम योगी को अभाववादी बना देता है किन्तु अभावात्मकता प्रबुद्ध योगी को नहीं प्रत्युत् अबुध योगी को होता है क्योंकि प्रमेय जगत् का ज्ञान (संवेदन) विलुप्त होने पर 'स्वभाव' विलुप्त नहीं होता तथा अन्तर्जगत में अभाव नहीं विशुद्ध चिन्मय सत्ता का उदय भी तो होता है। बहिर्मुख जगत् एवं बहिर्मुखी जागतिक अवस्थाओं एवं संवेदनाओं मात्र से तादात्म्य रखने के कारण उसे ही अपना
प्रथमः निष्यन्दः २०३ सत्स्वरूप मानने की भ्रान्ति के कारण ही ऐसे अबुध योगी को (बाह्य जगत् एवं जागतिक अनुभवों के अभाव एवं समाधि में संदृष्ट आत्मज्योति को स्वस्वभाव न मानने के कारण) अपने स्वस्वभाव का अभाव (अपनी वास्तविक सत्ता की विलुप्तता) का भ्रान्त अनुभव होने लगता है। अभाववाद और उसका प्रत्याख्यान—तस्मिँल्लुप्ते विलुप्तोऽस्मीत्यबुधः प्रति- पद्यते। (का० १५) कहकर कारिकाकार ने 'अभाववाद' का खण्डन किया है। माहा- यानिक शून्याद्वैतवादियों के शून्यवाद का भी इसी के द्वारा प्रतिषेध एवं प्रत्याख्यान किया गया है। समाधिकाल में बाह्योन्मुखी कार्य करने की क्षमता। बाह्यवर्ती (जागतिक) संवेद- नाओं की अनुभूति का अभाव एवं जागतिक मित अहंता के अभाव के कारण अबुध योगी अपने स्वरूप के ही अभाव की कल्पना करके अभाव को ही परम सत्य स्वीकार करने की भूल कर बैठता है। किन्तु वह यह नहीं समझ पाता कि उसकी अपनी सत्ता एवं उसका सत्स्वरूप तो त्रिकालाबाधित एवं अक्षर सत्य है। अभाववादी दार्शनिक कहते हैं कि किसी भी पदार्थ की नित्य सत्ता नहीं है सभी की केवल प्रातिभासिक या व्यावहारिक सत्ता मात्र है इसी प्रकार प्रत्यक चैतन्य (आत्म संवित्) भी अनित्य है। बौद्धों ने तो कहा था—'आत्म! ध्वंसो हि मोक्षः' (सर्वदर्शनसं.)। अभाववाद—अभाववादी अनस्तित्ववादी हैं। वे अनस्तित्त्व—आत्म प्रत्याख्यान- स्वस्वभाव का निषेध को ही सत्य मानते हैं अतः ध्यानावस्था में 'मेरा अस्तित्व नहीं है— मैं नहीं हूँ'—की भावना का ही अभ्यास किया करते हैं। जड़ समाधि की अवस्था में जब उनका जगत् से सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है, इन्द्रियाँ अपने विषयों से विरत हो जाती है, बाह्योन्मुखी समस्त व्यापार बन्द हो जाते हैं, समस्त बाह्य संवेदन लुप्त हो जाते हैं तथा व्युत्थानावस्था में प्राप्त जागतिक 'स्वं की प्रत्यभिज्ञा का भी अन्त हो जाता है तब ऐसा अबुध योगी अपनी प्रत्यभिज्ञा की कोई भी वस्तु न पाकर, किसी भी वाह्य पदार्थ से तादात्म्यापत्ति न होने से सर्वत्र अभाव ही अभाव देखता है इसी कारण वह अभाव को ही पारमार्थिक सत्य मानने लगता है। वह अपनी आत्मा ('मैं') को भी अभाव में लयीभूत मानने लगता है। केवल सुप्रबुद्ध योगी ही 'शांभवोपाय', 'अनुपाय', 'शाक्तोपाय' या 'शक्तिपात' (गुरुकृपा) से तुरीय शाक्त भूमि का संदर्शन करने में समर्थ हो पाता है। प्रश्न—'कार्योन्मुख प्रयत्न' के लुप्त हो जाने से यदि कर्तृत्वांश का भी लोप हो जाता तो अभाव दशा का साक्षी कौन होता? कौन जान पाता कि (समाधि में बाह्येन्द्रियों द्वारा अपने शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गंध को ग्रहण न कर पाने एवं चेतना के बहिर्मुखता से निवृत्त होकर अन्तर्मुखता प्राप्त करने के समय) 'मैं' का अस्तित्व विलुप्त हो गया है— आत्मा 'अभाव' में विलुप्त हो गई है? यदि 'अभाव' की दशा में भी अभाव का साक्षी (अभावावस्था के अस्तित्व का संवेदक) कोई है तो वह कौन है? वही तो भाव रूप आत्मसत्ता है। फिर 'अभाव'
२०४ स्पन्दकारिका परासत्ता कैसे हो सकती है? अभाव परम सत्य कैसे हो सकता है? अहं रूप की प्रतीति ही वेदकता का प्रमाण है। वेदक है तो आत्मा है। वेदक कभी लुप्त नहीं होता और न तो वह अभावात्मक हो सकता है। 'अभाववाद' में जो सर्वाभाववाद की कल्पना की गई है उस सर्वाभाव का वेदक कौन है? वह है भी या नहीं? यदि है तो वही वेदक ही तो सर्वोच्च भाव-स्वस्वभाव-आत्मा-आत्मसंवित् है। फिर 'अभाव' को तुरीय सत्य मानने का प्रमाण क्या है? 'अभाव समाधि' मोहमयी प्रगाढ़ निद्रा या सुषुप्ति के समान एक कृत्रिम जड़ता की अवस्था है— अतस्तत्कृत्रिमं ज्ञेयं सौषुप्तपदवत् सदा । न त्वेवं स्मर्यमाणत्वं तत्तत्त्वं प्रतिपद्यते ॥ १ अर्थात्—'अभावभावानालब्धभूमिकस्यापि कृत्रिमा अनित्या सा अवस्था, यथा सौषुप्ते पदे, यस्मात् चिद्रूपत्वं तु आत्मनः स्वरूपं नित्यसन्निहितं तदेव गुरुपदेशेन नित्य- मेवानुशीलनीयम् ॥' २ अन्तर्मुख चेतन सत्ता के सार्वकालिक अस्तित्व एवं नित्यता का प्रतिपादन— न तु योन्तर्मुखोभावः सर्वज्ञत्वगुणास्पदम् । तस्य लोपः कदाचित्स्यादन्यस्यानुपलम्भनात् ॥ १६ ॥ उस आन्तर स्वभाव का जो कि सर्वज्ञता के गुण का निलय (गृह) है कभी लोप नहीं होता क्योंकि अन्य कोई है ही नहीं ॥ १६ ॥
- सरोजिनी * स्पन्द की दो अवस्थायें है—(१) ज्ञाता (२) ज्ञेय (Subjectivity and objec- tivity) (Subject, object) इनका अन्तर केवल शब्दों के व्यवहार मात्र में है। वह 'शङ्कर' जो स्वातन्त्र्य शक्ति सम्पन्न होने के कारण स्वतन्त्र एवं प्रकाश्य जगत् का प्रकाशक होने के कारण 'प्रकाश' कहलाता है—स्पन्द की ये दोनों अवस्थायें उसी शङ्कर का प्रतिनिधित्व करती हैं। यह स्पन्द तत्त्व प्रकाशाभिन्न 'कार्यों' से व्याप्त है अतः यह 'कर्ता' से भी अभिन्न है। जब यह 'स्पन्द तत्त्व' कार्य से अभिन्न होकर अपने को व्यक्त करता है तब यह 'जगत' कहलाता है शरीर या पिण्ड कहलाता है—प्रपञ्चप्रसार कहलाता है और 'पदार्थ' (Object) कहलाता है । ३ स्पन्द की पदार्थमयता या इसकी पदार्थिक सत्ता (Objectivity) चैतन्य से पृथक् और दर्पण में प्रतिबिम्बित प्रतिबिम्ब के समान है। यह पिण्ड, शरीर, पदार्थ, इन्द्रिय, इन्द्रियों के अर्थ के रूप में अभिव्यक्त होता है। इसकी प्रत्येक परिणति क्षयिष्णु है। परमात्मा ज्ञाता (Perceiver) के पदार्थिक भौतिक पक्ष का ही सृजन एवं संहार करता है न कि ज्ञाता और उसके प्रकाशस्वरूप का। ज्ञाता परमात्मा से अभिन्न है । ४ १. स्पन्दसूत्र (१३) । २. 'स्पन्दसर्वस्व' (भट्टकल्लट) । ३. क्षेमराज—स्पन्दनिर्णय । ४. स्पन्दनिर्णय ।
प्रथमः निष्यन्दः २०५ इस दृष्टि से पादार्थिक जगत् और उसके विभिन्न रूप नश्वर हैं और उसका ज्ञाता रूप अनश्वर है।१ सर्वज्ञत्व आदि गुणों का केन्द्र जो अन्तर्मुखी भाव है उसका लोप कभी नहीं होता। 'अन्तर्मुख' का अर्थ है—पदार्थ से (बाह्यार्थ से) विरुद्ध। अर्नुख 'ज्ञाता' है। यह वह है जिसमें पराहंता (Supreme Egoity) का अधिपत्य है। 'अन्तर्मुखभाव' का अर्थ है— ज्ञातृत्व आदि गुणों की परमास्पद चेतन सत्ता।२ देश कालादि से परिच्छिन्न कार्य की निवृत्ति होती है। अन्तर्मुख भाव जो बाहर नहीं फैलता है स्वस्वरूपस्थ-स्वस्वभाव सर्वज्ञता आदि गुणों का आश्रय है, उस भाव की निवृत्ति कभी नहीं होती। क्यों नहीं होती? —इसलिए नहीं होती क्योंकि चिद्रूप के अतिरिक्त द्वितीय की उपलब्धि नहीं होती। उसी की सर्वत्र, सर्वदा उपलब्धि होती है। जैसा कि कहा भी गया है कि—'देश- काल-क्रिया एवं आकारों से परिच्छिन्न वस्तुओं में आप ही अनवच्छिन्न रूप से प्रकाशित हो रहे हैं, क्योंकि आप उनसे बाहर हैं॥'— देशकालक्रियाकारैरवच्छिन्नेषु वस्तुषु। अनवच्छिन्नरूपस्त्वं भासि तस्य बहिः स्थितेः ॥'३ यही अन्यत्र भी कहा गया है। इसमें यह कहा गया है कि—सर्वज्ञता, ज्ञान आदि में भेद नहीं है क्योंकि चिद्रूप ज्ञान की सब विभिन्न स्थितियाँ हैं। 'भेदः सर्वज्ञादीनां ज्ञानादीनां च नास्त्यमी। ज्ञानस्यैव धर्मतया चिद्रूपस्य स्थितिर्यतः ॥'४ 'षाड्गुण्य विवेक' नामक ग्रन्थ में भी कहा गया है—'सभी गुणों के आदि अन्त में ज्ञान ही होता है। केवल इसीसे तत्त्व का निश्चय हो जाता है। बल, वीर्य, ओज आदि की शक्तियाँ धर्मरूप से स्वीकार हैं॥'५ 'कक्ष्यास्तोत्र' में भी कहा गया है कि बाह्य विमर्श के कारण शक्ति अविद्या एवं 'ज्ञान' सर्वज्ञता है। बल तृप्तिमूलक है। अनादिबोध तेज है अतः बल का मूल बोध है। 'तेज' प्रभाव है जो दूसरों को झुका देता है।६ यही ईश्वर है और इसका स्वातन्त्र्य ही ऐश्वर्य है— 'बलस्य तृप्तिमूलत्वात् क्षमस्य तदभावतः। आनादिबोधस्तेजोऽत्र बोधमूलं हि तत्सदा ॥' कहा भी गया है७— 'प्रभाव लक्षणं यच्च तेजः प्रह्वयते परान्। बोधत्वादेव तद्ग्रेह्यं बोधं प्रह्वयते जगत्। स्वतन्त्रताऽत्र चैश्वर्यं स्वातन्त्र्यादीश्वरस्य तु ॥' १-२. स्पन्दनिर्णय। ३-७. उत्पलाचार्य स्पन्दप्रदीपिका।
२०६ स्पन्दकारिका इसे ही किसी ने कहा है कि—यह संविदात्मा समस्त कृत्यों में स्वतन्त्र है। न किसी का नियोज्य है और न विघ्नवान्। प्रवृत्ति एवं निवृत्ति दोनों दशाओं में यह ईश्वर ही है। यह अलुप्तशक्ति एवं अविनाशी है—१ 'स्वतन्त्रः सर्वकृत्येषु न नियोज्यो न विघ्नवान्। प्रवृत्तोऽस्य प्रवृत्तो वा यतस्तेन त्वमीश्वर ॥ वीर्यं सदाऽलुप्तशक्तिः नाशाभावश्च तद्गतः ॥' इसका वीर्य यह है कि इसकी आत्मसत्ता कभी परिभ्रष्ट नहीं होती। यह कार्य में अन्वित नहीं होता, स्वयं होता है। आभूषण में स्वर्ण की अनुगति नहीं है—वह स्वर्ण ही है। स्वर्ण का कण-कण स्वर्ण है। कहा भी गया है—२ आत्मसत्वापरिभ्रंशलक्षणाद्वैर्यमासत: । वीर्यादितच्च ते कार्येऽनन्वयः स्वर्णवच्च यः। अनन्तशक्तिः शक्तिः सा सामर्थ्यात् सर्वतः सदा ॥'३ तस्य = उसका। परमार्थसत परम तत्त्व का। कदाचित् = किसी समय। लोपः = लुप्त होना। स्वरूपोच्छेद। अन्यस्य = अन्य का उससे व्यतिरिक्त अनित्य वेद्य वस्तु का। अनुपलंभनात् = अनुभव के अभाव के कारण। किसका लोप नहीं होता? जो 'अंतर्मुख' (भिन्न रूप से स्थित बाह्य वेद्य के अभाव के कारण जो स्वान्तःमुख है) अर्थात् जिसका 'मुख' (शक्ति) स्वात्मा में अवस्थित है—उसका लोप नहीं होता। भाव = आत्मा नामक तत्त्व। सर्वज्ञत्वगुणास्पदम् = सर्वज्ञता आदि गुणों का केन्द्र। समस्त वेद्यवर्ग एवं वेदक वर्ग के गुणों या धर्मों का अनन्यसाधारण अधिकरण। आत्मा की 'ज्ञान' एवं 'क्रिया' दो प्रकार की शक्तियाँ हैं और वे पुरुषावस्था में अन्तःकरण-बहिष्करण व्यापार के उपशान्त हो जाने पर केवल स्वात्म मात्राभिमुखशक्ति- मात्र रूप से अवशिष्ट रह जाती हैं। यही है उनका अन्तर्मुखीभाव। 'मुख' का अर्थ है शक्तिः 'मुखशब्देन च शक्तेः व्यवहारो दृष्टो'—'शैवीमुखमिहोच्यते' (पारमेश्वर)। बाह्य विषयों के ग्रहण न होने मात्र से योगी भ्रमवश उस भाव को अभाव मानने लगते हैं। अनुपलंभ = (अन + उप + लभ् + घञ् + नुम्)। = अप्राप्ति। अनुपलब्धि। नित्यवर्तमान एवं अविलुप्त पराशक्ति के भाव का भला लोप कैसे संभव है क्योंकि आत्मा से व्यतिरिक्त अन्य वस्तु की सत्ता ही नहीं है। केवल अज्ञान (मोह) के कारण, अपने स्वरूप को भूला हुआ व्यक्ति, इस तथ्य को नहीं समझ पाता। प्रबुद्ध व्यक्ति तो १-३. उत्पलाचार्य स्पन्दप्रदीपिका।
प्रथमः निष्यन्दः २०७ उसे समझता है और साथ ही उसकी प्राप्ति के उपायों का भी उपदेश देगा। व्युत्थाना- वस्था में अवश्य उस प्रकार की अनुभवात्मक विशिष्ट अवस्थाओं की विपरीत भावों के कारण अनुपपत्ति हो सकती है किन्तु यह एक व्यामोह है।१ स्पन्द का अन्तर्मुख भाव कभी नष्ट नहीं होता —शाश्वत अहंरूप में स्पन्दाय- मान चैतन्य सत्ता सर्वकर्तृत्व, सर्वज्ञत्व, सर्वव्यापकत्व आदि गुणों का अधिष्ठान है। उसका कभी नाश नहीं होता क्योंकि समाधि में किसी अन्य सत्ता का अनुभव नहीं होता। भट्टकल्लट स्पन्दसर्वस्व में कहते हैं—'न तु यः अन्तर्मुखः अन्तश्चक्रारूढ- स्वभावः सर्वज्ञत्वादिगुणाश्रयः तस्य विनाशः कदाचित्, तस्मात् द्वितीयस्यान्यस्याभावात् तत्स्वरूपमेव व्योमवत् चिद्रूपतया सर्वत्र अनुभवति इति ॥'२ अन्तर्मुखभाव = आभ्यान्तर संवित्तिचक्र के रूप में सतत स्पन्दायमान रहने के स्वभाव वाला और सर्वज्ञत्व, सर्वकर्तृत्व, सर्वव्यापकत्व आदि गुणों का अधिष्ठान ॥ इस वेदक सत्ता से अतिरिक्त अन्य सत्ता का न अभाव होने के कारण स्पन्दतत्त्व चिद्रूप होने के कारण व्योमवत् है और यह आकाशवत् विभु चैतन्य सत्ता प्रत्येक दशा में अनुभूति का विषय बनता है। अन्तर्मुखो भावः = 'भाव' = 'भू' मूलधातु से 'भाव' निष्पन्न होता है और 'भाव' का अर्थ है—'सत्ता' या अस्तित्व। 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी' (१.५.१४) में कहा गया है कि—भाव का अर्थ है—काल से कवलित न होने वाली सत्ता। स्वतन्त्र कर्तृत्व ही भाव या सत्ता है। प्रत्येक क्रिया के निष्पादित करने की क्षमता, एवं नित्य सत्तासीनता ही 'भाव' है 'सत्ता च भवनकर्तृता सर्वक्रियासु स्वातन्त्र्यम् ॥'३ 'देवदत्त युद्ध करता है' इस वाक्य में युद्ध करना एक क्रिया को संकेतित करता है। क्रिया का सम्पादन तो किसी कर्ता के द्वारा होता है अतः कर्ता एवं क्रिया दो सत्ताएं हैं। 'युद्ध करना' तो एक क्रिया है और इस क्रिया का कोई करने वाला होना चाहिए। यह करने वाली सत्ता ही देवदत्त नामक कर्त्ता है। क्रिया के पूर्व उसकी वर्तमानता आवश्यक है। अन्यथा क्रिया सम्पन्न ही नहीं हो सकती। समष्टि में भी यही नियम लागू होता है। जगत् कार्य है और परमात्मा कर्ता है। नित्यरूप में स्थायी यह कर्तृत्व 'अहं विमर्शात्मक स्पन्द' है। यही स्पन्द 'विमर्श शक्ति' के नाम से भी प्रख्यात है। जगत् के प्रत्येक अणु को सत्ता प्रदान करने वाला जो विश्वप्राण चैतन्य है वही विमर्श शक्ति (कर्तृत्व) है। आचार्य उत्पलदेव ने इस अनिर्वाच्य भाव सत्ता को 'महासत्ता' 'स्फुरत्ता' 'सार' एवं 'हृदय' कहा है— 'सा स्फुरत्ता महासत्ता देशकालाविशेषिणी। सैषा सारतया प्रोक्ता हृदयं परमेष्ठिनः ॥'४ १. रामकण्ठाचार्य-'स्पन्दकारिकाविवृति'। २. भट्टकल्लट : स्पन्दकारिकावृत्ति । ३. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (१.५.१४)। ४. ईश्वरप्रत्यभिज्ञा (१.५.१४)।