भारतकोश
संग्रह पर लौटें

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

१९८ स्पन्दकारिका जाता है अतः दृष्टिगोचर नहीं होता । इन्द्रियाँ यदि स्थगित हो गईं तो प्रयत्न की शक्ति कहाँ रही? लुप्त तो प्रयत्न होता है । किन्तु अज्ञानी यह मानता है कि मैं ही लुप्त हो गया—मैं ही नष्ट हो गया ।१ वस्तुतः चिद्रूप का विनाश कभी होता ही नहीं । कहा भी गया है—'शरीर का विनाश हो जाने पर भी विज्ञप्ति का नाश कभी नहीं होता । सूर्यकान्त मणि का अभाव हो जाने पर भी सूर्य की कोई हाँनि नहीं होती । प्रतिबुध्यते 'स्पन्दप्रदीपिका' में इसका पाठ 'प्रतिपद्यते' है । प्रतिपद्यते = जानता है । चिद्रूप का विनाश तो कभी होता नहीं किन्तु ऐसा समझता अवश्य है— 'विज्ञप्तेर्न विनाशोऽस्ति विनष्टेऽपि शरीरके । अभावे सूर्यकान्तस्य नैवास्ति सवितुः क्षतिः ।।'२ लुप्यते = लुप्त हो जाता है । क्यों लुप्त हो जाता है? स्वात्मन्यास्ते—वह आत्मा में स्थित हो जाता है अतः बाह्येन्द्रियाँ उसे देख नहीं पातीं अतः लगता है कि वे सदैव के लिए नष्ट हो गई हैं । पूर्वपक्ष—(Objection) अभाव (Non-existence) या शून्य पर ध्यान देने के समय एवं प्रगाढ़ निद्रा के समय हम आत्मा को 'कर्ता' के रूप में अनुभव नहीं करते क्योंकि उस स्थिति में उसका कर्तृत्व रहता ही नहीं ।३ उत्तर पक्ष—हाँ यह सत्य है कि इन्द्रियाभिप्रेरित कार्योन्मुख प्रयास उपर्युक्त स्थिति में समाप्त हो जाते हैं क्योंकि उस समय ज्ञेय के नाश (Objective-destruction) के कारण कर्तृत्व संभव ही नहीं रहता । इस समय विषय और विषयी में (प्रमेय-प्रमाता, कर्ता-कार्य, ज्ञाता-ज्ञेय) में भिन्नता नहीं रह जाती । किन्तु इस समय (कार्योन्मुखी प्रवाह बन्द होने के समय) अज्ञानी व्यक्ति यह सोचता है कि 'मैं नष्ट हो गया' क्योंकि उसका स्वस्वभाव आच्छादित रहता है । विनाश कभी आन्तर स्वस्वभाव का हो ही नहीं सकता क्योंकि वह तो प्रकाशस्वरूप है, चेतना का निलय है और सर्वज्ञता का धाम है । सर्वज्ञातृत्व (Omniscience) ही पूर्ण कर्तृत्व है । क्योंकि अन्य कोई तो आन्तर प्रकृति के नाश का ज्ञाता हो ही नहीं सकता । किन्तु यदि अन्य ज्ञाता की कल्पना भी कर ली जाय तो वह भी अपनी आन्तर चेतना का प्रतिनिधि होगा । यदि वह ज्ञाता अस्तित्व में है ही नहीं फिर तुम कैसे कह सकते हो कि विनाश की अवस्था होती है ?४ प्रतिपक्ष—चलिये मैंने मान लिया कि कोई भी व्यक्ति आन्तर स्वभाव के नाश को नहीं देख पाता-उसका कोई ज्ञाता नहीं है—लेकिन उसकी जो प्रकाशमयी प्रकृति है वह तो देखती है ।५ ग्रन्थकार—फिर तुम अभाव या शून्य (Non existence on vacuum) को उसके आन्तर भाव से अभिन्न कैसे कह सकते हो? यह सत्य है कि जिस प्रकार किसी घड़े का न होना इस बात से प्रमाणित एवं निर्णीत किया जाता है कि जिस स्थान पर घड़ा था वहाँ है भी या नहीं । उसी प्रकार आत्मा के अभाव को भी इसी तरह निर्णीत १-३. स्पन्दप्रदीपिका । ४-५. स्पन्दनिर्णय ।

प्रथमः निष्यन्दः १९९ किया जा सकता है कि कोई भी ज्ञान या अनुभव क्या आत्मा (या अपनेपन) के अभाव में संभव है यदि संभव है तो आत्मा का अभाव माना जा सकता है अन्यथा नहीं । लेकिन इस उदाहरण में भी 'ज्ञाता' का अस्तित्व आवश्यक है। अतः आत्मा के अभाव के होते हुए भी उसके अभाव का ज्ञान किसे होगा ?१ यदि पदार्थमयं जगत् (Objective world) के प्रति कार्योन्मुख प्रयत्न का लोप होने पर आभ्यन्तरिक स्वस्वभाव (Inward nature) का भी लोप मान लिया जाए तो आगामी समय में अन्य प्रयत्न का अवबोध या ज्ञान (Perception) संभव नहीं होगा और परिणामस्वरूप अन्य प्रयत्न का भी ज्ञानाभाव हो जाएगा। इसके अतिरिक्त यह भी कि, कोई भी मूर्ख व्यक्ति भला स्वप्न-शून्य प्रगाढ़ निद्रा में (सुषुप्ति के समय) बहिर्गामिनी शक्ति के अबोध (Non perception) द्वारा अन्तर्मुखी अनुभूति के लुप्त होने की शङ्का, यह जानते हुए भी कि एक चीज को लुप्त होना किसी दूसरी वस्तु को प्रभावित नहीं कर सकता, कैसे कर सकता है?२ ज्ञाता की लुप्तता (Disappearance) संभव नहीं है। इस पादार्थिक जगत् के प्रति उन्मुख कार्यों की अनुपस्थिति या अनुपस्थिति की अभिव्यक्ति के द्वारा, प्रकाश से अभिन्न एवं अन्तरोन्मुखी ज्ञाता की लुप्तता संभव नहीं है । अन्तर्मुखी स्वभाव (Inward faced nature), जो कि सर्वज्ञता के गुण के मूल स्थान का निर्धारण करता है,—अभाव (अनुपस्थिति) की दशा को भी जानता है क्योंकि अन्यथा वह दशा अस्तित्व में रह ही नहीं सकती। 'अन्तर्मुखी' शब्द बाह्यपदार्थता (Objectivity) को आत्म चैतन्य (Subjectivity) से पृथक् करता है। दोनों परस्पर विरोधी भाव है। 'अन्तर्मुखी' का अर्थ है—वह जिसमें पराहंता (Supreme egaity) अधिपत्य रखती हे। ज्ञाता ही सत्य है, ज्ञेय तो उसका विषय है।३ इसीलिए कहा गया है— न तु योऽन्तर्मुखोभावः सर्वज्ञत्व गुणास्पदम् । तस्य लोपः कदाचित्स्यादन्यस्यानुपलंभनात् ॥ कार्ये = निर्मेय वेद्य या वस्तु में । उन्मुखः = संमुखीभूत । उसके संपदनार्थ प्रवण । यः प्रयत्नः = जो प्रयास । कर्तृत्व, सहज उत्साह । स केवलं = वह मात्र । यही परमकारण या व्यापार का हेतु है । क्योंकि उस दशा में स्थूलरूप कार्य के अभाव से । लुप्यते = लुप्त हो जाता है । अनभिव्यक्त रूप में आत्मा में ही अमुख्य विलुप्तोस्मि = मैं लुप्त हो चुका हूँ। प्रतिपद्यते = समझता है । बनकर अवस्थित रहता है। **तस्मिन्—**उसमें । उस प्रयत्न में । (उस प्रयत्न में तत्काल ही) । १-३. स्पन्दनिर्णय ।

२०० स्पन्दकारिका लुप्ते = लुप्त हो जाने पर । अबुधः = तत्त्वावबोधशून्य । विलुप्तोऽस्मि इति प्रतिपद्यते—'मैं नहीं हूँ' इस प्रकार भाव-वैलक्षण्य के कारण तो वस्तु का परिच्छेद (विभाजन) ही हो जाएगा । (मैं लुप्त हो गया हूँ—ऐसा समझना चाहिए ।) यह स्वयंसिद्ध आत्मा तो स्वसिद्ध है अतः उसका अभाव कैसे संभव है? 'सिद्धः कथं निषेधस्य विषयः स्यात् ?' जिस प्रकार घर में स्थित किसी व्यक्ति को 'ऐ देवदत्त'—ऐसा कहकर बुलाया जाय तो वह आत्मा का अपह्नव (अनात्मभाव) करने वाले व्यक्ति से कह सकता है कि 'मैं देवदत्त नहीं हूँ' क्योंकि आत्मा देवदत्त नहीं है और न तो किसी आत्मा का नाम ही देवदत्त हो सकता है । वह यह अवश्य कह सकता है कि 'मैं हूँ' किन्तु वह आत्मा की दृष्टि से यह अवश्य कह सकता है कि 'मैं देवदत्त नहीं हूँ' । अभाव समाधि आदि अवस्थाओं में कार्य के अभाव के कारण तथा इन्द्रियों के व्यापार के रुक जाने से 'आत्मभाव प्राप्त हो गया' इस प्रकार का प्रत्यय मात्र भ्रान्ति है सत्य नहीं है तथा इन्द्रियों के न रहने से यह मानना कि—'आत्मा का अभाव हो गया है'—भ्रान्ति है—'अभावसमाध्यवस्थासु कार्याभावात् करणव्यापारविरतिमात्रेणात्माभाव- प्रत्ययो भ्रान्तिरेवेति ॥'१ कारिकाकार ने (१) 'कार्योन्मुख प्रयत्न' एवं (२) अन्तर्मुख भाव' दोनों की तुलनात्मक व्याख्या की है— (१) कार्योन्मुखः प्रयत्नो यः केवलं सोऽत्र लुप्यते ॥ १५ ॥ (२) म तु योऽन्तर्मुखो भावः सर्वज्ञत्वगुणास्पदम् ॥ १६ ॥ (अन्तर्मुख = अहं प्रत्यवमर्श के रूप में स्पन्दायमान) 'कार्योन्मुख प्रयत्न' : 'तस्मिंल्लुप्ते विलुप्तोस्मीत्यबुधः प्रतिपद्यते ॥ 'अन्तर्मुख भाव' : 'तस्य लोपः कदाचित् स्यादन्यस्यानुपलंभनात् ॥' (यहाँ किसी अन्य का अस्तित्त्व भी संभव नहीं होता—'अन्यस्य अनुपलंभनात्') अन्तर्मुखीन स्थिति में कार्यों का अभाव होता है अतः वहाँ कार्योन्मुख प्रयत्न संभव ही नहीं है । अन्तर्मुखता की स्थिति में कार्य तो नहीं किन्तु 'भाव' तो रहता ही है । इसीलिए कारिकाकार ने 'कार्य' के साथ 'प्रयत्न' एवं कर्तृता (अन्तर्मुखता) के साथ 'भाव' शब्दों का प्रयोग किया है । 'प्रयत्न' स्वाभाविक नहीं कृत्रिम होता है किन्तु आत्मा की क्रियात्मकता प्रयत्न नहीं स्वाभाविक होती है । समाधिगत अनुभूतियाँ भट्टकल्लट स्पन्दसर्वस्व में कहते हैं कि—समाधिकाल में केवल इतना हो जाता है कि कार्य सिद्ध करने की जो क्षमता इन्द्रियों में होती है और उसके माध्यम से वे शब्द- १. 'स्पन्दकारिकाविवृति' (रामकण्ठाचार्य) ।

प्रथमः निष्यन्दः २०१ स्पर्श-रूप-रस-गंध आदि पंच महाविषयों को जो ग्रहण करती हैं वह क्षमता लुप्त हो जाती है अर्थात् इन्द्रियों में विषय-ग्रहण की क्षमता का तिरोधान हो जाता है। अज्ञ यह समझने लगता है कि इन्द्रियों द्वारा विषय ग्रहण की क्षमता के लोप के कारण मेरा भी लोप हो गया है—यह अनुभव मात्र अज्ञान है क्योंकि नित्य स्वभाव का कभी लोप नहीं होता— 'कार्यसंपादनसामर्थ्यं बाह्यकरणव्यापाररूपं केवलं विलुप्यते', स्थगितेन्द्रियस्य तस्मिन् विलुप्ते सामर्थ्ये, 'स्वभावों में विलुप्त'—इति अबुधो जानाति, न तु भावस्य विनाशोस्ति ॥'१ कारिकाकार कहते हैं कि समाधिकाल में व्यक्ति के इन्द्रियों की कार्यसम्पादनो- न्मुख अध्यवसाय (कार्योन्मुख प्रयत्न) ही रुकता है—जीव की बहिर्मुखी कार्यता या चिकीर्षा का प्रयास या क्रियान्वय रुकता है किन्तु उसके लुप्त होने से यह सोचना कि 'मैं ही विलुप्त हो गया हूँ'—ऐसा अनुभव तो केवल अज्ञानियों को होता है अन्य को नहीं ॥ अभाववाद का खण्डन—अभाववादी दार्शनिक यह मानते हैं कि सारे 'भाव' काल्पनिक हैं—अध्यारोपित हैं—अध्यास है और सत्य मात्र—'अभाव' है। जो कुछ भी है—यथा शरीर, शरीरांग, इन्द्रियाँ, उनकी अनुभूतियाँ, जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति आदि अव- स्थायें, सुख, दुःख, बाल्य-यौवन-वार्धक्य, जीवन, मरण लिंगभेद, स्वर्ग-नरक, बन्धन- मुक्ति आदि सभी क्षणभंगुर हैं और कतिपय काल तक ही अस्तित्व में रहते हैं बाद में उनका अभाव हो जाता है—कोई भी भाव स्थायी नहीं होता अतः 'अभाव' ही सत्य है—अनस्तित्व ही परम यथार्थ है। अभाववादी आत्मा को भी स्थायी एवं नित्य भाव की वस्तु नहीं मानते। उनका कथन है—'आत्मा ध्वंसो हि मोक्षः ॥'२ अभाववादी पदार्थों के अनस्तित्व को परम सत्य स्वीकार करते हैं। अभाववादी ध्यान करते हैं—'मैं नहीं हूँ, मेरा भाव (अस्तित्त्व) नहीं है।' इस प्रकार की भावना का अभ्यास करने वाले ये अभाववादी जब कभी समाधि में पहुँचते हैं तो इन्द्रियों का अपने व्यापारों से विरत हो जाने पर—बाह्य विषयों की अनुभूति का अभाव होने पर—शब्द- स्पर्श-रूप-रस-गंध विषयों को ग्रहण न कर पाने के कारण यह समझते हैं कि मेरा जो 'मैं' (आत्मा) था उसका भी अभाव हो गया है। तुरीय शाक्त भूमिका पर आरूढ़ योगी ज्ञान-क्रियासमन्विता स्पन्दन का अनुभव करते रहने के कारण सदैव वेदक होने का अनुभव करता रहता है। यह जो 'कार्योन्मुख प्रयत्न' लुप्त हो जाता है यदि इसके साथ ही वेदक (प्रमाता) को अपने कर्तृत्व अंश का भी लोप अनुभव में आ जाता तो अभाववाद संगत माना जाता किन्तु प्रश्न यह है कि यदि इस कर्तृत्वांश का भी लोप संभव हो जाय तो इस लोप का अनुभव कौन करेगा? यह अनुभविता ही 'कर्ता' है, आत्मा है—भाव है। फिर अभाववाद कैसा? किसी वस्तु के लुप्त होने की अनुभूति का वेदक भी तो कोई न कोई होगा? यह वेदक (आत्मा) भाव सत्ता (अस्तित्त्व) ही तो है। यदि आत्मा भी अभाव (सत्ताहीन) मान ली जाय तो लोप (अभाव) की अनुभूति किसको होगी? अतः आत्मा के १. 'स्पन्दसर्वस्व' : भट्टकल्लट। २. 'सर्वदर्शनसंग्रह' (माधवाचार्य)।

२०२ स्पन्दकारिका भावसत्ता होने के कारण अभाववाद संगत नहीं है। 'सब कुछ अभावात्मक है—' अभाव ही परम यथार्थ है—अनस्तित्त्व ही परम सत्य है'—इस सर्वाभाववाद का साक्षी या अनुभविता कौन है? इसका अनुभविता या साक्षी 'भाव' (सत्तासीन वस्तु) ही तो होगा— यह आत्मा ही 'भाव' है अतः अभाववाद अज्ञता की दृष्टि है। यह भाव सत्ता (आत्मा) ही किसी अभाव को अभाव (न होने के भाव = अनस्तित्त्व) के रूप में सत्ता प्रदान करके (अर्थात् अभाव के रूप में स्थित मानकर) उसका (भावशून्यता का, अनस्तित्त्व का, अभाव का) अनुभव करती है। अतः वेदक सत्ता का किसी भी अवस्था में लोप नहीं हो सकता। यह वेदक सत्ता ही आत्मा है। अतः 'सर्वाभाववाद' मिथ्या कल्पना है। समाधि में सर्वाभाववाद की अनुभूति नहीं होती। समाधि में केवल कार्यता ('कार्योन्मुख प्रयास') का लोप होता है। स्पन्दात्मिका कर्तृता (वेदकता) बाह्य प्रमेय समूह की ओर प्रवृत्तोन्मुख न होने के कारण अपने ही कार्यता अंश को अपने में ही विलीन करके, विशुद्ध चिन्मात्र रूप में स्थित हो जाती है। अप्रबुद्ध योगी ही समाधि दशा में कार्यता के लुप्त होने पर यह समझते हैं कि हम भी लुप्त हो गए या अभाव में विलीन हो गए। 'स्वभाव' (आत्म सत्ता) का लोप कभी नहीं होता ॥ समाधि की अवस्था में कार्यता सम्बद्ध स्पन्दतत्त्व की स्थिति—आचार्य अभिनवगुप्तपाद कहते हैं कि विशुद्ध चिन्मात्र स्पन्द तत्त्व अपनी 'स्वातन्त्र्य शक्ति' के कारण प्रत्येक काल खण्ड में 'वेदक' एवं 'वेद्य' दोनों स्वरूपों में नित्य अवभासित रहता है अर्थात् वह एक ही साथ एवं एक ही समय—कार्यता एवं कर्तृता दोनों अवस्थाओं में स्पन्दमान रहता है। अन्तर यह है कि एक परिणामी, क्षयिष्णु, परिवर्तनशील अवस्था है जब कि दूसरी अपरिणामिनी, अक्षर एवं अपरिवर्तनशील तथा नित्य अवस्था है। कार्योन्मुख प्रयत्न समाधिकाल में लुप्त हो जाता है और इस स्थिति में अभा- वात्मक स्थिति का भी बोध होने लगता है अतः ऐसे योगी अभाव को ही परमसत् (पारमार्थिक सत्ता) मानकर 'अभाववाद' का प्रतिपादन करने लगते हैं किन्तु यह उनका भ्रम है क्योंकि परमार्थ सत् या पारमार्थिकी सत्ता अभावात्मक नहीं भावात्मक है। भट्टकल्लट प्रस्तुत कारिका (क्र०१५) की व्याख्या करते हुए कहते हैं—'कार्य- संपादनसामर्थ्य बाह्यकरण व्यापाररूपं केवलं विलुप्यते, स्थगितेन्द्रियस्य तस्मिन् विलुप्ते सामर्थ्ये 'स्वभावों में विलुप्त'—इति अबुधो जानाति, न तु भावस्य विनाशोऽस्ति ।' समाधि के समय बहिर्मुख कार्य के प्रति, प्रमाता की उन्मुखता लुप्त हो जाती है। इस विलुप्तता की स्थिति में समस्त वाह्य वेद्य़ों की अनुभूति का अभाव होने के कारण योगी को ऐसा प्रतीत होने लगता है कि 'मैं विलुप्त हो गया हूँ अर्थात् मेरा अभाव हो गया है।' अपने स्वभाव की ही विलुप्तता का भ्रम योगी को अभाववादी बना देता है किन्तु अभावात्मकता प्रबुद्ध योगी को नहीं प्रत्युत् अबुध योगी को होता है क्योंकि प्रमेय जगत् का ज्ञान (संवेदन) विलुप्त होने पर 'स्वभाव' विलुप्त नहीं होता तथा अन्तर्जगत में अभाव नहीं विशुद्ध चिन्मय सत्ता का उदय भी तो होता है। बहिर्मुख जगत् एवं बहिर्मुखी जागतिक अवस्थाओं एवं संवेदनाओं मात्र से तादात्म्य रखने के कारण उसे ही अपना

प्रथमः निष्यन्दः २०३ सत्स्वरूप मानने की भ्रान्ति के कारण ही ऐसे अबुध योगी को (बाह्य जगत् एवं जागतिक अनुभवों के अभाव एवं समाधि में संदृष्ट आत्मज्योति को स्वस्वभाव न मानने के कारण) अपने स्वस्वभाव का अभाव (अपनी वास्तविक सत्ता की विलुप्तता) का भ्रान्त अनुभव होने लगता है। अभाववाद और उसका प्रत्याख्यान—तस्मिँल्लुप्ते विलुप्तोऽस्मीत्यबुधः प्रति- पद्यते। (का० १५) कहकर कारिकाकार ने 'अभाववाद' का खण्डन किया है। माहा- यानिक शून्याद्वैतवादियों के शून्यवाद का भी इसी के द्वारा प्रतिषेध एवं प्रत्याख्यान किया गया है। समाधिकाल में बाह्योन्मुखी कार्य करने की क्षमता। बाह्यवर्ती (जागतिक) संवेद- नाओं की अनुभूति का अभाव एवं जागतिक मित अहंता के अभाव के कारण अबुध योगी अपने स्वरूप के ही अभाव की कल्पना करके अभाव को ही परम सत्य स्वीकार करने की भूल कर बैठता है। किन्तु वह यह नहीं समझ पाता कि उसकी अपनी सत्ता एवं उसका सत्स्वरूप तो त्रिकालाबाधित एवं अक्षर सत्य है। अभाववादी दार्शनिक कहते हैं कि किसी भी पदार्थ की नित्य सत्ता नहीं है सभी की केवल प्रातिभासिक या व्यावहारिक सत्ता मात्र है इसी प्रकार प्रत्यक चैतन्य (आत्म संवित्) भी अनित्य है। बौद्धों ने तो कहा था—'आत्म! ध्वंसो हि मोक्षः' (सर्वदर्शनसं.)। अभाववाद—अभाववादी अनस्तित्ववादी हैं। वे अनस्तित्त्व—आत्म प्रत्याख्यान- स्वस्वभाव का निषेध को ही सत्य मानते हैं अतः ध्यानावस्था में 'मेरा अस्तित्व नहीं है— मैं नहीं हूँ'—की भावना का ही अभ्यास किया करते हैं। जड़ समाधि की अवस्था में जब उनका जगत् से सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है, इन्द्रियाँ अपने विषयों से विरत हो जाती है, बाह्योन्मुखी समस्त व्यापार बन्द हो जाते हैं, समस्त बाह्य संवेदन लुप्त हो जाते हैं तथा व्युत्थानावस्था में प्राप्त जागतिक 'स्वं की प्रत्यभिज्ञा का भी अन्त हो जाता है तब ऐसा अबुध योगी अपनी प्रत्यभिज्ञा की कोई भी वस्तु न पाकर, किसी भी वाह्य पदार्थ से तादात्म्यापत्ति न होने से सर्वत्र अभाव ही अभाव देखता है इसी कारण वह अभाव को ही पारमार्थिक सत्य मानने लगता है। वह अपनी आत्मा ('मैं') को भी अभाव में लयीभूत मानने लगता है। केवल सुप्रबुद्ध योगी ही 'शांभवोपाय', 'अनुपाय', 'शाक्तोपाय' या 'शक्तिपात' (गुरुकृपा) से तुरीय शाक्त भूमि का संदर्शन करने में समर्थ हो पाता है। प्रश्न—'कार्योन्मुख प्रयत्न' के लुप्त हो जाने से यदि कर्तृत्वांश का भी लोप हो जाता तो अभाव दशा का साक्षी कौन होता? कौन जान पाता कि (समाधि में बाह्येन्द्रियों द्वारा अपने शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गंध को ग्रहण न कर पाने एवं चेतना के बहिर्मुखता से निवृत्त होकर अन्तर्मुखता प्राप्त करने के समय) 'मैं' का अस्तित्व विलुप्त हो गया है— आत्मा 'अभाव' में विलुप्त हो गई है? यदि 'अभाव' की दशा में भी अभाव का साक्षी (अभावावस्था के अस्तित्व का संवेदक) कोई है तो वह कौन है? वही तो भाव रूप आत्मसत्ता है। फिर 'अभाव'

२०४ स्पन्दकारिका परासत्ता कैसे हो सकती है? अभाव परम सत्य कैसे हो सकता है? अहं रूप की प्रतीति ही वेदकता का प्रमाण है। वेदक है तो आत्मा है। वेदक कभी लुप्त नहीं होता और न तो वह अभावात्मक हो सकता है। 'अभाववाद' में जो सर्वाभाववाद की कल्पना की गई है उस सर्वाभाव का वेदक कौन है? वह है भी या नहीं? यदि है तो वही वेदक ही तो सर्वोच्च भाव-स्वस्वभाव-आत्मा-आत्मसंवित् है। फिर 'अभाव' को तुरीय सत्य मानने का प्रमाण क्या है? 'अभाव समाधि' मोहमयी प्रगाढ़ निद्रा या सुषुप्ति के समान एक कृत्रिम जड़ता की अवस्था है— अतस्तत्कृत्रिमं ज्ञेयं सौषुप्तपदवत् सदा । न त्वेवं स्मर्यमाणत्वं तत्तत्त्वं प्रतिपद्यते ॥ १ अर्थात्—'अभावभावानालब्धभूमिकस्यापि कृत्रिमा अनित्या सा अवस्था, यथा सौषुप्ते पदे, यस्मात् चिद्रूपत्वं तु आत्मनः स्वरूपं नित्यसन्निहितं तदेव गुरुपदेशेन नित्य- मेवानुशीलनीयम् ॥' २ अन्तर्मुख चेतन सत्ता के सार्वकालिक अस्तित्व एवं नित्यता का प्रतिपादन— न तु योन्तर्मुखोभावः सर्वज्ञत्वगुणास्पदम् । तस्य लोपः कदाचित्स्यादन्यस्यानुपलम्भनात् ॥ १६ ॥ उस आन्तर स्वभाव का जो कि सर्वज्ञता के गुण का निलय (गृह) है कभी लोप नहीं होता क्योंकि अन्य कोई है ही नहीं ॥ १६ ॥

  • सरोजिनी * स्पन्द की दो अवस्थायें है—(१) ज्ञाता (२) ज्ञेय (Subjectivity and objec- tivity) (Subject, object) इनका अन्तर केवल शब्दों के व्यवहार मात्र में है। वह 'शङ्कर' जो स्वातन्त्र्य शक्ति सम्पन्न होने के कारण स्वतन्त्र एवं प्रकाश्य जगत् का प्रकाशक होने के कारण 'प्रकाश' कहलाता है—स्पन्द की ये दोनों अवस्थायें उसी शङ्कर का प्रतिनिधित्व करती हैं। यह स्पन्द तत्त्व प्रकाशाभिन्न 'कार्यों' से व्याप्त है अतः यह 'कर्ता' से भी अभिन्न है। जब यह 'स्पन्द तत्त्व' कार्य से अभिन्न होकर अपने को व्यक्त करता है तब यह 'जगत' कहलाता है शरीर या पिण्ड कहलाता है—प्रपञ्चप्रसार कहलाता है और 'पदार्थ' (Object) कहलाता है । ३ स्पन्द की पदार्थमयता या इसकी पदार्थिक सत्ता (Objectivity) चैतन्य से पृथक् और दर्पण में प्रतिबिम्बित प्रतिबिम्ब के समान है। यह पिण्ड, शरीर, पदार्थ, इन्द्रिय, इन्द्रियों के अर्थ के रूप में अभिव्यक्त होता है। इसकी प्रत्येक परिणति क्षयिष्णु है। परमात्मा ज्ञाता (Perceiver) के पदार्थिक भौतिक पक्ष का ही सृजन एवं संहार करता है न कि ज्ञाता और उसके प्रकाशस्वरूप का। ज्ञाता परमात्मा से अभिन्न है । ४ १. स्पन्दसूत्र (१३) । २. 'स्पन्दसर्वस्व' (भट्टकल्लट) । ३. क्षेमराज—स्पन्दनिर्णय । ४. स्पन्दनिर्णय ।

प्रथमः निष्यन्दः २०५ इस दृष्टि से पादार्थिक जगत् और उसके विभिन्न रूप नश्वर हैं और उसका ज्ञाता रूप अनश्वर है।१ सर्वज्ञत्व आदि गुणों का केन्द्र जो अन्तर्मुखी भाव है उसका लोप कभी नहीं होता। 'अन्तर्मुख' का अर्थ है—पदार्थ से (बाह्यार्थ से) विरुद्ध। अर्नुख 'ज्ञाता' है। यह वह है जिसमें पराहंता (Supreme Egoity) का अधिपत्य है। 'अन्तर्मुखभाव' का अर्थ है— ज्ञातृत्व आदि गुणों की परमास्पद चेतन सत्ता।२ देश कालादि से परिच्छिन्न कार्य की निवृत्ति होती है। अन्तर्मुख भाव जो बाहर नहीं फैलता है स्वस्वरूपस्थ-स्वस्वभाव सर्वज्ञता आदि गुणों का आश्रय है, उस भाव की निवृत्ति कभी नहीं होती। क्यों नहीं होती? —इसलिए नहीं होती क्योंकि चिद्रूप के अतिरिक्त द्वितीय की उपलब्धि नहीं होती। उसी की सर्वत्र, सर्वदा उपलब्धि होती है। जैसा कि कहा भी गया है कि—'देश- काल-क्रिया एवं आकारों से परिच्छिन्न वस्तुओं में आप ही अनवच्छिन्न रूप से प्रकाशित हो रहे हैं, क्योंकि आप उनसे बाहर हैं॥'— देशकालक्रियाकारैरवच्छिन्नेषु वस्तुषु। अनवच्छिन्नरूपस्त्वं भासि तस्य बहिः स्थितेः ॥'३ यही अन्यत्र भी कहा गया है। इसमें यह कहा गया है कि—सर्वज्ञता, ज्ञान आदि में भेद नहीं है क्योंकि चिद्रूप ज्ञान की सब विभिन्न स्थितियाँ हैं। 'भेदः सर्वज्ञादीनां ज्ञानादीनां च नास्त्यमी। ज्ञानस्यैव धर्मतया चिद्रूपस्य स्थितिर्यतः ॥'४ 'षाड्गुण्य विवेक' नामक ग्रन्थ में भी कहा गया है—'सभी गुणों के आदि अन्त में ज्ञान ही होता है। केवल इसीसे तत्त्व का निश्चय हो जाता है। बल, वीर्य, ओज आदि की शक्तियाँ धर्मरूप से स्वीकार हैं॥'५ 'कक्ष्यास्तोत्र' में भी कहा गया है कि बाह्य विमर्श के कारण शक्ति अविद्या एवं 'ज्ञान' सर्वज्ञता है। बल तृप्तिमूलक है। अनादिबोध तेज है अतः बल का मूल बोध है। 'तेज' प्रभाव है जो दूसरों को झुका देता है।६ यही ईश्वर है और इसका स्वातन्त्र्य ही ऐश्वर्य है— 'बलस्य तृप्तिमूलत्वात् क्षमस्य तदभावतः। आनादिबोधस्तेजोऽत्र बोधमूलं हि तत्सदा ॥' कहा भी गया है७— 'प्रभाव लक्षणं यच्च तेजः प्रह्वयते परान्। बोधत्वादेव तद्ग्रेह्यं बोधं प्रह्वयते जगत्। स्वतन्त्रताऽत्र चैश्वर्यं स्वातन्त्र्यादीश्वरस्य तु ॥' १-२. स्पन्दनिर्णय। ३-७. उत्पलाचार्य स्पन्दप्रदीपिका।

२०६ स्पन्दकारिका इसे ही किसी ने कहा है कि—यह संविदात्मा समस्त कृत्यों में स्वतन्त्र है। न किसी का नियोज्य है और न विघ्नवान्। प्रवृत्ति एवं निवृत्ति दोनों दशाओं में यह ईश्वर ही है। यह अलुप्तशक्ति एवं अविनाशी है—१ 'स्वतन्त्रः सर्वकृत्येषु न नियोज्यो न विघ्नवान्। प्रवृत्तोऽस्य प्रवृत्तो वा यतस्तेन त्वमीश्वर ॥ वीर्यं सदाऽलुप्तशक्तिः नाशाभावश्च तद्गतः ॥' इसका वीर्य यह है कि इसकी आत्मसत्ता कभी परिभ्रष्ट नहीं होती। यह कार्य में अन्वित नहीं होता, स्वयं होता है। आभूषण में स्वर्ण की अनुगति नहीं है—वह स्वर्ण ही है। स्वर्ण का कण-कण स्वर्ण है। कहा भी गया है—२ आत्मसत्वापरिभ्रंशलक्षणाद्वैर्यमासत: । वीर्यादितच्च ते कार्येऽनन्वयः स्वर्णवच्च यः। अनन्तशक्तिः शक्तिः सा सामर्थ्यात् सर्वतः सदा ॥'३ तस्य = उसका। परमार्थसत परम तत्त्व का। कदाचित् = किसी समय। लोपः = लुप्त होना। स्वरूपोच्छेद। अन्यस्य = अन्य का उससे व्यतिरिक्त अनित्य वेद्य वस्तु का। अनुपलंभनात् = अनुभव के अभाव के कारण। किसका लोप नहीं होता? जो 'अंतर्मुख' (भिन्न रूप से स्थित बाह्य वेद्य के अभाव के कारण जो स्वान्तःमुख है) अर्थात् जिसका 'मुख' (शक्ति) स्वात्मा में अवस्थित है—उसका लोप नहीं होता। भाव = आत्मा नामक तत्त्व। सर्वज्ञत्वगुणास्पदम् = सर्वज्ञता आदि गुणों का केन्द्र। समस्त वेद्यवर्ग एवं वेदक वर्ग के गुणों या धर्मों का अनन्यसाधारण अधिकरण। आत्मा की 'ज्ञान' एवं 'क्रिया' दो प्रकार की शक्तियाँ हैं और वे पुरुषावस्था में अन्तःकरण-बहिष्करण व्यापार के उपशान्त हो जाने पर केवल स्वात्म मात्राभिमुखशक्ति- मात्र रूप से अवशिष्ट रह जाती हैं। यही है उनका अन्तर्मुखीभाव। 'मुख' का अर्थ है शक्तिः 'मुखशब्देन च शक्तेः व्यवहारो दृष्टो'—'शैवीमुखमिहोच्यते' (पारमेश्वर)। बाह्य विषयों के ग्रहण न होने मात्र से योगी भ्रमवश उस भाव को अभाव मानने लगते हैं। अनुपलंभ = (अन + उप + लभ् + घञ् + नुम्)। = अप्राप्ति। अनुपलब्धि। नित्यवर्तमान एवं अविलुप्त पराशक्ति के भाव का भला लोप कैसे संभव है क्योंकि आत्मा से व्यतिरिक्त अन्य वस्तु की सत्ता ही नहीं है। केवल अज्ञान (मोह) के कारण, अपने स्वरूप को भूला हुआ व्यक्ति, इस तथ्य को नहीं समझ पाता। प्रबुद्ध व्यक्ति तो १-३. उत्पलाचार्य स्पन्दप्रदीपिका।

प्रथमः निष्यन्दः २०७ उसे समझता है और साथ ही उसकी प्राप्ति के उपायों का भी उपदेश देगा। व्युत्थाना- वस्था में अवश्य उस प्रकार की अनुभवात्मक विशिष्ट अवस्थाओं की विपरीत भावों के कारण अनुपपत्ति हो सकती है किन्तु यह एक व्यामोह है।१ स्पन्द का अन्तर्मुख भाव कभी नष्ट नहीं होता —शाश्वत अहंरूप में स्पन्दाय- मान चैतन्य सत्ता सर्वकर्तृत्व, सर्वज्ञत्व, सर्वव्यापकत्व आदि गुणों का अधिष्ठान है। उसका कभी नाश नहीं होता क्योंकि समाधि में किसी अन्य सत्ता का अनुभव नहीं होता। भट्टकल्लट स्पन्दसर्वस्व में कहते हैं—'न तु यः अन्तर्मुखः अन्तश्चक्रारूढ- स्वभावः सर्वज्ञत्वादिगुणाश्रयः तस्य विनाशः कदाचित्, तस्मात् द्वितीयस्यान्यस्याभावात् तत्स्वरूपमेव व्योमवत् चिद्रूपतया सर्वत्र अनुभवति इति ॥'२ अन्तर्मुखभाव = आभ्यान्तर संवित्तिचक्र के रूप में सतत स्पन्दायमान रहने के स्वभाव वाला और सर्वज्ञत्व, सर्वकर्तृत्व, सर्वव्यापकत्व आदि गुणों का अधिष्ठान ॥ इस वेदक सत्ता से अतिरिक्त अन्य सत्ता का न अभाव होने के कारण स्पन्दतत्त्व चिद्रूप होने के कारण व्योमवत् है और यह आकाशवत् विभु चैतन्य सत्ता प्रत्येक दशा में अनुभूति का विषय बनता है। अन्तर्मुखो भावः = 'भाव' = 'भू' मूलधातु से 'भाव' निष्पन्न होता है और 'भाव' का अर्थ है—'सत्ता' या अस्तित्व। 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी' (१.५.१४) में कहा गया है कि—भाव का अर्थ है—काल से कवलित न होने वाली सत्ता। स्वतन्त्र कर्तृत्व ही भाव या सत्ता है। प्रत्येक क्रिया के निष्पादित करने की क्षमता, एवं नित्य सत्तासीनता ही 'भाव' है 'सत्ता च भवनकर्तृता सर्वक्रियासु स्वातन्त्र्यम् ॥'३ 'देवदत्त युद्ध करता है' इस वाक्य में युद्ध करना एक क्रिया को संकेतित करता है। क्रिया का सम्पादन तो किसी कर्ता के द्वारा होता है अतः कर्ता एवं क्रिया दो सत्ताएं हैं। 'युद्ध करना' तो एक क्रिया है और इस क्रिया का कोई करने वाला होना चाहिए। यह करने वाली सत्ता ही देवदत्त नामक कर्त्ता है। क्रिया के पूर्व उसकी वर्तमानता आवश्यक है। अन्यथा क्रिया सम्पन्न ही नहीं हो सकती। समष्टि में भी यही नियम लागू होता है। जगत् कार्य है और परमात्मा कर्ता है। नित्यरूप में स्थायी यह कर्तृत्व 'अहं विमर्शात्मक स्पन्द' है। यही स्पन्द 'विमर्श शक्ति' के नाम से भी प्रख्यात है। जगत् के प्रत्येक अणु को सत्ता प्रदान करने वाला जो विश्वप्राण चैतन्य है वही विमर्श शक्ति (कर्तृत्व) है। आचार्य उत्पलदेव ने इस अनिर्वाच्य भाव सत्ता को 'महासत्ता' 'स्फुरत्ता' 'सार' एवं 'हृदय' कहा है— 'सा स्फुरत्ता महासत्ता देशकालाविशेषिणी। सैषा सारतया प्रोक्ता हृदयं परमेष्ठिनः ॥'४ १. रामकण्ठाचार्य-'स्पन्दकारिकाविवृति'। २. भट्टकल्लट : स्पन्दकारिकावृत्ति । ३. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (१.५.१४)। ४. ईश्वरप्रत्यभिज्ञा (१.५.१४)।

२०८ स्पन्दकारिका यही समस्त जड़ एवं चेतन दोनों भावों की विश्रान्ति का स्थान है—'हृदय' है— प्रतिष्ठा स्थान है—'हृदयं च नाम प्रतिष्ठास्थानमुच्यते, तस्यापि विमर्शशक्तिः ॥'१ यही महासत्ता 'विश्व जीवन' है— 'महासत्ता महादेवी विश्वजीवनमुच्यते ॥' विश्व में जितनी भी जड़ सत्ताएँ हैं उन सभी की विश्रान्ति का एक मात्र स्थान यही महादेवी है—यही विमर्श शक्ति या हृदय है। 'अन्तर्मुखोभावः' पदावली में 'भावः' पद—'कर्तृसत्ता' (कर्तृत्व) का बोधक है। आत्मचैतन्य की नित्यता—कारिकाकार का कथन है कि 'अन्तर्मुख भाव' जो कि शाश्वत रूप में अहं रूप में स्पन्दायमान है वह चेतन सत्ता सर्वकर्तृत्व, सर्वज्ञातृत्व आदि गुणों का मूलाधिष्ठान है अतः उसका लोप (विनाश) कभी नहीं होता क्योंकि किसी भी अन्य अतिरिक्त सत्ता की विद्यमानता का अनुभव किसी को भी नहीं होता। इसी विचार को भट्टकल्लट 'स्पन्दसर्वस्व' में इस प्रकार कहते हैं—'न तु यः अन्तर्मुखः अन्तश्चक्रारूढस्वभावः सर्वज्ञत्वादिगुणाश्रयः तस्य विनाशः कदाचित्, तस्मात् द्वितीयस्यान्यस्याभावात् तत्स्वरूपमेव व्योमवत् चिद्रूपतया सर्वत्र अनुभवति ॥'२ सुप्रबुद्ध एवं प्रबुद्ध योगियों में चिद्रूप स्वभाव की अनुभूतियों के भेद— तस्योपलब्धिः सततं त्रिपदाव्यभिचारिणी । नित्यं स्यात्सुप्रबुद्धस्य तदाद्यन्ते परस्य तु ॥ १७ ॥ सुप्रबुद्ध योगी को उस (चैतन्यस्वभाव) की सम्प्राप्ति जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं के आदि, मध्य एवं अन्त में समान एवं निरन्तर होती रहती है। (किन्तु इसके विपरीत) प्रबुद्ध योगी को (इन तीनों अवस्थाओं में) से प्रथम (जाग्रत अवस्था) की दो अवस्थाओं में (स्वप्न एवं सुषुप्ति अवस्थाओं में ही) चिद्रूप स्वभाव की प्राप्ति होती है ॥ १७ ॥

  • सरोजिनी * कारिकाकार ने इस कारिका में 'सुप्रबुद्ध' 'प्रबुद्ध' योगियों की अनुभूतियों का तुलनात्मक विवेचन किया है। तदाद्यन्ते = (आचार्य रामकण्ठ—'तत' = इन जाग्रत आदि अवस्थाओं की 'आदि'—प्रथम । जाग्रत अवस्था के । 'अन्ते' = अन्तिम दो पदों में (स्वप्न एवं सुषुप्ति में) रामकण्ठाचार्य-भट्टकल्लट ने इस कारिका की व्याख्या में 'स्वप्न सुषुप्तादौ' शब्दों का प्रयोग करके—स्वप्न, सुषुप्ति एवं आदि (संवेदन की समस्त अवस्थाओं) को द्योतित किया है। भट्टकल्लट ने इस कारिका की इस प्रकार व्याख्या की है— १. शिवसूत्रविमर्शिनी । २. स्पन्दसर्वस्व ।

प्रथमः निष्यन्दः २०९ 'तस्य चिद्रूपस्य सर्वगतस्य स्वस्वभावस्य उपलब्धिः त्रिषु जाग्रदादिषु पदेषु नित्यं सुप्रबुद्धस्य भवति, तदाद्यन्ते अपरस्य प्रबुद्धस्य स्वप्नसुषुप्तादौ, जाग्रत्तूर्यौ त्वागममात्र- गम्यौ ॥ १७ ॥' शास्त्रों में जगत् के निखिल प्रमाताओं को निम्न भेदों में विभाजित किया है—(१) 'अबुद्ध' (२) 'बुद्ध' (३) 'प्रबुद्ध' (४) 'सुप्रबुद्ध' ॥ इन्हीं में से 'प्रबुद्ध' एवं 'सुप्रबुद्ध' प्रमाताओं की अनुभूतियों का यहाँ तुलनात्मक विवेचन किया गया है । सुप्रबुद्ध (Fully enlightened) को सदैव एवं नित्य उस सत्य तत्त्व का ज्ञान है जो कि उक्त तीनों अवस्थाओं में अचल रूप से स्थित है तथा अन्य लोगों के लिए प्रारंभ एवं अन्त में । तस्य = प्राकरिक उपलब्धि की ॥ उपलब्धिः = अनवच्छिन्न प्रकाश । त्रिपदा = जागृति-स्वप्न-सुषुप्ति 'आद्यन्ते' आदि (मध्य) एवं अन्त में । अव्यभिचारिणी = अनपायिनी । शङ्करात्मस्वस्वभावा रूप में स्फुरित । परस्य = अप्रबुद्ध लोगों का ॥१ अज्ञानी भी 'स्पन्दतत्त्व' से प्रभावित होता है और ज्ञानी भी किन्तु— 'अतः सततमुद्युक्तः स्पन्दतत्त्वविविक्तये ।'—'स्पन्द के निष्यन्द अज्ञानियों को पतित बनाने के लिए उद्यत रहते हैं । अतः अपने विकस्वर स्वभाव द्वारा स्पन्दतत्त्व का विवेक करने के लिए सर्वदा प्रयास करते रहना चाहिए ॥२ 'अतस्तत्कृत्रिमं ज्ञेयं सौषुप्तपदवत् सदा ॥ १३ ॥ सौषुप्तपदवन्मूढ़ प्रबुद्धः स्यादनावृतः ॥ १५ ॥ 'प्रबुद्धः सर्वदा तिष्ठेत्' (३।१२)—द्वारा उसी भाव को व्यक्त किया गया है । अप्रबुद्धों को इसकी उपलब्धि मात्र आदि और अन्त में ही हो पाती है—'अप्रबुद्धस्य तदाद्यन्तेऽस्ति तदुपलब्धिः' । जागृति आदि तीनों अवस्थाओं में तथा आदि-अन्त एवं मध्य तीनों अवस्थाओं में प्रबुद्ध ज्ञानप्रभ रहता है—३ 'जाग्रत् स्वप्न सुषुप्तभेदे तुर्याभोग संभवः ॥' (शिव सूत्र १।७) इसके द्वारा भी इसी की पुष्टि की गई है । 'त्रिषु चतुर्थं तैलवदासेव्यम् (शि०सू० ३।१०) त्रितय भोक्ता वीरेशः ।' (शि०सू० १।११) द्वारा भी इसी सत्य की पुष्टि की गई है ।४ योगी को चिद्रूप आत्मा की निरन्तर उपलब्धि एवं अनुभूति होती है । योगी कैसा? जो सदैव सावधान रहे (या जागता) रहे । उपलब्धि कैसी? जो जाग्रदादि तीनों अवस्थाओं में बनी रहे, निवृत्त न हो । वह कार्यदशा में भी निर्भ्रान्त है । कहा भी गया —————————————— १-४. स्पन्दनिर्णय । सं० १४

२१० स्पन्दकारिका है—'ऐसी कोई अवस्था नहीं है जिसमें संवित् नहीं रहती अतः योगी चिद्घनस्वरूप की ही उपासना करते हैं।' १ काप्यवस्था न ते साऽस्ति यस्यां संविन्न वर्तते । तेन चिद्घनमेतत्वां योगिनः पर्युपासते ॥ यदि योगी पूर्णप्रबुद्ध न हो तो भी कार्य के आदि अन्त में संवित् का अनुभव होता है । कार्य की प्रथमावस्था और अन्तिमावस्था चिन्मय ही होती है— 'तदादौ प्रागवस्थायां तदन्तेऽपि च तन्मये । पदं प्रत्ययवाद्यन्ते जाग्रत्तूर्येष्ववाग्मात् ॥' २ कार्य की मध्यावस्था संविद्रूप होने पर भी अन्य रूप से भासित होता है । इसका अभिप्राय यह भी हो सकता है कि आदि, अन्त, मध्य, जाग्रत, स्वप्न सर्वत्र प्रबुद्ध योगी को संवित् की ही स्पष्टतः उपलब्धि होती है । ३ 'व्यतिरिक्तस्वभावोपलब्धि' नामक इस द्वितीय निष्यन्द की यह प्रथम कारिका है तथा 'स्वरूपस्पंद' निष्यन्द की सत्रहवीं कारिका है । इस प्रकार पूर्वोक्त कारिकाओं में देहादिक अनात्म तत्त्वों से व्यतिरिक्त (भिन्न) स्वानुभूतिगम्य एवं स्वानुभवसिद्ध आत्मतत्त्व की उपपत्तियों से व्यवस्थापित करके अब उसके प्राप्ति के उपायों के उपदेश के अवसर पर (१) सुप्रबुद्ध (२) प्रबुद्ध (३) अप्रबुद्ध- तीन प्रकार के वेदकों के विषय से सम्बद्ध प्रकरण पर प्रकाश डाला जा रहा है । तस्य = उसका । यथापूर्व प्रतिपादित स्वात्मा रूप परमात्मा का ॥ उपलब्धिः = प्राप्ति अनुभवात्मक निर्विकल्पा प्रतिपत्ति ॥ नित्य = सदैव । सदैव सभी अनुभव-दशाओं में । सप्रबुद्धस्य = सुष्ठु + प्रबुद्धः + तस्य ॥ अत्यन्त उच्च आत्मज्ञानी । अर्थात् देहादिक अनात्म तत्त्वों में अहंप्रत्ययरूप दीर्घस्वप्न से युक्त मोहमहानिद्रा से स्वल्पमात्र भी जिसका संवित् आवृत नहीं हुआ हो ऐसे सिद्ध सम्यग्दर्शी ज्ञानी का ॥ सततम् = लगातार । बिना किसी व्यवधान के । त्रिपदाव्यभिचारिणी = जागर-स्वप्न-सुषुप्ति नामक पदों में । इन तीन संवेदन- भूमिकाओं में 'अव्यभिचारिणी' अविसंवादिनी । किसी भी अवस्था के द्वारा अनभिभूत होने के कारण अव्यवहितसंनिधि ॥ इस प्रकार के 'सुप्रबुद्ध' स्वीकृतस्वात्मा (स्वस्वभाव को अपनी स्वात्मा मानकर आत्मस्थ योगी) लोगों के लिए यह उपदेश नहीं है क्योंकि वे तो कृतकृत्य हैं । अपरस्य—दूसरे का । उसके समनन्तर किसी दूसरे 'प्रबुद्ध' का अर्थात् परशक्तिपात से आविर्भूत प्रमातालोक वाले माया तमिश्रा के विलुप्त हो जाने के कारण समुन्मिषित विवेकचक्षु वाले एवं मोहोत्साह-संपदा से मुक्त योगी पुरुष का ॥ १-३. उत्पलदेवाचार्य—'स्पन्दप्रदीपिका' ।

प्रथमः निष्यन्दः २११ तदाद्यन्ते—तब आदि एवं अन्त में। जागर-स्वप्न-सुषुप्ति—इन तीनों पदों का आदिभूत जो पद (जाग्रदवस्थात्मक पद)। उस पद का जो अन्तर्भूत पद है अर्थात् स्वप्न एवं सुषुप्ति नामक पद। वहाँ पर उसकी (आत्मतत्त्व की) उपलब्धि होती है। त्रिपद-स्वप्नसुषुप्तादौ ॥ यहाँ 'आदि' शब्द स्वप्न—सुषुप्ति अवस्था में संगृहीत स्मृति मोह आदि अवस्था के परिग्रह का वाचक है। इस व्याख्यान का आशय यह है कि—यहाँ द्विविध आत्मतत्त्व को उपलब्धि का उपदेश दिया गया है। ये दो प्रकार निम्नानुसार हैं—(१) सर्वव्यतिरिक्त चिन्मात्रस्वरूप (२) विश्वात्मक और उसकी शक्तिचक्र का विषय। सुषुप्ति-स्वप्नरूप पदद्वय में भी 'प्रबुद्ध' योगी के लिये यह उपदेश उपादेय नहीं है। जैसे कि सुप्रबुद्ध के लिए पदत्रय में—जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति तीनों में, क्योंकि उनकी तत्त्वोपलब्धि हो चुकी है और वह भी बिना प्रयत्न के। पदद्वयवर्ती संवित् के प्रत्यवमर्शमात्र से तत्वोपलब्धि होती है—यह प्रतिपादित किया जा चुका है। जब समस्त विकल्प रूप वेद्योँ के विगलित हो जाने पर योगी प्रबोध दशा में निष्केवला सुषुप्तावस्था का परामर्श करता है। तब समस्त उपरागों से रहित और स्वरूप मात्र में विश्रान्त, नित्य अविलुप्त, चेतयितृमात्र स्वभाव वाले आत्मा (आत्म- तत्त्व) स्वयं प्राप्त हो जाता है। जब स्फुटतर अवभास से युक्त चेतन और अचेतन से युक्त भावचक्र निर्माणमयी अपनी स्वप्नावस्था का योगी परामर्श करता है तब उसी दृष्टान्त के द्वारा प्रबोध के बल से स्वस्वभाव परम कारण परमेश्वर की, व्यतिरिक्त कारणान्तर से निरपेक्ष होकर और मात्र अपनी स्वेच्छा से सर्वकर्तृता रूप तत्त्व प्राप्त कर लेता है। जहाँ तक अप्रबुद्ध की बात है वह सैकड़ों प्रयत्न करने पर भी समर्पित तुम्बक तोय द्रव्य के समान अन्तर का स्पर्श नहीं सकता— अप्रबुद्धस्य पुनरेतत् प्रयत्नशतैरपि समर्प्यमाणं तुम्बकतोयद्रव्यवत् नान्तः स्पर्शं करोति ॥ इन दोनों पदों में 'प्रबुद्धं' को ही उपलब्धि प्राप्त हो सकती है। किन्तु इसे जाग्रत्तूर्याख्य पद द्वय में इसे भी उपलब्धि नहीं मिल पाती— 'परिशिष्टे जाग्रत्तूर्याख्ये पदद्वये सा अस्य नास्ति इति अर्थात् उक्तं भवति ॥' अतः जागरावस्था में शब्दादिविषयग्रहण में व्यग्र इन्द्रियव्यापार व्यवहित व्यक्ति को, तथा तुर्यावस्था में (लोकोत्तर एवं अत्यन्त अपरिचित होने के कारण) स्वयमेव अत्यन्त दुर्लक्ष परतत्त्व की प्राप्ति के लिए प्रबुद्ध व्यक्ति को भी उपदेशों की अपेक्षा होती है। वृत्तिकार ने कहा भी है— १. रामकण्ठाचार्य : 'स्पन्दकारिकाविवृति' ।

२१२ स्पन्दकारिका 'जाग्रत्तुर्यौत्वागममान्तगम्यौ' 'तस्य चिद्रूपस्य सर्वगतस्य'। प्रबुद्ध एवं सुप्रबुद्ध योगियों की अनुभूतियों में भेद प्रस्तुत स्पन्द सूत्र क्र० १७ में 'प्रबुद्ध' एवं 'सुप्रबुद्ध' योगियों की आभ्यन्तरिक अनुभूतियों में भेद का विवेचन किया गया है जो निम्नांकित है— (१) सुप्रबुद्ध की अनुभूति—'तस्योपलब्धिः सततं त्रिपदाव्यभिचारिणी' (२) प्रबुद्ध की अनुभूति-तदाद्यन्तेऽपरस्य तु ॥ १७ ॥

सुप्रबुद्ध की अनुभूति—प्रबुद्ध की अनुभूति—
१) इनकी उपलब्धि अखण्डात्मिका एवं सततं प्रवाहात्मिका होती है।१) इनकी उपलब्धि 'तदाद्यन्त' होती है।
२) इनकी उपलब्धि न तो 'सतत' होती है और न तो 'नित्य' होती है।
२) यह अनुभूति नित्य होती है (तस्योपलब्धिः सततं। नित्यं स्यात् सुप्रबुद्धस्य।)३) 'तदाद्यन्ते अपरस्य प्रबुद्धस्य स्वप्नसुषुप्तादौ, जाग्रत्तुर्यौ त्वागममात्रगम्यौ।' <br> —भट्टकल्लट—स्पन्दसर्वस्व
३) इनकी उपलब्धि—(स्पन्दसूत्र) जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं में 'सतत' एवं 'नित्य' रूप से विद्यमान रहती है। —भट्टकल्लटः 'स्पंद स०'४) 'तदाद्यन्ते'='तत्' = इन जाग्रत आदि अवस्थाओं की। 'आदि' = प्रथम = जाग्रतावस्था। 'अन्ते' = अन्तिम दो पदों (स्वप्न एवं सुषुप्ति में) <br> —स्पन्दकारिकाविवृति (रामकण्ठाचार्य)
४) 'तस्य चिद्रूपस्य सर्वगतस्य स्वस्वभावस्य उपलब्धिः त्रिषु जाग्रदादिषु पदेषु नित्यं सुप्रबुद्धस्य भवति॥' <br> —'स्पन्दसर्वस्व'
'तदाद्यन्ते' पदावली आचार्य क्षेमराज ('स्पन्दनिर्णय') भट्टकल्लट ('स्पन्द-
सर्वस्व') रामकण्ठाचार्य ('स्पन्दकारिकाविवृति) एवं भट्ट लोल्लट आदि सभी विद्वानों के
लिए अनुसंधेय बनी रही। सूत्र का वास्तविक अभिप्राय क्या है? यह अनुसंधान का एवं
जिज्ञासा का विषय बना रहा।
भट्टकल्लट 'स्पन्दसर्वस्व' में कहते हैं कि सुप्रबुद्ध योगियों में जाग्रत्-स्वप्न-
सुषुप्ति—इन अवस्थाओं के आदि, मध्य एवं अन्त में आत्मानुभव अखण्डरूप से
प्रवाहित रहता है।
प्रबुद्धयोगियों को यह आत्मानुभव मात्र स्वप्न एवं सुषुप्ति की अवस्था में प्राप्त
होता है—भट्टकल्लट।
प्रश्न—क्या प्रबुद्ध योगियों को भी स्वप्न एवं सुषुप्ति की अवस्थाओं में सुप्रबुद्धों
की ही भाँति ही अखण्ड, एकरस, अविरल एवं तैलधारावत् आत्मानुभव प्राप्त होता
रहता है या नहीं ? क्या इन दो अवस्थाओं के आदि, मध्य एवं अन्त में सुप्रबुद्धों की ही
भाँति 'सतत' एवं 'नित्य' अनुभूति प्राप्त होती रहती है या नहीं ? रामकण्ठाचार्य ने

प्रथमः निष्यन्दः २१३ भट्ट कल्लट के दिशा-निर्देशन में ही स्पन्द सूत्रों की व्याख्या की है किन्तु वहाँ भी स्थिति सुस्पष्ट नहीं हो पायी है । कतिपय आचार्यों को रामकण्ठाचार्य द्वारा प्रस्तुत 'तदाद्यन्ते' की व्याख्या मान्य नहीं है । उनके कथनानुसार— १) प्रबुद्ध योगी को स्वप्न के अन्त एवं सुषुप्ति के आदि में (स्वप्न से सुषुप्ति में प्रवेश के समय) दोनों अवस्थाओं के मध्यवर्ती संधि-क्षण में स्पन्दात्मक स्वभाव की अनुभूति विद्युत स्फुलिंग की भाँति अति अस्थायी रूप में होती है । २) साधना की अग्रवर्ती यात्रा में प्रबुद्ध योगी (सुप्रबुद्धावस्था में) जाग्रत-स्वप्न- सुषुप्ति की तीनों अवस्थाओं के आदि-मध्य-अन्त में इस आत्मानुभूति का समान रूप से अखण्डात्मक स्वरूप में सतत अनुभव करता रहता है—यही दोनों की आत्मानुभूतियों के कालिक स्थिरता में भेद है । प्रमाताओं की श्रेणियाँ—प्रमाताओं की चार श्रेणियाँ हैं । जिन्हें कि 'मालिनी- विजय' (२-४३) नामक ग्रन्थ में इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है । प्रामातृ-समूह (प्रमाता-श्रेणी) ┌───────────┬───────────┴───────────┬───────────┐ 'अबुद्ध' 'बुद्ध' 'प्रबुद्ध' 'सुप्रबुद्ध' 'चतुर्विधं तु पिण्डस्थमबुद्धं बुद्धमेव च । प्रबुद्धं सुप्रबुद्धं च'—मा०वि० १) अबुद्ध प्रमाता—भगवान् की तिरोधानात्मिका शक्ति द्वारा संहारावस्था में अवस्थित प्रमाता अबुद्ध प्रमाता हैं । उनकी अवस्था अंधकारावृत गहन गुहा में प्रगाढ़ निद्रा में निमग्न अजगरों की भाँति विसंज्ञावस्था है । वे कालरात्रि एंव प्रकृति (गुणत्रय की साम्यावस्था) के गर्भ में मूढ़वत् स्थित हैं । उनकी आत्मा की चैतन्यावस्था अख्याति के अभेद्य वज्रावरण से आच्छादित रहती है । इस अवस्था में शब्दादिक विषयों का ग्रहण भी नहीं कर सकते और सद्भाव, असद्भाव, सुख-दुःख की संवेदना आदि से शून्य रहते हैं—('स्वच्छन्दतन्त्र' ११.९१-९५) २) बुद्ध प्रमाता—'स्वच्छन्दतन्त्र' (११.९६-११२) में बुद्ध प्रमाताओं का विशद विवेचन किया गया है । संहारावस्थास्थित इन अबुद्ध प्रमाताओं में से कर्मपरिपाक होने की स्थिति में 'अनन्तभट्टारक' (अशुद्धाध्व के स्वामी) स्वेच्छा से इन प्राणियों को उनके संचित एवं प्रारब्ध कर्मों के आधार पर उनके योग्य योनि में जन्म देते हैं । अनन्तभट्टारक उनमें, 'कलातत्त्व' के माध्यम से, चेतना का अविर्भाव करके उन्हें स्थूल शरीर प्रदान करते हैं और वे जन्म-मरण के चक्र में पड़कर अनन्त योनियों में जन्म लेकर संसरण करते रहते हैं । ये ही हैं—स्थूल शरीरी संसारी जीव या 'पशु' हैं । इनका प्रधान उद्देश्य होता है विषयोपभोग की कामना और उसकी पूर्ति । ये आत्मचिन्तन से विरत रहते हैं ।

२१४ स्पन्दकारिका ३) प्रबुद्ध प्रमाता—शिवानुग्रह, शक्तिपात आदि कारणों से बुद्ध प्रमाताओं में से कतिपय प्रमाताओं के हृदय में सांसारिक विषयों से वैराग्य उत्पन्न हो जाता है और ये प्रमाता सतर्क, भक्ति एवं सद्ज्ञान का आश्रय लेकर और जागत एवं जागतिक संबन्धों को इन्द्रजाल मानकर आत्मशोध की ओर अग्रपद होते हुए अपनी तीव्रतम आत्मोत्कण्ठा की भूमिका पर आरूढ़ होने पर (शाङ्कर मार्ग में दीक्षित होकर) प्रबुद्ध भाव को अतिक्रान्त करके सुप्रबुद्धभूमि पर पदार्पण करते हैं। ४) सुप्रबुद्ध प्रमाता—प्रबुद्ध प्रमाता अपनी एकनिष्ठ भक्ति, सद्ज्ञान एवं परमात्मानुग्रह से अनुगृहीत होकर साधना-पथ पर अग्रपद होता हुआ शङ्कर रूप गुरु से दीक्षा प्राप्त करके योगमार्ग के उच्च शृंगों पर पदार्पण करते हुए तुर्यात्मक शाक्त भूमिका पर आरूढ़ होकर स्वस्वभाव का साक्षात्कार करके शिवत्व प्राप्त कर लेता है। यह प्रमाता 'वर्ण', 'पद', 'मन्त्र', 'कला', 'तत्त्व', 'भुवन' नामक ६ मार्गों को अतिक्रान्त करके त्रि- कालाबाधित, समरस्त, प्रशान्त, चिद्रूप एवं स्वस्वभावात्मक शिवभाव अधिगत कर लेता है। वह 'चक्रेश्वरत्व' प्राप्त कर लेता है—स्वयं शिव हो जाता है और 'शिवोऽहं शिवोऽहं शिवोऽहं शिवोऽहं' के रसानुभूति-रत्नाकर में लय हो जाता है। यही है उसकी नित्योदित समाधि या जीवन्मुक्ति की अवस्था जिसमें 'पूर्णांहन्ता' का स्वानुभव योगी को नित्य समरस शिवशक्ति के सामरस्य में आपादमस्तक निमज्जित करके उसे शिव बना देता है। यही है आत्म प्रत्यभिज्ञा—स्वरूपावस्थान की अद्वैतात्मक उच्चतम अवस्था। विभिन्न अवस्थाओं में आत्माभिव्यक्ति के विभिन्न रूप— ज्ञानज्ञेयस्वरूपिण्या शक्त्या परमया युतः । पदद्वये विभुर्भाति तदन्यत्र तु चिन्मयः ॥ १८ ॥ पराशक्ति से समवेत एवं सर्वव्यापक आत्म चैतन्य जाग्रत अवस्था में मात्र 'ज्ञेय' पदार्थों के रूप में एवं स्वप्नावस्था में मात्र ज्ञान स्वरूप होकर प्रकाशित होता है किन्तु वह अन्यत्र (सुषुप्ति एवं तुरीय अवस्थाओं में) चिन्मात्र रूप में ही प्रकाशित होता है ॥ १८ ॥

  • सरोजिनी * आत्म चैतन्य (स्पन्दतत्त्व) किस अवस्था में कौन सा स्वरूप धारण करके प्रकाशित हुआ करता है—इसी विषय का इस कारिका में विवेचन किया गया है। 'पद' = अवस्थायें। अवस्थायें जाग्रत अवस्था | स्वप्नावस्था | सुषुप्ति अवस्था | तुरीयावस्था | तुरीयातीत अवस्था (सामान्य स्पन्दभूमि) | (पूर्णचिन्मयावस्था) मुख्य मिश्रित | मुख्य मिश्रित | मुख्य मिश्रित

प्रथमः निष्यन्दः २१५ तुरीयावस्था = (१) जो जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति को अस्तित्व प्रदान करती है। (२) जिसमें जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति लय हो जाती हैं । (३) जिसमें पूर्वोक्त तीन अवस्थायें मुख्यता, अमुख्यता (मिश्रण) का भेद उत्पन्न ही नहीं कर सकतीं ॥ (४) जाग्रत, स्वप्न सुषुप्ति से अतीत अवस्था । (इसमें मुख्य अमुख्य भेद भी संभव नहीं है) पूर्ण चिन्मात्र अवस्था। यह स्वयं पूर्ववर्ती अवस्थाओं को सत्ता देती है । विभु = सर्वव्यापक आत्मतत्त्व ॥ ज्ञानज्ञेयस्वरूपिण्या—ज्ञानज्ञेय स्वरूपिणी शक्ति के द्वारा ।¹ शक्त्या परमया युतः—अपनी परमा शक्ति से संवलित होकर । पदद्वये = जागृतावस्था एवं स्वप्नावस्था में । अन्यत्र = सुषुप्ति एवं तुरीयावस्था में ।² सुप्रबुद्ध योगी की तीनों पदों (जागृति-स्वप्न-सुषुप्ति) में कैसी उपलब्धि रहती है—उसकी इस श्लोक में विवेचना की गई है । सर्वव्यापक (All-pervading) परमात्मा अपने को दो अवस्थाओं में व्यक्त करता है— १) प्रथमतः ज्ञान एवं ज्ञेय के रूप में सर्वोच्चशक्ति प्राप्त के रूप में । २) द्वितीयतः चैतन्य के साथ अभिन्न (एकीकृत चिन्मय रूप में ।³ पराशक्ति से संयुक्त, सर्वव्यापक, शङ्करात्मा, स्वभावस्थ परमात्मा, स्वस्वरूप एवं स्पन्द तत्वात्मा के रूप में अवस्थित शिव जागृतावस्था एवं स्वप्नावस्था दोनों में स्फुरित होता है । वहाँ वह सदाशिव विश्व को ईश्वर के समान अपने शरीरांग के समान समझता है—‘तत्र हि विश्वं असौ सदाशिव ईश्वरवत् स्वांगवत पश्यति’—किन्तु अन्यत्र (सुषुप्ति एवं तुरीय में) नहीं ।⁴ ‘त्रिपदाव्यभिचारिणी’ कहकर तो तीनों अवस्थाओं में इसकी व्याप्ति कही गई है फिर जाग्रत एवं स्वप्न मात्र में ही उसकी व्याप्ति क्यों कही गई और सुषुप्ति या तुर्यावस्था को क्यों छोड़ दिया गया ? क्योंकि सुषुप्ति की अवस्था मोहपंकिल होती है जबकि जागृति एवं स्वप्न की अवस्था साधकों के शिवाराधना से समवेत रहती है अतः यहाँ मात्र दो पदों का ही उल्लेख किया गया है । शिवाराधना की दृष्टि से जाग्रत-स्वप्न अधिक चिन्मय रहते हैं अपेक्षाकृत मोहात्मक सुषुप्ति के । एक सुप्रबुद्ध योगी तीनों अवस्थाओं में किस प्रकार तत्त्व साक्षात्कार करता है—इसकी विवेचना की गई ।⁵ तुरीयावस्था की तुलना में तो जाग्रतस्वप्न महत्त्वपूर्ण नहीं हैं किन्तु मोहात्मक सुषुप्ति की तुलना में तो वे ज्यादा उत्कृष्ट दशायें हैं ही क्योंकि इसमें शिवाराधना होते रहने से उनमें चिन्मयत्व अधिक रहता है । अवस्थायें : ‘ज्ञानं जाग्रत, स्वप्नो विकल्पः अविवेको माया सौषुप्तम् । (शिवसूत्र)। ‘सर्वाक्षगोचरत्वेन या तु बाह्यतया स्थिरा । सृष्टिः साधारणी सर्व प्रमातृणां स जागरः ॥’⁶ १-५. स्पन्दनिर्णय । ६. महार्थमञ्जरी ।

२१६ स्पन्दकारिका आरोहण के स्तर पर (पूर्ण शिव भाव की स्थिति में) शक्ति के ५ मुख कहे गये हैं जो निम्नांकित हैं— 'चित्', 'निवृत्ति', 'इच्छा', 'ज्ञान', एवं 'क्रिया' माया के प्रभाव से (अवरोहण के स्तर पर) उक्त ५ शक्तियाँ—विमर्श या स्वातन्त्र्य शक्ति-'माया' बन जाती है और 'चित्' इच्छादिक शक्तियाँ—'कला' 'विद्या' 'राग' 'काल' एवं 'नियति', बन जाती हैं— माया - 'कला' (१) 'कला'—सर्वकर्तृत्व को किंचित् कर्तृत्व में परिवर्तित कर देती है। (२) 'विद्या'—सर्वज्ञातृत्व को अल्प ज्ञातृत्व में परिवर्तित कर देती है। (३) 'राग'—तृप्त की अतृप्ति, अपूर्णमन्यता रूप आसक्ति में परिवर्तित कर देता है। (४) 'काल'—नित्यता को अनित्यता में परिवर्तित कर देती है। (५) 'नियति'—व्यापकता को अव्यापकता में बदल देती हैं। स्वातन्त्र्य शक्ति माया तत्त्व शक्ति पंचकंचुक (चितः) सर्वज्ञता — (विद्याः) — अल्पज्ञता। (निवृत्तिः) सर्वकर्तृत्व — (कल) — अल्पकर्तृत्व। (इच्छाः) पूर्णत्व — (राग) — अपूर्णता। (ज्ञानः) नित्यता — (काल) — अनित्यता (क्रियाः) व्यापकता — (नियति) — अव्यापकता 'माया' = अन्तरंग आवरण ।। पूर्ण संवित् को आवृत कर लेता है। देह, प्राण, पुर्यष्टक, इन्द्रियाँ = बहिरंग आवरण ।। तत्र सृष्ट्युन्मुखो भगवान् शुद्धाध्वनि वर्तमानः स्वशक्तिभिः १) मायां विक्षोभ्य 'कलातत्त्व'—किंचित्कर्तृत्वलक्षणं पुद्गलस्य सृजति।¹ २) ततोऽपि किंचिदवबोधाख्यं 'विद्यातत्त्वं' ३) किंचिदभिलाषरूपं च 'रागतत्त्वं' तदेतत्सरोगं कर्तृत्वं ।२ ४) भूतभविष्यद्वर्तमानतया त्रिधा अवच्छिद्यतेवत 'कालतत्त्वं' ५) तुल्यत्वेऽपि रागे येन कर्तृत्वस्य अवच्छेदः क्रियते तत् नियति तत्त्वं— तदेतत् कंचुक षट्कम् अन्तर्मलावृ³तस्य पुद्गलस्य बहिराच्छादकम् : माया कला शुद्धविद्या राग कालौ नियंत्रणा । षडेतान्यावृतिवशात्कंचुकानि मितात्मनः ।। एवं च पुद्गलस्यान्तर्मलः कंचुकवत्स्थितः । तुषवत्कंचुकानि स्युस्तस्माज्ज्ञानक्रियोज्झितः ।।'४ ———————————————————————— १-३. जन्ममरणविचार। ४. चिल्लाचक्रेश्वरमत।

प्रथमः निष्यन्दः २१७ 'कला' पुरुष में परिमित कर्तृत्व का निर्माण करती है और इसके द्वारा सुख दुःखमोह रूप भोग्य का सृजन करती है । 'कला'—कला से ही अष्टगुणात्मिका बुद्धि उत्पन्न होती है । सात्विक-राजस-तामस भेदभिन्न त्रिस्कंध अहंकार उत्पन्न होता है । अहंकार—मन को जन्म देता है । इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं तन्मात्रा होती हैं । पंचभूत उत्पन्न होते हैं । इस प्रकार एक ही आदिदेव की स्वातन्त्र महिमा के द्वारा संसार में संसरण करने वाले प्रमाता को परिमितप्रमातृत्व प्राप्त होता है— 'भूतानि तन्मात्रगणोनेन्द्रियाणि, मूलं पुमान्कंचुकयुक्तसुशुद्धम् । विद्यादि शक्त्यन्तमियान्स्वसंवित्, सिन्धोस्तरंगप्रसरप्रपंचः ॥'१ चिद्रूप परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण है और अत्यन्त उत्कृष्ट सामर्थ्य से युक्त है । वह जाग्रत और स्वप्न में देदीत्यमान रहता है । उसकी शक्ति ही ज्ञान और ज्ञेय दोनों है । इसी से दोनों अवस्थाओं में दो प्रकार का कार्य करती हैं । दो प्रकार की उपलब्धि होती है । इन दोनों अवस्थाओं में अन्यत्र सुषुप्ति और तुरीय दोनों अवस्थाओं में वह चिन्मात्र ही रहता है क्योंकि वह ज्ञेय नहीं ज्ञान स्वरूप ही रहता है ।२ 'विभुः' = व्यापक । 'ईश्वरश्चिन्मात्रमूर्तिरात्मा' । 'पदद्वये' = जागर एवं स्वप्न नामक अवस्थाओं में । 'परमया' = अत्यद्भुतरूप वाला होने के कारण सर्वातिशायिनी (शक्ति) के द्वारा । 'शक्त्या' = निजी सामर्थ्य के द्वारा । शक्ति के द्वारा । 'युतः' = सहित ॥ 'भाति' = प्रकाशित होता है । प्रकाशते, चकास्ति ॥ किस प्रकार की शक्ति के द्वारा ? 'ज्ञानज्ञेय स्वरूपिण्या' = ज्ञायतेऽनेन इति ज्ञानं । बाह्याभ्यन्तर करणचक्र ग्रहणात्मक या ज्ञप्तिमात्र या 'ज्ञेय'—ग्राह्यः शब्दादिसुखादि च विषयजातमनन्तविशेष । उस प्रकार का रूप जिसका हो वह 'ज्ञेयस्वरूपिणी' उस ज्ञेयस्वरूपिणी के द्वारा ॥ परमेश्वर ही अपनी माया के वशीभूत होकर विविधात्मक क्षेत्रज्ञरूप द्वारा अवभासमान होकर अपनी अव्यतिरिक्ता पराशक्ति को 'ज्ञान' एवं 'ज्ञेय' भाव से अवभासित करते हुए जागर-स्वप्न दशा वाले व्यवहार को उद्भावित करता है । यही है उस शक्ति का पारम्य । अपने वैभवस्वरूप की प्रकाशमानता का अतिरोध करती हुई शक्ति ज्ञान-ज्ञेय के अनन्त रूपों में स्फुरित होती है 'स्वस्य वैभवरूपस्य प्रकाशमानतां अतिरोधधती ज्ञानज्ञेयमयानन्तरूपतया स्फुरति ॥' द्वैतात्मक (अभेदप्रथन) स्थिति के मायांधकार में—अन्यत्र = अपरत्र । सुषुप्ति १. जन्ममरणविचार में उद्धृत । २. उत्पलदेवाचार्य—'स्पन्दप्रदीपिका' ।