भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 299

१९८ स्पन्दकारिका जाता है अतः दृष्टिगोचर नहीं होता । इन्द्रियाँ यदि स्थगित हो गईं तो प्रयत्न की शक्ति कहाँ रही? लुप्त तो प्रयत्न होता है । किन्तु अज्ञानी यह मानता है कि मैं ही लुप्त हो गया—मैं ही नष्ट हो गया ।१ वस्तुतः चिद्रूप का विनाश कभी होता ही नहीं । कहा भी गया है—'शरीर का विनाश हो जाने पर भी विज्ञप्ति का नाश कभी नहीं होता । सूर्यकान्त मणि का अभाव हो जाने पर भी सूर्य की कोई हाँनि नहीं होती । प्रतिबुध्यते 'स्पन्दप्रदीपिका' में इसका पाठ 'प्रतिपद्यते' है । प्रतिपद्यते = जानता है । चिद्रूप का विनाश तो कभी होता नहीं किन्तु ऐसा समझता अवश्य है— 'विज्ञप्तेर्न विनाशोऽस्ति विनष्टेऽपि शरीरके । अभावे सूर्यकान्तस्य नैवास्ति सवितुः क्षतिः ।।'२ लुप्यते = लुप्त हो जाता है । क्यों लुप्त हो जाता है? स्वात्मन्यास्ते—वह आत्मा में स्थित हो जाता है अतः बाह्येन्द्रियाँ उसे देख नहीं पातीं अतः लगता है कि वे सदैव के लिए नष्ट हो गई हैं । पूर्वपक्ष—(Objection) अभाव (Non-existence) या शून्य पर ध्यान देने के समय एवं प्रगाढ़ निद्रा के समय हम आत्मा को 'कर्ता' के रूप में अनुभव नहीं करते क्योंकि उस स्थिति में उसका कर्तृत्व रहता ही नहीं ।३ उत्तर पक्ष—हाँ यह सत्य है कि इन्द्रियाभिप्रेरित कार्योन्मुख प्रयास उपर्युक्त स्थिति में समाप्त हो जाते हैं क्योंकि उस समय ज्ञेय के नाश (Objective-destruction) के कारण कर्तृत्व संभव ही नहीं रहता । इस समय विषय और विषयी में (प्रमेय-प्रमाता, कर्ता-कार्य, ज्ञाता-ज्ञेय) में भिन्नता नहीं रह जाती । किन्तु इस समय (कार्योन्मुखी प्रवाह बन्द होने के समय) अज्ञानी व्यक्ति यह सोचता है कि 'मैं नष्ट हो गया' क्योंकि उसका स्वस्वभाव आच्छादित रहता है । विनाश कभी आन्तर स्वस्वभाव का हो ही नहीं सकता क्योंकि वह तो प्रकाशस्वरूप है, चेतना का निलय है और सर्वज्ञता का धाम है । सर्वज्ञातृत्व (Omniscience) ही पूर्ण कर्तृत्व है । क्योंकि अन्य कोई तो आन्तर प्रकृति के नाश का ज्ञाता हो ही नहीं सकता । किन्तु यदि अन्य ज्ञाता की कल्पना भी कर ली जाय तो वह भी अपनी आन्तर चेतना का प्रतिनिधि होगा । यदि वह ज्ञाता अस्तित्व में है ही नहीं फिर तुम कैसे कह सकते हो कि विनाश की अवस्था होती है ?४ प्रतिपक्ष—चलिये मैंने मान लिया कि कोई भी व्यक्ति आन्तर स्वभाव के नाश को नहीं देख पाता-उसका कोई ज्ञाता नहीं है—लेकिन उसकी जो प्रकाशमयी प्रकृति है वह तो देखती है ।५ ग्रन्थकार—फिर तुम अभाव या शून्य (Non existence on vacuum) को उसके आन्तर भाव से अभिन्न कैसे कह सकते हो? यह सत्य है कि जिस प्रकार किसी घड़े का न होना इस बात से प्रमाणित एवं निर्णीत किया जाता है कि जिस स्थान पर घड़ा था वहाँ है भी या नहीं । उसी प्रकार आत्मा के अभाव को भी इसी तरह निर्णीत १-३. स्पन्दप्रदीपिका । ४-५. स्पन्दनिर्णय ।